
Ranchi: आज चाइल्ड लेबर और उनसे जुड़े मुद्दों पर चिंता जाहिर की जा रही है. झारखंड में भी बाल श्रम एक अहम सवाल रहा है. 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां तकरीबन 4 लाख बाल श्रमिक हैं. इस मामले में यह देशभर में 9वें स्थान पर है. एक बड़ी समस्या यह है कि चाइल्ड लेबर के मामलों में संवेदनशीलता का अभाव अब भी राज्य में दिखता है. रेस्क्यू किये गये चाइल्ड लेबर के मामलों में एफआईआर दर्ज किये जाने के मामले में टालमटोल रवैया नजर आता है.
लोकल पुलिस, लेबर डिपार्टमेंट और एनजीओ के बीच इसे लेकर लगातार किचकिच चलती रहती है. 2016-18 के दौरान बाल श्रमिकों के मामले में मात्र 33 केस में ही एफआईआर हुआ. गढ़वा में पिछले दो सालों में 80 से भी अधिक मामले चाइल्ड लेबर के सामने आये. जिला बाल कल्याण समिति, गढ़वा सीडब्लूसी की पहल के बावजूद एक भी मामले में आज तक एफआईआर नहीं किया गया है. इसी तरह सीडब्लूसी के गठन के मामलों में भी राज्य में उदासीनता का माहौल है.
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बाल श्रम और बाल विवाह के मामलों में एफआईआर रिकॉर्ड ठीक नहीं
सीडब्लूसी, गढ़वा के पास 2018 से लेकर अब तक बाल श्रम के लगभग 80 मामले दर्ज हो चुके हैं. 2018 में 31, 2019 में 40 और लॉकडाउन से पूर्व तक इस साल 9 से भी अधिक मामले दर्ज हुए. इसी तरह 2019 में बाल विवाह के 16 और इस साल अब तक लगभग 30 मामले सामने आये हैं. वैसे पिछले दो सालों में लगभग 2000 केस CWC के पास रजिस्टर्ड होने की सूचना है.
जेजे एक्ट 2015 के सेक्शन 8 के अनुसार जिन मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं हो रही हो, उसे जेजे बोर्ड के पास अनुशंसा के साथ भेजा जाना है. जेजे बोर्ड में एक प्रिंसिपल जज और दो सोशल वर्कर सदस्य होते हैं. सीडब्लूसी से मिली अनुशंसा पर उसके स्तर से एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया को तय किया जाता है. अब तक सीडब्लूसी ने 20 मामलों को श्रश्र ;किशोर न्याय बोर्डद्ध बोर्ड के पास भेजा है जिसमें प्रत्युत्तर उसे नहीं मिल सका है.
दो सालों में मात्र 33 एफआईआर
2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड देश में बाल श्रम की संख्या 4 लाख है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2018 के दौरान सीएलपीआर (बाल श्रम निषेध और विनियमन, अधिनियम) के तहत केवल 33 एफआईआर झारखंड में दर्ज किये गये हैं.
यानि 33 बच्चों को श्रम या गुलामी से बचाया जा सका था. मामलों की कम रिपोर्टिंग पर चिंता जाहिर की गयी है. राज्य में कई बच्चे असंगठित या अनौपचारिक खनन उद्योग में लगे हुए हैं जो कि खतरनाक हैं.
राज्य में बाल श्रम के मामलों की रिपोर्टिंग अत्यंत खराब है. यह स्पष्ट है कि झारखंड राज्य प्रशासन ने बाल श्रम के उन्मूलन की अपनी बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर ध्यान नहीं दिया है.
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अवधि विस्तार पर चल रही बाल कल्याण समिति
बाल श्रम और बाल हित के मुद्दों को देखने में जिला बाल कल्याण समिति की बड़ी भूमिका है. जेजे एक्ट 2015 के अनुरूप बच्चों के मामले में उसकी अहम जिम्मेवारी है. एक्ट के अनुसार, समिति के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया 6 माह पहले से शुरू हो जानी चाहिये. अभी राज्य में स्थिति यह है कि राज्य के 18 जिलों में समिति के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल मार्च, 2020 में खत्म हो रहा था.
महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग ने उन्हें 3 महीने का अवधि विस्तार दिया है. जो 19 जून को खत्म हो रहा है. बाल संरक्षण तंत्र को सशक्त करने और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बचपन बचाओ आंदोलन ने बाल कल्याण समिति के गठन और उसकी प्रभावी भूमिका के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है.
जेजे एक्ट के प्रभावी उपयोग से बनेगी बात
बचपन बचाओ आंदोलन के झारखंड कार्यकर्ता ब्रजेश मिश्रा के अनुसार, जेजे एक्ट ऐसे बच्चों के लिए एक बेहद ही महत्वपूर्ण एक्ट है. सीडब्लूसी, श्रम विभाग, पुलिस, स्थानीय प्रशासन एवं अन्य सभी हितधारकों के बीच आपसी सहभागिता से ही बाल श्रम को खत्म किया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि बाल श्रम के मामलों में दोषी लोगों को कानून के दायरे में लाये जाने के लिए सबों को मिलकर गंभीरता से पहल करनी होगी. इसके अभाव में राज्य से बाल श्रम के उन्मूलन के अपने कर्तव्य को निभाने में हम सब विफल साबित होंगे.
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