
Faisal Anurag
दो युवा आइएएस अफसरों के इस्तीफों से हलचल तो है, लेकिन उस पर अफसरों का समूह खुल कर बात करने से साफ किनाराकशी कर रहा है. इस्तीफा देनेवाले दोनों अफसर अलग-अलग राज्यों के हैं. ये दोनों ही राज्य दक्षिण भारत में हैं. लेकिन दोनों इस्तीफों का स्वर एक जैसा है. ये इस्तीफे न तो निजी कारणों से दिये गये हैं और न ही इन दोनों पर किसी तरह के आरोप हैं. भारत के इतिहास का यह नायाब मामला है जो लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की हिफाजत से जुड़ा हुआ है. पर मीडिया की खामोशी बताती है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर किस तरह का संकट है. भारत की मीडिया इस तरह की खबरों पर एक-सा रुख अपना रही है. अपवाद में कुछ जरूर हैं जो सूचना भी दे रहे हैं ओर इस सवाल की गंभीरता पर चर्चा भी कर रहे हैं.
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ताजा इस्तीफा कर्नाटक के आइएएस अधिकारी शशिकांत सेंथिल ने दिया है. सेंथिल ने लोकतंत्र पर गहराते संकट का सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि ऐसे माहौल में जहां लोकतांत्रिक स्पेस सिकुड़ता जा रहा है, उनका पद पर बने रहना अनैतिक है. इसी तरह कुछ दिनों पहले ही केरल के रहनेवाले दादर नगर हवेली के आइएएस गोपीनाथन कन्नन ने इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने कश्मीर में लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगा कर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया था. बाद में दिये गये कई साक्षात्कारों में उन्होंने कहा था कि देश में लोगों के प्रतिरोध करने के मौलिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है. उन्होंने कहा था कि सरकार अपने विवके से फसले लेती है लेकिन नागरिकों को अधिकार है कि वे सरकार के फैसलों का विरोध कर सकते हैं. आज इस प्रवृत्ति पर ही अंकुश लगा दिया गया है. उन्होंने यह भी कहा था कि जब उनसे बाद की पीढ़ी पूछेगी कि जब कश्मीर में इस तरह के हालात पैदा किये जा रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे. मैं यह जबाव दे सकूंगा कि मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था.
आजाद भारत में इस तरह की घटना अपवाद ही है. आजादी की लड़ाई के दौरान अनेक लोगों ने बड़े-बड़े पदों से इस्तीफा दे कर आंदोलन में भाग लिया था. आपातकाल के दौरान जिस तरह लोकतंत्र को कुचला गया था उसके प्रति अधिकारियों का एक तबका नाराज तो था लेकिन खुल कर प्रतिरोध में नहीं आ सका था. जयप्रकाश नारायण ने तो सेना और पुलिस से गैर लोकतांत्रिक आदेशों का पालन नहीं करने का आह्वान तक किया था. बावजूद आपातकाल के दमन भरा वह स्याह इतिहास हमारी लोकतांत्रिक ओर नागरिक चेतना को चुनौती देता रहा है.
मोदी के सत्ताकाल में निरंकुश्ता के कई गंभीर आरोप लगाये गये हैं. यह भी कहा जाता रहा है कि भारत के संविधान ओर लोकतंत्र पर इस तरह का संकट शायद ही कभी आया हो. मोदी का यह हुनर भी देखा गया है कि नाकामियाबियों और आरोपों को वे हमेशा अपने हित में बदल देते हैं. बावजूद इसके इन दो अधिकारियों का इस्तीफा सामान्य नहीं है. अभी उसकी आहट दबे स्वर में सुनाई दे रही है. लेकिन इससे जाहिर होता है कि ऊंचे पदों पर बैठे हुए अनेक लोग बेहद तनाव में हैं.
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मोदी सरकार के साथ कार्य कर रहे अनेक लोगों का समय से पहले इस्तीफा देने का संदर्भ भी इन इस्तीफों से भिन्न नहीं है. वे चाहे अरविंद सुब्रह्मण्यन हों या उर्जित पटेल और विमल आचार्य. प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद तो इस्तीफों के बाद अनेक गंभीर आरोप लगा कर सरकार के आर्थिक आंकड़ों के फर्जीवाड़े को उजागर कर चुके हैं.
सवाल है कि आखिर देश में खुली चर्चा से घबराहट क्यों है. यह हर तरफ है. जिन लोगों ने भी अपनी खुली राय जाहिर की है वे न केवल ट्रोल के शिकार बनाये गये हैं, बल्कि उनको डिमोरलाइज किये जाने का सिलसिला है. उन्हें देशद्रोह जैसे मामलों में भी अभियुक्त बना दिया जा रहा है. इस तरह की बात करनेवालों को देशविरोधी व पाकिस्तान का एजेंट बता दिया जा रहा है. माना जाता है कि लोकतंत्र में असहमत विचारों की अहमियत है. भारत में यह हालात पिछले छह सालों में बदल गये हैं.
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