LITERATURE

गुजरा जमाना

फिरोज अली

कैसे भूला दूं मै वह बचपन की बातें

वह छोटी कहानी और लंबी सी रातें.

 

वह दादी का बिस्तर और फुफी की खटिया

वह अम्मी और चच्ची की प्यारी सी बतियां.

 

है मुमकिन कहां इतनी जल्दी भूलाना

था कितना हसीं वह गुजरा जमाना.

 

याद है अब्बा का साईकल से आना

रास्ते में उनका जलेबी ले जाना.

 

चाचा को मुझको दिल से पढाना

मेरा रातो में उनको पहाड़ा सुनाना.

 

वह जाड़े की रातों में लकड़ी जलाना

वहां बैठ लोगों का सुनना सुनाना.

 

सर्दी का मौसम न स्वेटर न मफलर

ना देखा था तब हमने कोई ब्लेजर.

 

बस एक ही कपड़े में सर्दी थी जाती

मेरी दादी जिसे कहती थी गॉती.

 

अनोखी थी उस वक्त की एक रिवायत

दुश्मन से ना थी तब कोई शिकायत.

 

वक्त ने फिर से एसी आंधी चला दी

आपसी मोहबत को दिलों से मिटा दी.

 

क्या आएगा वापस व गुजरा जमाना ?

लौटे वह दिन तो “फिरोज” को दिखाना.

इसे भी पढ़ें – कहानी- दूसरी काली

 

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