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कहानी- दूसरी काली

2,005

Shyamal Bihari Mahto

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गाय का दाम कल शाम को ही तय हो चुका था. सुबह जुमन मियां उसे लेने मेरे घर आ भी चुका था. दाम दूध -दूधारू और देह  देख कर तय हुआ था. जुमन मियां बूढे-बांझ और ’’ ऐब ’’वाले मवेशियों को बेचने का धंधा पिछले कई सालों से करता चला आ रहा था. इसके पहले उसका बाप इस धंधे में लगा हुआ था. कहा जाता है एक बूढे बैल ने बौखला कर अपनी दोनों लंबी सिंग को जुमन के बाप के पेट में घूसेड़ दिया था. अस्पताल जाते-जाते रास्ते में उसने दम तोड दिया था. इसके बावजूद जुमन ने इसी धंधे को चुना था.  वह सुबह तडके उठता और गांव-गांव में घूमता. चक्कर लगाता. बिना खाये-पिये. जैसे ही कहीं सौदा पट जाता, वहीं गमछी बिछा देता और अल्ला को याद करने बैठ जाता. मानो अल्ला मियां ने ही यह सौदा तय कराया हो. जुमन मियां पक्का कारोबारी आदमी था. उसके धंधे में आज तक कोई दाग नहीं लगा था. जो बात तय होती उसे वह खुदा का फरमान समझता था. तय समय पर लोगों को पैसे दे जाता था. यही जान हमने भी उसके साथ उधार ही सौदा तय कर गाय दे देने का मन बना लिया था.

गाय को मैंने छः माह पहले ही खरीदा था. काली गाय और खैरा उसका बछडा दोनों ही मेरे मन को भा गये थे.  तब मन में दूध से ज्यादा ’’गो सेवा ’’ की भावना थी. गाय लेने के वक्त मुझसे कहा गया था कि यह गाय इतनी सुधवा अर्थात अच्छे स्वभाव की है कि इसे औरतें भी बडी आसानी से दूध दूह लेती हैं. औरतें भी से मैंने समझा था कि मर्द तो इसका दूध दूहते ही होंगे. औरतें भी आसानी से दूध निकाल लेती होंगी. लेकिन आज मुझे गाय के पहले मालिक को बडी-बडी गालियां देने का जी कर रहा था- कमीने ने कमाल का झूठ बोला था और एक ऐब वाली गाय को मेरे गले बांध दिया था.

दो दिन पहले अपनी कुछ बातों को मुददा बना कर पत्नी ने झगड़ा किया और फिर मायके चली गयी. जाने से पहले तंज कसते हुए कहा था-’’ कहते हो यह हमारी खरीदी हुई गाय है- दूध निकाल लेना इसकी थान से तो जानूं.’’

पत्नी की अहम वाली बात और गाय की लात ने मुझे पागल-सा कर दिया था. गाय को गोहाल से बाहर कर देने का जैसे मुझ पर भूत सवार हो गया था. और इसी जुनून ने जुमन मियां से मिला दिया था. इसके पहले जुमन मिया से मैं कभी नही मिला था. नाम के साथ बुलावा सुनते ही वह दौडा चला आया था.  गाय-गोबर और दूहने के नाम पर हर दिन पत्नी की चख-चख से भी निजात चाहता था. गो सेवा का भूत भी अब सर से पूरी तरह उतर चुका था. दो दिन में ही लगा यह गाय मेरा गूह -मूत करा के छोडेगी. इससे छुटकारा अब केवल जुमन मियां ही दिला सकता था. पर कैसे?  अभी तो वह खुद गोहाल के बगल में बनी पक्की नाली में पसरा पडा हुआ था. सीधे छाती पर गाय की ऐसी लात पडी थी कि जुमन मियां सात जन्मों तक उसे भुला  नहीं पायेगा. कहूं तो गाय मरखनी बन चुकी थी.

दो दिन में ही उस पर जैसे लात मारने का भूत सवार हो चुका था. उसकी आंखों में अंगारे दहक रहे थे. जो भी उसके सामने जाता- उसे दुश्मन नजर आता. उसमें मैं भी शामिल था. उसकी लातों का पहला भुक्त भोगी भी  मैं ही बना. पत्नी के मायके जाने के बाद गाय की थान से दो दिनों में. दो बूंद भी दूध निकाल नहीं पाया था. उल्टे अब तक हम उसकी कई लातें खा चुके थे. गुस्सायी-तिलमिलायी गाय के दूध की जगह अपनी छठी का दूध याद कर रहा था. यहां तक तो किसी तरह सह लिया था. बल्कि पहले दिन की लात की बात भी भुला  देने का मन बना लिया था और सोचने लगा आखिर हमारे साथ गाय का यह भेद-भाव क्यों… सुबह कुटी के साथ दररा मिलाकर मैं इसे खिलाता हॅू. गूड़-पानी का मिश्रण मैं पिलाता हूं. फिर दूध देने की जगह हमें उसकी लात क्यों खानी पड रही है. उस दिन शाम को भी गाय से दूध नहीं ले सका. खाली लौटा देख मन तो भडका. परन्तु कुछ सोच कर शांत हो गया.

दूसरे दिन सुबह तो गजब ही हो गया. सहन शक्ति एक दम से जवाब दे गयी. हुआ यूं कि बछडे की रस्सी  बेटी पिंकी को पकडा दी और खुद दूध दूहने बैठ गया. अभी मैंने गाय की थान पर हाथ भी नहीं लगाया था. बस हाथ आगे बढा ही रहा था कि जोर की लात सीधे बांयी ओर पडी और फिर पडी. यह देख पिंकी डर से चीख पडी तभी बछडे ने उसे जोर का झटका दिया. वह धम से जमीन पर गिर पडी. रस्सी उसके हाथ से छूट गयी. उठने की कोशिश की. वह उठती इसके पहले गाय उधर घूम गयी और एक लात उसे भी जमा दिया.  बप्पा गो-बप्पा’’ कह चिल्ला उठी तो मैं उसे उठाने दौड़ पडा. इसके बाद तो मेरा गुस्सा जैसे जाग उठा था. बगल कोने में पड़ा डंडा पकडा और तड़तड़ाकर चार-पांच डंडे गाय पर चला दी. अब गाय रंभाने लगी. पिंकी मुझसे लिपट गयी. बोली-’ छोड दो बप्पा… ’’

अकस्मात मेरे जेहन में पत्नी से पहली मुलाकात, पहली रात और पहला मिलन की घटना और आज तक की एक उबाउ भरी जिन्दगी चलचित्र की भांति घूम गयी थी. उसकी इच्छा की परिधि के भीतर मैं आज तक जा नही सका था. गोहाल में खड़े-खड़े कभी गाय को देखता तो कभी पत्नी के बारे सोचता. दोनों के स्वभाव में  कितनी समानता थी. धीरे-धीरे मेरे अन्दर का क्रोध उबले दूध की तरह ठंडा होता चला गया था.

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जुमन मियां फिर उठ खडा हुआ था. लेकिन अभी तक वह गाय को गोहाल से निकाल नहीं पाया था. परन्तु वह भी जानवरों का पक्का लतखोर और थेथर आदमी था. सो पुनः आगे बढा था. उस वक्त हमारा गोहाल एक रणक्षेत्र में बदल चुका था. एक छोर में मै था. मेरी बेटी पिंकी थी और अपने अल्ला को याद करता जुमन मियां था. वहीं दूसरी ओर काली गाय और उसका खैरा बछडा था. युद्ध शुरू हो चुका था. जुमन मियां को बिगड़ैल जानवरों का अनुभव और जानकारी थी. वो जिददी भी था. किस जानवर को कैसे काबू में किया जाये. इसका बपौती हुनर था उसके पास.

वह आगे बढा था. अपनी सारी ताकत को समेट कर. अपने मरहूम बाप और खुदा को याद कर. पगहा उसके हाथ में था और गाय ठीक उसके दो हाथ दूर खडी थी. जुमन मियां ने एक कदम आगे बढाया. गाय ने जुमन को कसाई की तरह आगे बढते देखा. उसकी लाल आंखें लाल अंगारों की तरह दहक रही थीं. और रह-रह कर उसके आगे के दोनों पैर आगे -पीछे हो रहे थे. मतलब साफ था. वह जुमन के लिए एक ललकार थी. जैसे कह रही हो-’’ आओ, आज हम जीवन का आखिरी दम तक दांव लगा लेते हैं,  मैं रहूंगी या तुम जाओगे…..’’

और जुमन ने गाय की गर्दन को लपक लिया था. जिस तेजी से जुमन गाय की गर्दन पर सवार हुआ था   पगहा फंसाता कि अगले ही पल वह दीवार से जा टकराया था. गाय ने दूगनी ताकत से उसे उछाल दिया था. उसे जोर का चक्कर आया और माथा पकड वहीं बैठ गया. उसके सर पर गहरी चोट आ गयी थी. मेरी आंखों के सामने का यह दृश्य किसी सिनेमा से कम नहीं था. सोचा कुछ उपचार कर दूं. मैं घर के अन्दर गया. इतने में  सतबजवा कमान्डर से पत्नी मायके से लौट आयी. आंगन में उसे जुमन मिल गया-’’ तुम मेरे घर में……?’’

रूई और डिटॉल लिये मैं बाहर निकला. जुमन गायब. पत्नी हवलदार की तरह आंगन में हाजिर थी. अपनी पूरी हसरत के साथ.

संपर्क- मुंगो, बोकारो.

मोबाइल – 95463 52044

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