
- किशोरियों के गर्भवती होने के बढ़ते मामले चिंतनीय : डॉ शोभा सूरी
- टीनएज प्रेगनेंसी पर परिचर्चा आयोजित
Ranchi : टीनएज प्रेगनेंसी के मामलों में झारखंड देश में पांचवें स्थान पर है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे दौर के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के कुल 24 जिलों में से 20 जिलों में टीनएज प्रेगनेंसी की दर राष्ट्रीय औसत (7.9%) से काफी ज्यादा है. इसमें राजधानी
रांची सहित 16 ऐसे जिले शामिल हैं, जिन्हें नीति आयोग ने ‘एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट’ के रूप में शामिल किया हुआ है. झारखंड में ‘टीनएज प्रेगनेंसी के बढ़ते मामले’ विषय पर बुधवार को एक वर्चुअल परिचर्चा आयोजित की गयी.
इसके माध्यम से किशोरियों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई. इसके तहत किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य, उनका भविष्य, टीनएज प्रेगनेंसी और इनसे कैसे निपटा जाये, कम उम्र में मातृत्व या पितृत्व पर चर्चा की गयी.
इस अवसर पर विशेषज्ञों ने कहा कि टीनएज प्रेगनेंसी और बाल विवाह के कई दुष्परिणाम हैं. एक किशोरी मां अमूमन कुपोषण का शिकार हो जाती है या उसकी पढ़ाई वहीं बंद हो जाती है और उससे उसके आगे बढ़ने के अवसर छिन जाते हैं. जिसका नकारात्मक प्रभाव उनके आर्थिक विकास पर भी पड़ता है.
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टीनएज प्रेगनेंसी की दर के हिसाब से झारखंड के टॉप 10 जिले
| कुल | ग्रामीण | शहरी |
| देवघर | 22.6 | 26.9 |
| गोड्डा | 21.7 | 23.4 |
| गढ़वा | 18.9 | 19.6 |
| जामताड़ा | 17.5 | 19 |
| पाकुड़ | 17.2 | 16.5 |
| गिरिडीह | 16.2 | 16.2 |
| दुमका | 14.8 | 16.4 |
| सरायकेला- खरसावां | 14.8 | 16.9 |
| कोडरमा | 14 | 15 |
| साहिबगंज | 13.5 | 13.4 |
टीनएज प्रेगनेंसी को बेहतर समझने के लिए झारखंड की जनसंख्या से जब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे दौर के आंकड़ों को गुणा किया गया तो यह सामने आया कि राज्य में टीनएज प्रेगनेंसी के तकरीबन 1.79 लाख मामले हो सकते हैं. इतना ही नहीं, इनमें 85 प्रतिशत मामलों के झारखंड के ग्रामीण इलाकों में हैं. प्रदेश में 15 से 19 साल की लड़कियों की कुल आबादी 14.90 लाख है और इनमें इतनी बड़ी तादाद में टीनएज प्रेगनेंसी के मामले होना चिंताजनक है.
इस परिचर्चा में भाग लेने वालों में प्रमुख थे डॉ. शोभा सूरी, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ), सुमंत्र मुखर्जी, चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (सिनी) के झारखंड प्रमुख और दसरा से सुचरिता अय्यर एवं मुकेश रोशन. इन सभी विशेषज्ञों ने टीनएज प्रेगनेंसी से जुड़े विभिन्न दुष्प्रभावों पर चर्चा की.
डॉ. शोभा सूरी, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) का कहना था कि भारत में टीनएज प्रेगनेंसी के मुद्दे को एक राष्ट्रीय आपदा के रूप में देखा जाना चाहिये और इसे दूर करने के लिए उतनी ही प्राथमिकता देने की जरूरत है. किशोर-किशोरियों को स्वस्थ और सशक्त बनाने से इसका आर्थिक लाभ दस गुना तक बढ़ सकता है और इससे संयुक्त राष्ट्र संघ की सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स को हासिल करने में भी हमें काफी मदद मिलेगी.
इस मौके पर सुमंत्र मुखर्जी, जो चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (सिनी) के झारखंड प्रमुख हैं, ने इस मुद्दे से जुड़े कई तरह के दुष्प्रभावों पर चर्चा की.




