Opinion

किसान आंदोलन : देशहित में है कि जल्द दूर हो गतिरोध

आंदोलन में शरारती तत्वों के शामिल होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता

बलराम सैनी

वर्ष 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो भारत को भी अपने सीमित साधनों के साथ युद्ध भूमि में उतरना पड़ा. पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन प्राप्त था जो उसे सैन्य साजोसामान समेत हर प्रकार की मदद उपलब्ध करवा रहा था, जबकि भारत खाद्यान्न तक के लिए अमेरिका पर निर्भर था. जैसे ही युद्ध शुरू हुआ तो अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न की आपूर्ति रोक दी. इस प्रकार, देश के समक्ष न केवल सीमा पर दुश्मन से लडऩे की चुनौती थी, बल्कि खाद्यान्न के अभाव से निपटने का संकट भी था. इन दोनों चुनौतियों को स्वीकार करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने न केवल ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भर देकर सरहद पर लड़ रहे जवान और खेतों में अन्न उगा रहे किसान का हौसला बढ़ाया, बल्कि खुद उपवास रखकर देशवासियों को खाद्यान्न बचाने की प्रेरणा भी दी, लेकिन दुर्भाग्यवश आज की परिस्थितियां एकदम विपरीत हैं.

देश का जवान जहां पेंशन में कटौती के प्रस्ताव और कुछ स्थानों पर मेस में पौष्टिक भोजन न मिलने को लेकर चिंतित है, वहीं किसान अपना घर-परिवार-आराम छोडक़र कड़ाके की ठंड में राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली की सडक़ों पर रातें बिता रहा है. नए कृषि कानूनों को लेकर केंद्र सरकार के लाख दावों के बावजूद किसान यह विश्वास नहीं कर पा रहा है कि ये कानून उसके हित में हैं. फिर शुरुआती दौर में आंदोलन के प्रति सरकार की बेरुखी ने किसानों के गुस्से की आग में घी डालने का काम किया.

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निश्चित तौर पर किसान आंदोलन का लम्बा खिंचना किसी के हित में नहीं है, क्योंकि अभी तक पूर्णत: शांतिपूर्ण रहे इस आंदोलन में किसी न किसी रूप में शरारती तत्वों के शामिल होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा रहा. यदि कोई गड़बड़ हुई तो भारत विरोधी ताकतें इसका लाभ उठाने का भरपूर प्रयास करेंगी. लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस आंदोलन की नौबत क्यों आई. इसकी पृष्ठभूमि वर्ष 2004 में स्वामीनाथन राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों के साथ शुरू हो गई थी. फिर, 2015 में शांताकुमार समिति की सिफारिशों ने कृषि सुधार कार्यक्रम को नई दिशा देने का प्रयास किया. अब सरकार द्वारा कोरोना काल में अचानक लागू किए गए 3 कृषि सुधार कानून ताजा किसान आंदोलन का सबब बने.

किसानों का भाया स्वामीनाथन आयोग का सी-2 फार्मूला

दरअसल, कृषि सुधार एवं किसानों की आय में बढ़ौतरी की संभावनाएं तलाशने के लिए 18 नवम्बर 2004 को केंद्र सरकार ने प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय किसान आयोग (एन.सी.एफ.)’ का गठन किया था. इस आयोग ने दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, दिसम्बर 2005 व अप्रैल 2006 में अपनी सिफारिशों की 4 रिपोर्टें सरकार को सौंपी. आयोग की अंतिम रिपोर्ट 4 अक्तूबर 2006 को सौंपी गई जिसमें किसानों की आर्थिक स्थिति, आत्महत्या के कारण, कृषि उत्पादन की लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य, भूमि सुधार, अत्याधुनिक तकनीक, सिंचाई, गुणवत्ता, विपणन, भंडारण, संस्थागत ऋण और किसानों के उत्थान के लिए राष्ट्रीय नीति बनाकर ठोस उपाय करने का विस्तार से जिक्र किया गया था. सबसे बड़ी बात स्वामीनाथन आयोग ने कृषि को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करने का सुझाव दिया था.

इसके अलावा स्वामीनाथन आयोग की 201 सिफारिशों में से जो बात किसानों को सबसे ज्यादा पसंद आई, वह भी ‘सी-2 फार्मूला’. इसके तहत आयोग ने सरकार को सुझाव दिया कि फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य उस फसल की कुल लागत (जिसमें बीज, खाद, कीटनाशक, समय-समय पर बुलाए गए मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई व अन्य खर्चों के अलावा किसान और उसके परिवार की मजदूरी भी शामिल है) का डेढ़ गुणा होना चाहिए. दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का दावा है कि सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की 201 सिफारिशों में से 200 को स्वीकार कर लिया है. अब केवल सी-2 फार्मूले को लेकर की गई सिफारिश रह गई है और इसके लिए भी 22 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की वृद्धि की गई है.

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11.24 प्रतिशत भूमिहीन, 40.11 प्रतिशत के पास एक एकड़ से कम

अपने अध्ययन में स्वामीनाथन आयोग ने पाया कि देश में 15 एकड़ से अधिक कृषि भूमि वाले केवल 2.62 प्रतिशत किसान परिवार हैं, जबकि 5 से 14.99 एकड़ वाले 12.09 प्रतिशत, 2.5 से 4.99 एकड़ वाले 13.42 प्रतिशत, 1 से 2.49 एकड़ वाले 20.52 प्रतिशत और 0.01 से 0.99 एकड़ जमीन वाले 40.11 किसान परिवार हैं. 11.24 प्रतिशत किसान परिवार तो ऐसे हैं जिनके पास कोई कृषि भूमि ही नहीं है. ये भूमिहीन किसान दूसरों की जमीन पर खेती करके अपना जीवन यापन करते हैं.

उत्पादन के मामले में दूसरे देशों से फिसड्डी

स्वामीनाथन आयोग ने पाया कि देश की 19.20 करोड़ हेक्टयर कृषि भूमि में तो लगभग 60 प्रतिशत भूमि बारिश के पानी पर निर्भर है, अर्थात इस भूमि के लिए सिंचाई के साधन नहीं हैं. यही कारण है कि फसलों के उत्पादन के मामले में भी भारत दूसरे कई देशों से बहुत पीछे है. वर्ष 2002 के आंकड़ों के अनुसार धान का उत्पादन भारत में जहां औसतन 2929 किलोग्राम प्रति हेक्टयर हुआ तो चीन में औसतन 6321, जापान में 6414, दक्षिण अफ्रीका में 6622, इंडोनेशिया में 4261 व वियतनाम में 3045 किलोग्राम प्रति हेक्टयर उत्पादन हुआ.

इसी प्रकार, भारत में औसतन 2583 किलोग्राम प्रति हेक्टयर गेहूं उत्पादन की तुलना में चीन में गेहूं का औसतन 3969, दक्षिण अफ्रीका में 2872, कनाडा में 2591 व वियतनाम में 2711 किलोग्राम प्रति हेक्टयर उत्पादन हुआ. मक्का का उत्पादन भारत में जहां औसतन 1997 किलोग्राम प्रति हेक्टयर है तो चीन में औसतन 4880, दक्षिण अफ्रीका में 8398, इंडोनेशिया में 2646, कनाडा में 7974 व वियतनाम में 4313 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ. भारत में औसतन 68012 किलोग्राम प्रति हेक्टयर गन्ना उत्पादन की तुलना में चीन में गन्ने का औसतन 85294, दक्षिण अफ्रीका में 80787 व वियतनाम में 65689 किलोग्राम प्रति हेक्टयर उत्पादन हुआ.

मूंगफली का उत्पादन भारत में जहां औसतन 913 किलोग्राम प्रतिहेक्टयरहुआ तो चीन में औसतन 2799, जापान में 2336, दक्षिण अफ्रीका में 3038, इंडोनेशिया में 1523 व वियतनाम में 1336 किलोग्राम प्रतिहेक्टयरउत्पादन हुआ. हालांकि, पिछले 18 वर्षों में इन आंकड़ों में काफी सुधार हुआ है, लेकिन अभी बहुत गुंजाइश बाकी है.

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शांता कुमार समिति की रिपोर्ट

मोदी सरकार के सत्ता संभालते ही अगस्त 2014 में पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया. जनवरी 2015 में सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में शांताकुमार समिति ने भारतीय खाद्य निगम द्वारा अनाज प्रबंधन, भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य, खाद्य सुरक्षा प्रणाली आदि विषयों का अध्ययन करने के बाद इनमें सुधार के लिए सरकार को अपने सुझाव दिए. समिति ने सिफारिश की कि भारतीय खाद्य निगम ने गेहूं एवं धान जैसी फसलों की खरीद का काम राज्यों को सौंपकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत संबंधित राज्य के लिए आवश्यक अनाज के बाद राज्य सरकारों से सरप्लस अनाज ही लेना चाहिए.

इसके अलावा भारतीय खाद्य निगम को भंडारण का काम सैंट्रल वेयर हाउसिंग कारपोरेशन, स्टेट वेयरहाऊसिंग कारपोरेशन, राज्य सरकारों और प्राइवेट इंटरप्रेन्योर गारंटी के तहत निजी क्षेत्र की कंपनियों को सौंप देना चाहिए. इसके लिए मध्य प्रदेश की तर्ज पर निजी कंपनियों को भवन निर्माण के लिए सरकारी जमीन भी दी जा सकती है. भारत में अनाज के बफर स्टॉक के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत है, ताकि कुप्रबंधन के चलते अनाज सडऩे जैसी स्थिति पर अंकुश लगाया जा सके. यह पूरी प्रक्रिया भंडारण की लागत के मद्देनजर निविदा के तहत की जानी चाहिए. समिति ने ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की स्थिति में सुधार पर भी जोर दिया.

खाद्य सुरक्षा का दायरा घटाने पर जोर

शांताकुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का दायरा घटाने पर जोर दिया. इस अधिनियम के तहत अब तक देश की 67 प्रतिशत आबादी को खाद्य सुरक्षा प्राप्त है, समिति ने इसे 40 प्रतिशत आबादी तक सीमित करने की सिफारिश की. समिति ने पी.डी.एस. (जनवितरण प्रणाली) की लीकेज पर अंकुश लगाने के लिए इसके लाभार्थियों और किसानों से खरीदी गई फसलों, उसके भंडारण एवं वितरण समेत पूरी खाद्य प्रबंधन प्रणाली का पूरी तरह कम्प्यूटराइजेशन करने का सुझाव दिया.

किसानों के गुस्से का सबब बना निजी कंपनियों को बढ़ावा

शांताकुमार समिति का सबसे महत्वपूर्ण सुझाव निजी क्षेत्र की कंपनियों को फसल खरीद एवं भंडारण का अधिकार दिलाने से संबंधित था. समिति की सिफारिश के अनुसार ही केंद्र सरकार ने बिचौलियों पर अंकुश लगाने का कानून बनाया जो किसानों के गुस्से का सबसे बड़ा कारण है. समिति ने यह भी सिफारिश की कि सरकार को फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों को दिए जाने वाले बोनस पर रोक लगानी चाहिए.

सरकार द्वारा किसानों को करीब 7000 रुपये प्रति हेक्टयर के हिसाब से सब्सिडी दी जाती है. सरकार को फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं सब्सिडी की राशि किसानों और खाद्य सुरक्षा योजना के लाभ की राशि इसके लाभार्थियों के खातों में सीधे तौर पर डालनी चाहिए. समिति का मानना था कि यदि किसान को सब्सिडी की राशि नकद मिल जाएगी तो वह अपनी सुविधा के अनुसार गुणवत्तायुक्त बीज, खाद एवं कीटनाशक आदि का चुनाव कर सकता है. पड़ोसी देश चीन में सब्सिडी की राशि किसान के खाते में ही डाली जाती है.

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लेवी राइस पॉलिसी को समाप्त करने का सुझाव

शांताकुमार समिति ने सरकार को सुझाव दिया कि वह लेवी राइस पॉलिसी को समाप्त करे जिसके तहत सरकार राइस मिलों से आवश्यक तौर पर निर्धारित मात्रा में चावल (लेवी राइस) की खरीद करती है और राइस मिलों को केवल बचा हुआ चावल खुले बाजार में बेचने की छूट है.

सभी किसानों को नहीं मिल रही किसान सम्मान निधि

भारत में करीब 14.5 करोड़ किसान परिवार हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पेंशन) का लाभ सभी किसानों को नहीं मिल पा रहा है. देश में करीब 10.87 किसान परिवार ही इस योजना का लाभ ले रहे हैं. उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा किसानों को 2000-2000 रुपए की तीन किस्तों में कुल 6000 रुपए प्रतिवर्ष किसान सम्मान निधि दी जाती है.

पंजाब और हरियाणा के किसान ज्यादा प्रभावित क्यों

केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि सुधार कानूनों से पंजाब और हरियाणा के किसान ज्यादा प्रभावित इसलिए हैं, क्योंकि ये दोनों राज्य कुछ खामियों के बावजूद मंडी सिस्टम के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं. इन दोनों राज्यों में ए.पी.एम.सी. एक्ट के तहत स्थायी मंडियां हैं, जबकि देश के अन्य राज्यों में मंडी सिस्टम बेहद कमजोर है. शांताकुमार समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही केंद्र सरकार द्वारा 22 फसलों के लिए घोषित किए जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा लाभ मिल पाता है और इनमें पंजाब एवं हरियाणा के किसान अग्रणी हैं. बिहार में वर्ष 2006 तक ए.पी.एम.सी. एक्ट लागू था, लेकिन यह एक्ट समाप्त किए जाने के बाद बिहार के किसान की हालत और खराब हुई है.

उदाहरण के तौर पर पंजाब एवं हरियाणा में जो धान 1888 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बिका, वही धान बिहार में किसान से 1100-1150 रुपए प्रति क्विंटल पर खरीदा गया. पंजाब एवं हरियाणा के किसान को यही डर सता रहा है कि मंडी सिस्टम समाप्त हो जाने के बाद कहीं उसकी हालत भी बिहार के किसान जैसी न हो जाए. इसलिए किसान आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य की लिखित गारंटी और मंडी सिस्टम की बहाली ही है.

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