
Surjit Singh
क्या कोरोना संकट ने “सत्ता” का अमानवीय व निरंकुश चेहरा सामने ला दिया है. क्या हमें और बुरे वक्त देखने पड़ेंगे. क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सरकारों (केंद्र व राज्यों की सरकार) का चरित्र संकट के वक्त अपने ही लोगों से ऐसे मुंह फेर लेने वाला ही रहा है? या शायद अब भी सत्ता का असली चेहरा हमारे सामने नहीं आ पाया है.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 40 दिन से बेरोजगार बैठे भूखे व बदहाल मजदूरों के पास ट्रेन टिकट खरीदने के 500 से 1000 रूपये होंगे. क्या आप सोंच सकते हैं कि इस संकट के वक्त भी सरकारें मजदूरों से बसों का किराया दोगुना वसूल करेगी. अमीरों को फ्री में घर वापसी कराने वाली सत्ता का यह रुप शायद ही पहले देखा गया होगा.
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हासिये पर पहुंचे लोगों, जिनकी वोट से सरकारें बनती हैं, जिन्हें आज सरकार की जरूरत सबसे अधिक है, पर सरकार मदद को तैयार नहीं दिख रही. तरह-तरह के बहाने बनाती है. क्या यह सब कभी सोंचा था किसी ने.
नहीं सोंच पा रहे हैं. तो समझ लीजिये आपके पास सही खबर नहीं पहुंच रही. यह सच है.
केंद्र सरकार ने मजदूरों को ट्रेन से घर जाने की अनुमति दी. पर उनसे ना सिर्फ ट्रेन की टिकट का किराया वसूला जा रहा है, बल्कि अलग से 50 रूपया का अतिरिक्त चार्ज भी लिया जा रहा है. यह किस मद में लिया जा रहा है, रेलवे की क्या मजबूरी है. यह सवाल अपनी जगह है.
पर एक सरकार के लिए यह अमानवीय नहीं है. राज्यों की सरकारें भी मजदूरों का किराया देने को तैयार नहीं हैं. मजदूरों की घर वापसी को लेकर केंद्र सरकार तीन दिन में चार नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है.
एक दूसरी खबर है. अंग्रेजी दैनिक टेलिग्राफ के अनुसार, कर्नाटक सरकार ने बसों का किराया डबल कर दिया है. सरकार का तर्क है कि जो बसें मजदूरों को लेकर जायेंगी, उसे खाली लौटना पड़ेगा. इसलिए आने और जाने का बस भाड़ा पहले देना होगा. आम दिनों में इस तर्क को सही ठहराया जा सकता है. पर, क्या इस संकट काल में भी. जब मजदूरों को 40 दिन से काम नहीं मिला है. उनके पास पैसे नहीं है. वह कहां से दे पायेंगे इतना किराया.
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एक और खबर है. गुजरात के सूरत से बस से अपने घर उत्तर प्रदेश लौट रहे मजदूरों को मध्यप्रदेश में रोक दिया गया. उन्हें वापस गुजरात भेज दिया गया. कई जगहों पर मजदूरों व पुलिस के बीच झड़प भी हुई. पर, कानून तोड़कर सबसे पहले छात्रों को कोटा से घर पहुंचाने वाले राज्य यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ चुप हैं. क्यों? छात्रों को सरकारी खर्च पर लाने और मजदूरों को रोकने पर चुप रहने की क्या वजह हो सकती है?
तो क्या सरकारें अमानवीय और निरंकुश हो गयी हैं? या केंद्र व राज्यों की सरकारों का कोई छिपा एजेंडा है? एक बात यह बतायी जा रही है कि सरकार ने जब मजदूरों को घर वापस जाने देने का फैसला लिया और बड़ी संख्या में मजदूर घर लौटने को तैयार हो रहे हैं, तो उद्योगपतियों व सरकार के हाथ पांव फूलने लगे हैं. वह यह समझने लगे हैं कि अगर मजदूर अपने गांव लौट गये तो फैक्टरियों में लटके ताले खोलने मुश्किल होंगे.
तो क्या मजदूरों को इसलिए तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है कि वह मजबूर होकर जहां हैं, वहीं रह जायें. तो क्या हम उस दौर में पहुंच रहे हैं, जहां अमीर-गरीब के लिए सत्ता का अलग-अलग नजरिया है. क्या हमारी सत्ता पहले से ऐसी ही थी. वह बस लोकतांत्रिक और कल्याणकारी होने का दिखावा कर रही थी. कोरोना संकट ने उनके चेहरे पर से नकाब हटा दिया है.
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