Opinion

विधानसभा चुनावः आदिवासी मुद्दों की अनदेखी राजनीतिक दलों को महंगी पड़ सकती है

Faisal  Anurag

आदिवासी वोटरों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दलों की स्पर्धा उनके राजनीतिक महत्व को रेखांकित करती है. झारखंड के चुनाव में आदिवासियों को नजरअंदाज कर कोई भी पार्टी सत्ता की मंजिल हासिल नहीं कर सकती है.

लोकसभा चुनाव के दोरान भी आदिवासियों की वोट प्रवृति को ले कर राजनीतिक दलों में बेचैनी है. हिंदुत्व लहर के बावजूद आदिवासी इलाकों में भाजपा को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली.

वोटों के लिए, आदिवासियों के वे सवाल जो आमतौर पर राजनीतिक चर्चा से बाहर ही रह जाते हैं, एक बार फिर बहस में आते दिख रहे हैं. राजनीतिक दलों के थिंक टैंक इस तथ्य से वाकिफ है कि इस बार विधानसभा चुनाव में वोटरों का आकर्षित करना आसान नहीं होगा.

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लोकसभा चुनाव में भी आदिवासियों के ऐसे रुझान दिखे थे जो राजनीतिक दलों के लिए परेशानी का सबब थे. आदिवासी वोटरों के बीच जल, जंगल, जमीन के सवाल को ले कर रोष है.

झारखंड के आदिवासी महसूस करते हैं कि राजनीतिक दल उनसे वोट की अपेक्षा तो रखते हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक और जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के ओदलनों में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती.

और न ही ऐसी कोई वैकल्पिक नीति ही पेश करते हैं जो प्रकृति ओर जलवायु की हिफाजत करते हुए उनकी आर्थिक उन्नति का रास्ता प्रशस्त करे. विकास की वर्तमान नीतियों को आदिवासी समाज संदेह से देखता है.

और उस में अपने संभावित विस्थापित होने की आशंका से घिरा रहता है. आदिवासी समुदाय के एक बड़े हिस्से में आदिवासी राजनीतिक नेतृत्व को ले कर भी संश्य का माहौल हे. नेताओं की सत्तापरस्ती उन्हें परेशान भी करती है. आदिवासी समुदाय अन्य समुदायों की तरह अपनी इन प्रवृतियों को प्रकट भी नहीं कर पाते हैं.

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आदिवासी सवाल पर संघर्ष करने वाले समूहों की नाराजगी भी उभर कर सामने आती है. राजनीतिक प्रभाव के नजरिये से उनका आकलन नहीं किया जाता है. सत्ता या विरोधी पक्ष भी, उनके समर्थन को टेकेन फर ग्रांटेड मान कर चलता है.

लोकसभा चुनाव के समय भी देखा गया था झारखंड के ये समूह नाराज थे. ये अलग बात है कि इन समूहों के संयुक्त प्रभाव को नकाराना किसी भी राजनीतिक दल को नुकसान पहुंचा ही देता है.

यह कहा जा रहा है कि आदिवासियों की निराशा और राजनीतिक दलों से उनका माहभोग सहमना राजनीतिक दलों के लिए घातक हो सकता है. इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस तरह का मोहभंग संसदीय लोकतंत्र के लिए बेहतर नहीं है.

राजनीतिक प्रक्रियाओं में उनकी हिस्सेदारी सीमित किये जाने ओर उनके नेतृत्व को अपने पक्ष में करने की राजनीतिक दलों की प्रवृति इसका एक बड़ा कारक साबित होता है.

हो सकता है कि राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इसका महत्व नहीं हो. लेकिन वोट रुझान इससे प्रभावित तो होता ही है. कई ऐसे पाकेट हैं जहां जल, जंगल, जमीन भी राजनहीतिक दल की चुनावी हार तय कर सकता है.

आदिवासी समाज में इस तरह की प्रवृति बढ़ती जा रही है. खास तौर पर मुख्यधारा की राजनीतिक दलों की भूमिका को ले कर समुदाय में असंतोष है. इसका एक बड़ा कारण तो उन सांस्कृतिक कारणों के हल नहीं किये जाने के कारण है जो आदिवासी समाज की अस्मिता है. झारखंड का आदिवासी समुदाय अपने इन सवालों को ले कर बेहद संवेदनशील है.

पिछले पांच सालों में राज्य के गांवों में सरकार की अनेक नीतियों को लोगों ने ही चुनौती दी है. राजनीतिक दलों की उपेक्षा के बावजूद प्रतिरोध का मुखर स्वर बताता है कि झारखंडी गांव ऐसी नीतियों के खिलाफ है.

लोकसभा चुनाव में तो आदिवासी इलाको में यह रुझान वोट रुझान में प्रभावी दिखा था. लोकसभा चुनाव में भी भाजपा का वोट शेयर अन्य इलाकों की तुलना में कम ही रहा है. भाजपा ने पांच में तीन सुरक्षित सीट पर जीत तो हासिल की, लेकिन जीत का अंतर प्रभावी नहीं था.

विधानसभा चुनाव में एक बार फिर आदिवासियों के लिए सुरक्षित 20 सीटों  पर किसी भी राजनीतिक दल की आसान जीत का अनुमान कठिन ही दिखता है.

इसका कारण यह है कि पांच सालों में आदिवासी आंदोलन के जो स्वर उभरे हैं, वह किस राजनीतिक प्रवृति की ओर मुड़ेंगे, इसका ठीक-ठीक अनुमान लगाने में राजनीतिक दल अभी तक कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

एक बात तो तय है कि भाजपा जिस तरह विपक्षी आदिवासी नेताओं को डिमोनाइज करने का प्रयास कर रही है, उससे जाहिर है कि वह आदिवासी वोटों को लेकर सबसे ज्यादा आशंकित है. खास कर आदिवासी बहुल इलाकों में भाजपा जिस तरह की  राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दिखा रही है, वह उसकी बेचैनी को समझने के लिए काफी है.

हालांकि झामुमो या कोई अन्य दल भी आश्वस्त नहीं है कि आदिवासी नारजगी का लाभ उन्हें मिलेगा या नहीं.

जल, जंगल, जमीन के साथ ही स्वशासन के अनेक ऐसे मुद्दे हैं जो आदिवासियों के दिल में धड़कते रहते हैं. और उन्हें लगता है कि कारपोरेटपरस्ती का इस दौर में उनकी अस्मिता के ये सवाल बेहद नाजुक हालत में हैं.

चुनाव में इस तरह की प्रवृति वोटरों में यदि बूथ तक प्रभावी रही तो मुख्यधारा के दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. दूसरी ओर आदिवासियों के सामने भी यह समस्या है कि क्या इन सवालों पर वे टिके रहेंगे या भावनात्मक नारों के शिकार हो जायेंगे.

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