
Jalpaiguri : जलपाईगुड़ी के बैकुंठपुर में विगत 500 से अधिक सालों से लगातार हो रही ऐतिहासिक दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. यहां के राजबाड़ी में आज भी ठीक उसी तरह से पूजा होती है जैसी आज से 510 साल पहले होती थी. तब राजा थे और राजपाट भी था लेकिन आज न तो राजा हैं और न ही राजपाट, पर पूजा की विधि जस की तस है.
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नियमानुसार जन्माष्टमी उत्सव के बाद राजबाड़ी के प्रांगण में दही मिट्टी खेल होता है. इसमें बच्चे प्रांगण की उस मिट्टी में खेलते हैं, जिसमें पुरोहित दही मिला देते हैं. राजघराने से ही यह परंपरा बनायी गयी थी. बच्चों के खेलने के बाद उनके पैरों तले रौंद कर जो मिट्टी बच जाती है उसे उठा कर उसी से मां दुर्गा की प्रतिमा बनायी जाती थी और पूजा होती थी. यह परंपरा आज भी कायम है. इस बार भी जन्माष्टमी का त्यौहार बीत चुका है और उस मिट्टी को लेकर अब नाट्य मंदिर में रख दिया गया है. इस मिट्टी की खासियत यह है कि जब इसमें बच्चे खेलते हैं उसके पहले इसमें दही मिलायी जाती है. यही राजघराने की पूजा की विधि रही है जो विगत 510 सालों से चली आ रही है.
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राज परिवार के सदस्य प्रनत कुमार बसु ने कहा कि पिछले 510 सालों से इसी तरह से पूजा होती रही है और इस बार भी इसकी तैयारियां शुरू कर दी गयी हैं. इस बार जन्माष्टमी पर नंद उत्सव के बाद दही मिट्टी का खेल संपन्न हो चुका है. इसकी मिट्टी लेकर नाट्य मंदिर में रखी गयी है. जब देवी की मूर्ति गढ़ी जायेगी तो उसमें मिलायी जायेगी. प्रतिमा बनाने वाले शिल्पकार सुभाष पाल ने बताया कि पहले असम से योगेश्वर पाल प्रतिमा बनाने के लिए आते थे. उसके बाद लंबे समय तक उनके बेटे ने प्रतिमा बनायी थी. अब विगत 10 सालों से राजबाड़ी की प्रतिमा बनाने का काम वह कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुकी दुर्गा पूजा चंद दिनों के अंदर शुरू होनेवाली है. वैसे तो इसकी तैयारियां साल भर पहले से ही शुरू हो जाती हैं लेकिन अब बड़े पैमाने पर जगह-जगह प्रतिमा निर्माण और अन्य आयोजन होने लगे हैं.
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