
- अनुसूचित जाति के विकास में इस्तेमाल होनेवाले फंड्स में भी गिरावट का ट्रेंड
- ग्रामीण विकास, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के फंड में भी गिरावट का ट्रेंड
Ranchi: नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स के बीना पलिकल ने केन्द्रीय बजट का विशलेषण कर कहा कि मोदी सरकार के दौरान आदिवासियों और दलितों के विकास में खर्च की जानेवाली राशि में कटौती की गयी है.
पीएचडी और इसके बाद के कोर्सेज के लिए फेलोशिप और स्कॉलरशिप में 2014-15 से लगातार गिरावट आयी है. साथ ही यूजीसी और इग्नू में एससी और एसटी समुदाय के छात्रों के लिए हायर एजुकेशन फंड्स में क्रमश: 23 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की कमी की गयी है.
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा शुक्रवार को पेश किये गये बजट में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखनेवाले छात्र-छात्राओं के प्री मौट्रिक और पोस्ट मौट्रिक मिलनेवाली छात्रवृत्ति पर खर्च होने वाले फंड में कटौती कर दी गयी है. दलित और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करनेवाले समूहों के आकलन में इस बात का दावा किया गया है.
नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स के बीना पलिकल के मुताबिक एससी स्टूडेंट्स को मैट्रिक के बाद मिलनेवाली छात्रवृत्ति के लिए इस साल बजट में 2926 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि पिछले साल यह रकम 3 हजार करोड़ रुपये थी. पलिकल के मुताबिक, एसटी स्टूडेंट्स के लिए मैट्रिक के बाद मिलनेवाली छात्रवृति के मद में 2018-19 में 1,643 करोड़ रुपये के फंड का प्रावधान था, जो इस साल 1,613 करोड़ रुपये है.
नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स के मुताबिक, पीएचडी और इसके बाद के कोर्सेज के लिए फेलोशिप और स्कॉलरशिप में 2014-15 से लगातार गिरावट आयी है. इसके मुताबिक, एससी के लिए यह रकम 602 करोड़ रुपये से घट कर 283 करोड़ रुपये हो गयी, जबकि एसटी स्टूडेंट्स के लिए यह 439 करोड़ रुपये से कम होकर 135 करोड़ रुपये हो गयी. इसी प्रकार से यूजीसी और इग्नू में एससी और एसटी समुदाय के छात्रों के लिए हायर एजुकेशन फंड्स में क्रमश: 23 पर्सेंट और 50 पर्सेंट की गिरावट हुई.
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नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स के मुताबिक, सामाजिक कल्याण और आधिकारिता मंत्रालय के लिए आवंटित फंड में भी कमी की गयी है. अनुसूचित जाति के विकास में इस्तेमाल होनेवाले फंड्स में गिरावट का ट्रेंड ग्रामीण विकास, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय आदि में भी देखने को मिला है. एसटी समुदाय के नजरिए से सबसे खराब हालत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की है. वहीं, आदिवासी मामलों के मंत्रालय के फंड्स में थोड़ा ही इजाफा हुआ है.
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