
डॉ. स्वामी दिव्यानंद जी महाराज (डॉ. सुनील बर्मन)
श्री
दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कुष्मांडा हैं. अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कुष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है. नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है. श्री कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं.
इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है. माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है. इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं.
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दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है
कुत्सित: कुष्मा कुष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डेमांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कुष्मांडा.
इसका अर्थ है वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कुष्माण्डा हैं. देवी कुष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं. जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयीं और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ. इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं. देवी कुष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा धारण करती हैं. देवी के आठवें हाथ
में बिजरंके (कमल फूल का बीज) की माला है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है. देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं. जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है.
देवी कुष्मांडा पूजा विधि
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जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी आराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कुष्माण्डा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को अनहत चक्र (Anhat chakra) में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए. इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कुष्माण्डा सफलता प्रदान करती हैं जिससे व्यक्ति सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है और मां का अनुग्रह प्राप्त करता है. दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कुष्माण्डा की पूजा का विधान उसी प्रकार है जिस प्रकार देवी ब्रह्मचारिणी और चन्द्रघंटा की पूजा की जाती है. इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कुष्माण्डा की पूजा करें. पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें –“सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च. दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु मे..” देवी की पूजा के पश्चात महादेव और परम पिता की पूजा करनी चाहिए. श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए.



