
Faisal Anurag
दिल्ली जैसी राजधानी में, पिछले तीन दिनों में तीन बार जिस तरह लोगों को निशाना बना कर गोली चलायी गयी है, वह सामान्य नहीं है. गंभीर पहलू यह है कि दो घटनाओं में पुलिस हाथ बांधे चुपचाप खड़ी रही. तमंचा का इस तरह खुले आम उपयोग किसकी शह पर हो रहा है.
खासतौर पर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के एक नारे के बाद इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वालों का मनोबल बढ़ा है. केंद्र के कई अन्य मंत्री अनुराग ठाकुर के नारे का समर्थन कर रहे हैं. इसमें मंत्री गिरिराज सिंह काफी मुखर हैं.
अपराध की इन घटनाओं को इस तरह पेश करने का अभियान रहा है कि गोली चलाना कोई अपराध नहीं है. जामिया यूनिवर्सिटी में उस समय छात्रों पर गोली चली जब वे विरोध मार्च निकाल रहे थे. दूसरी घटना शाहीनबाग में हुई. गोली चलाने वाले ने ठीक पुलिस के पीछे खड़ा हो गोली चलायी.
इसे भी पढ़ेंः #CoronaVirus: चीन का एक और कदम,10 दिन में बने अस्पताल में मरीजों की भर्ती शुरू
वायरल तस्वीरों और वीडियो में दिल्ली पुलिस के अफसर और जवान बिना हलचल के खड़े दिख रहे हैं. तीसरी घटना देर रात जामिया में ही हुई जब स्कूटर सवार दो लोगों ने गोली चलायी. कुल मिलाकर माहौल ऐसा बन गया है कि दिल्ली के चुनाव में गोली चलाने वाले गैंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
गोली चलाने वाले को भटका हुआ नौजवान बताया जा रहा है. जबकि यह घटना आतंक की है. दिल्ली में चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, हिंसा की बातें ज्यादा हो रही हैं. केंद्र के मंत्री के साथ सांसद और अब तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं.
साफ है कि भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माहौल को गहरा कर रही है. ताकि उससे वोट हासिल हो सके. 2015 के विधानसभा चुनाव में मात्र तीन सीट जीतने वाली भाजपा की बेचैनी साफ दिख रही है.
इसे भी पढ़ेंः #Bihar के लिये आपदा प्रबंधन व नगर निकायों की अनुदान राशि में तीन गुना बढ़ोतरी: डिप्टी सीएम
केंद्र सरकार सीएए-एनआरसी के विरोध में चल रहे आंदोलनों के गांधीवाद से बेहद परेशन है. पहले तो उसने कठोर दमन का रास्ता चुना. लेकिन जैसे-जैसे प्रदर्शन और धरना शांति, गांधी की राह और संविधान की प्रस्तावना का पाठ सख्ती से लागू होने लगा, सरकार के लिए दमन का रास्ता कठिन होता गया.
सिर्फ दिल्ली नहीं, देश भर में जिस तरह गांधी की चर्चा हुई, और आंदोलनकारियों ने गांधी की राह के प्रति दृढता दिखायी, यह समझना कठिन हो गया कि इससे कैसे निपटा जाये. यही नहीं सभी धार्मिक समूहों की बढ़ती भागीदारी ने भी सरकार को परेशान कर दिया है. ऐसे हालात में ही अनुराग ठाकुर ने देश के गद्दारों को गोली मारने का आह्वान किया. और सांसद प्रवेश वर्मा ने तो सारी सीमाएं तोड़ दीं.
यूपी के मुख्यमंत्री तो सांप्रदायिक प्रचार के लिए कुख्यात हैं. उन्होंने अपने चुनावी भाषणों को एकबार फिर तीखा किया है. आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप करने की जोरदार मांग की है. लेकिन चुनाव आयोग की छवि यह बन गयी है कि वह किसी भी तरह की कार्रवाई करने से परहेज कर रहा है.
हेट स्पीच के बावजूद चुनाव आयोग कुछ घंटों का प्रतिबंध लगा कर माहौल को बिगड़ने से नहीं रोक पा रहा है. लोकसभा चुनाव के समय ही आयोग पक्षपात करने के आरोप से घिरा हुआ है. दिल्ली चुनाव ने तो उसे बेपर्दा करना ही शुरू कर दिया है.
सवाल उठता है कि दिल्ली विधानसभा, जिसके पास अत्यंत सीमित अधिकार हैं, उसे जीतने की इतनी बेचैनी भाजपा क्यों दिखा रही है. अमित शाह गली-गली और घर-घर जा कर जिस तरह पर्चा बांट रहे हैं, वह बताता है कि भाजपा बहुत ज्यादा परेशान है. भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है. अंतिम कुछ दिनो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसमें झोंक देने की योजना है.
किसी भी अन्य राज्य के चुनाव में ऐसा कम ही हुआ है. सीएए लागू किये जाने के बाद भी झारखंड के चुनाव में भाजपा बुरी तरह हारी. महाराष्ट्र जैसे बड़े-बड़े राज्य की सत्ता से वह वंचित रह गयी. हरियाणा में भी उसे बहुमत नहीं मिल सका. इन तीन राज्यों के चुनाव में मिली हार के अपने अपने निहितार्थ हैं. भाजपा इनके राजनीतिक संदेश समझ नहीं पा रही है.
भाजपा यह समझ ही नहीं पा रही है कि पिछले साल मई तक केंद्र में भारी जीत के बाद उसके हाथ से जीत क्यों फिसल रही है. भाजपा जिस तरह का एजेंडा ले कर चल रही है, उसे शाहीनबागों ने गंभीर चुनौती दे दी है. दिल्ली के शाहीनबाग ने विरोध धरना के पचास दिन पूरे कर लिये हैं. इसमें शामिल होने वाली एक महिला की छोटी बेटी एक तारीख को भीषण ठंढ से दम तोड़ चुकी है.
बावजूद उस महिला का हौसला पस्त नहीं हुआ है. वह कौन सा कारक है कि शाहीनबाग हर दिन एक नई उड़ान भर रहा है. और उसका असर देश के विभिन्न हिस्सों में दिख रहा है. पूरे देश में साठ से अधिक शाहीनबाग अब तक उभर चुके हैं.
रांची में ही पिछले 14 दिनों से लगातार कडरू में मलिाएं धरना दे रही हैं. भारत के इतिहास में इस तरह के आंदोलन की कोई मिसाल नहीं ही दिखती है. शाहीनबाग ने देश के तमाम हिस्से और समुदायों में अपनी पहचान और जगह बना लिया है.
गांधी को हिंसा नहीं हरा सकती है. 21वीं सदी का यह सबसे बड़ा संदेश है. इन आंदोलनों ने नफरत को हराने के लिए अब तक नफरत का सहारा नहीं लिया है. यह एक गैरमामूली बात है.
इसे भी पढ़ेंः बोर्ड, निगम में रिक्त पदों को भरने की तैयारी, CS ने मांगी जानकारी, जानें कौन-कौन बोर्ड-निगम हैं महत्वपूर्ण




