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छह इंच छोटा करने का अधिकार किस कानून ने दिया है डीजीपी साहब

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Faisal Anurag

आजकल भाषा की मर्यादा को तार-तार करने की होड़ लगी हुयी है. जो जितने बड़े पद पर है उसकी जुबान भी उसी तरह फिसलती है. इससे ना केवल भाषा अपना अर्थ खोती है बल्कि इसका असर भी समाज पर नकारातमक पड़ता है. इसी क्रम में झारखंड के डीजीपी ने ना केवल अपने पद की मर्यादा  को तार-तार किया है बल्कि मानवाधिकार के मानक सभी लोकतांत्रिक मूल्यों की भी फजीहत कर दी है. साथ ही यह बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर वो पुलिस बल को क्या संदेश देना चाहते हैं. झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय ने कहा है कि विकास का विरोध करने वालों को वह छह इंच छोटा कर देंगे. डीजीपी को किस कानून के तहत किसी को छह इंच छोटा करने का अधिकार है. क्या डीजीपी इस बात को स्पष्ट करेंगे कि कानून की किस धारा के तहत उन्हें किसी को छह इंच छोटा करने का अधिकार प्राप्त है. एक लोकतांत्रिक देश में क्या पुलिस के किसी भी अधिकारी को किसी को भी छह इंचा छोटा करने का अधिकार है ?

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झारखंड में शीर्ष पदों पर बैठे अनेक व्यक्ति हैं जो अक्सर धमकी भरी बातें करते रहते हैं. इसका असर अब तक कहीं भी दिखायी नहीं पड़ा है. राज्य पुलिस पहले ही अनेक मामलों के विवादों में फंसी हुई है. डीजीपी की इस बात से पुलिस की छवि को लेकर अनेक सवाल भी पैदा हुए  हैं. क्या पुलिस को विकास कार्यों के नीतिगत सवालों और उसकी गतिविधियों पर किसी तरह की कार्रवाई करने का अधिकार है. विकास कार्यों का शांतिपूर्ण विरोध किस कानून के तहत गलत है. क्या भारत का संविधान लोगों को नीतियों से असहमत होने, उसका विरोध करने का अधिकार देता है. सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी करता रहता है.

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झारखंड के डीजीपी डीके पांडेय इसके पहले भी कई बार धमकी भरे शब्दों का सार्वजनिक मंच पर इस्तेमाल करते रहे हैं. पिछले दिनों जब एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने भाजपा प्रवक्ताओं से भी आगे बढ़कर सरकार की प्रशांसा की तो देश भर में उसकी चर्चा और आलोचना हुई. सोशल मीडिया पर तो अनेक प्रतिक्रियाएं दी गयी. जिसमें डीजीपी की खुली आलोचना की गयी. इसके बाद से चर्चा यह भी है कि उनके भीतर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिलोरें ले रही है और इस तरह की बातें वे जानबूझ कर करते हैं.

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ताजा बयान भी विवाद का कारण बना है क्योंकि उनकी चुनौती उन तमाम लोगों के खिलाफ है जो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के कारण योजनाओं का विरोध करते हैं. क्या झारखंड की सरकार तमाम विरोधों को कुचलने का तानाशाही तरीका अपनाने का फैसला ले चुकी है. कई सारे विरोधी कहने भी लगे हैं कि झारखंड में एक अघोषित आपातकाल लागू है और इसमें अधिकारियों को बेतहाशा अधिकार दे दिए गए हैं जिनके लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई खास महत्व नहीं रह गया है.

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नक्सलियों के खिलाफ इस तरह की सरकारी भाषा पिछले दिनों खूब इस्तेमाल हुई. लेकिन अब शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने वालों को भी छह इंच छोटा करने की धमकी दी जा रही है. कल को इस धमकी की चपेट में पढ़ने-लिखने वालों को भी लिया जा सकता है. 2014 के बाद से देश में जिस तरह देशद्रोह के मामलों में लोगों को लेने की प्रक्रिया चल रही है उससे लोकतांत्रिक माहौल को काफी कुठाराघात झेलना पड़ा है. सरकार के निर्दश पर उठाए गए इन कदमों को कोर्ट ने लगातार खारिज कर बता दिया है कि सरकार के कदम में राजनीति बदले की भावना है. उसका कोई ठोस तर्क नहीं है. इसी तरह एनकाउंटर की घटनाओं ने भी देश के कई राज्यों में कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन किया है और अनेक निर्दोष उसके शिकार हुए हैं. अब तो राजनीतिक तौर पर विरोध करने वालों को छह इंच छोटा करने की खुली धमकी दी गयी है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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