
Gaurav Sharma
दिल्ली में भाजपा अपनी गलतियों के भंवरजाल में बुरी तरह उलझ गयी है. चुनाव घोषणा से पहले मनोज तिवारी, गौतम गंभीर, विजय गोयल, मीनाक्षी लेखी, कपिल मिश्रा इत्यादि को आगे किया. मनोज तिवारी ने बिजली पानी जैसी योजनाओं में केजरीवाल से दस गुना ज्यादा सब्सिडी देने की बात कह कर बीजेपी को उलझा दिया.
केजरीवाल के मुकाबले कौन? इस सवाल का जवाब न होने के कारण मोदी को सामने लाया गया. फिर यह बात समझ में आयी कि दिल्ली में केजरीवाल की आंधी के सामने मोदी ब्रांड फीका पड़ने का डर है, तो अमित शाह को आगे किया. अमित शाह ने धार्मिक भावना भड़काने की कोशिश की.
लेकिन आम आदमी पार्टी ने स्कूल, अस्पताल, बिजली-पानी पर फोकस रखा.
ऐसे में अमित शाह ने सीसीटीवी का वादा पूरा न होने का आरोप लगाया. जवाब में AAP ने ऐसे सीसीटीवी फुटेज जारी कर दिये, जिनमें अमित शाह गलियों में घूमते दिखे.
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तब अमित शाह ने दिल्ली के स्कूलों पर नकारात्मक टिप्पणी की. जवाब में केजरीवाल ने उन्हें साथ चल कर स्कूल देखने का न्योता दिया.
तब बीजेपी सांसदों ने दिल्ली के स्कूलों का दौरा करके उनकी कमियां गिनाईं, जिसे खुद अमित शाह ने जारी किया. लेकिन हैरानी की बात है कि भाजपा सांसदों की रिपोर्ट बकवास का पुलिंदा थी. इससे अमित शाह की जबरदस्त किरकिरी हुई.
एक सांसद ने 6 माह पहले बंद स्कूल का वीडियो जारी किया था. दूसरे सांसद ने स्कूल के मल्टी एक्टिविटी हॉल में बिछी दरी दिखा कर कहा कि यहां बेंच डेस्क नहीं है. तीसरे सांसद ने एक स्कूल के पुराने कमरे दिखा दिये जबकि उसी कैम्प्स में शानदार नया भवन है. ऐसे सहयोगियों के भरोसे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की भयंकर किरकिरी हो गयी.
दिल्ली के चुनाव को विकास के बदले धार्मिक उन्माद में धकेलने की कोशिश भी विफल है.
शाहीनबाग मामले में आम आदमी पार्टी को उलझाने की कोशिशें भी नाकाम हैं. दिल्लीवाले जानते हैं कि पुलिस पर AAP का नहीं, भाजपा का नियंत्रण है. इसलिए शाहीनबाग को लेकर AAP पर किये गये हमलों से खुद भाजपा ही हास्यास्पद होती जा रही है.
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दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली में भाजपा की हर रणनीति का उल्टा असर हो रहा है. विभिन्न राज्यों के वर्तमान अथवा पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के 200 सांसदों को दिल्ली के चुनाव प्रचार में उतारने की रणनीति भी उल्टी पड़ सकती है. यूपी, हरियाणा, झारखंड जैसे राज्यों में स्कूलों व अस्पतालों की बुरी हालत से दिल्लीवाले वाकिफ हैं. इसलिए इन राज्यों के नेता आकर स्कूल अस्पताल की बात करें, तो दिल्लीवालों का मनोरंजन ही होगा.
एक महत्वपूर्ण बात यह भी हुई है कि इस बार कांग्रेस महज औपचारिकता के तौर पर चुनाव लड़ रही है. भाजपा और आप का सीधा मुकाबला साफ दिखता है. सचिन पायलट जैसे नेताओं के बयान से भी यह धारणा प्रबल हुई है कि कांग्रेस ने किसी रणनीति के तहत दिल्ली में खुद को इस चुनाव में समेट रखा है ताकि अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी पराजय से भाजपा का मनोबल कमजोर हो.
दिल्ली में केजरीवाल के मुकाबले बीजेपी के पास न कोई नेता है, न नीति. इसका भरपूर लाभ AAP को मिल रहा है जबकि भाजपा अपनी हर हताशापूर्ण कोशिश में उलझती जा रही है.
अमित शाह ने कहा कि हम दिल्ली को वर्ल्ड क्लास राजधानी बना देंगे. दिल्ली वाले पूछ रहे हैं- लखनऊ और बनारस को क्यों नहीं बनाया?
भाजपा अब दिल्लीवालों से जो भी वादे कर रही है, उस पर यही सवाल आता है कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में ऐसा क्यों नहीं किया? जाहिर है कि प्रचार के लिए अन्य राज्यों से आये नेताओं की भीड़ से लाभ के बदले नुकसान होने की संभावना ज्यादा होगी.
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