
Faisal Anurag
झारखंड, बिहार और उत्तरप्रदेश में पार्टियों का नेतृत्व संभाल रहे युवा नेताओं के लिए आम चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है. झारखंड मुक्ति मोरचा, राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी अपने युवा नेताओं के नेतृत्व में चुनाव मेदान में हैं.
इन नेताओं ने गठबंधन बनाने और टिकट बंटवारे में मुख्य भूमिका निभायी है. इन तीनों दलों के सुप्रीमो क्रमशः शिबू सारेन, लालू प्रसाद ओर मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकारी क्रमशः हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव हैं. जिन्होंने मोर्चा संभाल रखा है.
इन तीनों नेताओं में कई समानताएं भी हैं. उनकी अलग-अलग विषेशताओं की चर्चा भी राजनीतिक गलियारे में है. इसके अलावे अन्य युवा भी क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व कर रह हैं. इसमें सुप्रिया सुले और अजीत पवार लगभग शरद पवार की विरासत को इस बार संभाल रहे हैं. एनसीपी में इन दोनो ही नेताओं की निर्णायक भूमिका है. करूणानिधि के बाद स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके पहली बार चुनाव मैदान में है.
बड़े राज्यों में इन नेताओं के राजनीतिक कौशल की परीक्षा है. शिवसेना के उद्धव ठाकरे और जगनमोहन रेड्डी भी युवा हैं. लेकिन पिछले आमचुनाव में भी उनके कौशल और रणनीतिक सूझबूझ को महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के मतदाता देख चुहे हैं. हिंदी पट्टी के इन नेताओं में दो अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. जबकि बिहार में तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं.
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बिहार का चुनाव कई कई अर्थो में बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देगा. इसमें एक ओर जहां लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में तेजस्वी पर सबकी निगाह है, वहीं नितीश कुमार के लिए भी यह चुनावों कई मायनों में अहम साबित होगा. पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव समाजवार्दी पार्टी को दुबारा सत्ता में लाने में कारगर नहीं हो पाये थे.
तब पार्टी के भीतर उनका नेतृत्व भी कई दिग्गजों के लिए बहुत सहज नहीं था. मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल यादव की भूमिका भी अखिलेश के लिए बडी चुनौती थी.
लेकिन अखिलेश यादव न केवल समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा बन चुके हैं बल्कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव की पार्टी से पूरी विरासत हासिल कर चुके हैं. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव सपा से अलग हो गये हैं. हैं.
अखिलेश यादव ने मायावती के साथ मिल का एक मजबूत गठबंधन बना लिया है जिसमें अजित सिंह का लोकदल भी शामिल है. यदि वोट प्रतिशत देखा जाये तो यह गठबंधन सामाजिक शक्तियों के नजरिए से बेहद मजबूत दिखता है. और 2014 के वोट प्रतिशत भी उनके गठबंधन और उससे होने वाली राजनीतिक प्रक्रिया में बढ़त दिला रहे हैं.
यह हकीकत भाजपा के लिए परेशानी का सबब हैं. 2015 के बाद से हुए बहुतायत उपचुनावों में भाजपा की पराजय से इन ताकतों के गठबंधन की ताकत का पता चलता है.
तब तो बिना गठबंध उन्हें कामयाबी मिली. यूपी में गठबंधन नेताओं की चाहत और राजनीतिक बाध्यता से कहीं उन पार्टियों के मतदाताओं के दबाव का परिणाम भी यह है. इसमें कांग्रेस की अनुपस्थिति से राजनीतिक वृत पूरा नहीं दिखता है.
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लेकिन उम्मीदवारों के चयन से कहा जा रहा है कि ज्यादातर सीटों पर इन दलों के बीच एक अघोषित गठबंधन भी कार्यशील है. हालांकि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को मैदान में उतार दिया है. चुनावों में कांग्रेस की कामयाबी और नाकामयाबी प्रियंका गांधी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद दिलचस्प संकेत देगा.
देखा जा रहा है कि प्रियंका गांधी भीड़ जुटाने में कामयाब हैं और उनकी प्रचार शैली में उनका अनोखापन भी है. इन युवा नेताओं में अजित सिंह के पुत्र जयंत सिंह की भी परीक्षा हो रही है. वे अनेक उपचुनावों ओर राजस्थान विधानसभा चुनावों में कारगर कौशल दिखा चुके हैं.
उनका लोकदल इस गठबंधन का सबसे छोटा घटक है. इसलिए उनकी कम ही बात हो रही है. चौधरी चरण सिंह की विरासत को जयंत नया संदर्भ दे रहे हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना असर साबित करने के लिए पूरी मेहनत करते दिख रहे हैं. जयंत के भाषण कौशल और जनसंवाद के तरीके की भी तारीफ हो रही है.
बिहार में तेजस्वी यादव महागठबंधन के चुनाव अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. लालू प्रसाद की कमी बिहार में महसूस की जा रही है. लालू प्रसाद के वोट बैंक में इसे लेकर चर्चा भी है. लेकिन तेजस्वी राजद के पारिवारिक संकट के बीच बिल्कुल आगे बढ़ कर नेतृत्व दे रहे हैं.
उनकी सभाओं में भारी भीड़ हो रही है और और वे बिल्कुल अलग अंदाज में राजद के जनाधार को संबोधित कर रहे हैं. इस बीच उनके बडे भाई तेज प्रताप के विद्रोह का भी डन्हें समाना करना पड़ रहा है. लेकिन वे बिना धैर्य खोये मोदी-नितीश पर राजनीतिक प्रहार कर रहे हैं.
राजद की सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता को अपना प्रमुख हथियार बनाने में कारगर हो रहे हैं. तेजस्वी यादव ने जिस तरह गठबंधन के नेताओं के बीच तालमेल बनाया है, उस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की नजर है. कई वरिष्ठ पत्रकार प्रेक्षक भी कह रहे हैं कि राजद को तेजस्वी एक नया आयाम दे रहे हैं और यह लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा है.
झारखंड में हेमंत सोरेन भी गठबंधन बनाने में कारगर हुए हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होने झामुमो का नेतृत्व किया था. गठबंधन के करारण उनकी पार्टी में मतभेद के स्वर भी उठे हैं लेकिन पार्टी पर उनकी पकड़ बनी हुई है.
उन्होंने अपने विधायकों में एक दो को छोड़ कर शेष को गठबंधन की ताकत बनाने का प्रयास भी किया है. हेमंत सोरेन ने गठबंधन बनाने की प्रक्रिया में ही यह तय करा लिया है कि विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में गठबंधन लड़ेगा.
हेमंत सोरेन को विधानसभा चुनाव के पहले के इस चुनाव में यह साबित भी करना पड़ेगा. इस चुनाव के नतीजे का झारखंड की राजनीति पर गहरा असर होगा. हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव के नेतृत्व की क्षमता और भविष्य की राजनीतिक दिशा इस चुनाव के परिणाम तय करेंगे.
इन तीन राज्यों में इन तीनों के पिताओं के राजनीतिक कौशल और जनता पर पकड़ ने कई नये आयाम बनाये हैं. देखना है कि ये तीनों उसे कितना आगे ले जाने में कारगर हैं. ये तीनों नेता अगर चुनाव परिणाम को अपने अनुकूल करने में असफल होते हैं तो उन्हें अपनी-अपनी पार्टियों के भीतर के असंतोष से जूझना होगा. और फिर पार्टियों की एकजुटता को बनाये रखना एक अलग टास्क होगा.
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