Opinion

अब तक तीन फेज के वोटर टर्नआउट के संकेत सत्तापक्ष की बेचैनी बढ़ा रहे हैं

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Faisal Anurag

अब तक तीन फेज के चुनाव में मतदाताओं के वोट प्रतिशत को ले कर भाजपा सहित कई राजनीतिक दलों में बेचैनी गहरा गयी है. इसका एक कारण तो यह है कि वोट प्रतिशत के कम होने का सीधा असर सत्तारूढ़ खेमे की सेहत पर पड़ता है. 1952 से अब तक हुए तमाम चुनावों के वोट प्रतिशत बताते हैं कि जब कभी मतदाताओं का टर्नआउट कम हुआ है, सत्ता पक्ष को सीटों का नुकसान झेलना पड़ा है. इस बार प्रमुख राज्यों के वोटर ने राजनीतिक रहस्य को बढ़ा दिया है और भविष्यवाणी करने वालों के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है.

एक बात तो साफ है कि 2019 के चुनावों को ले कर राजनीतिक दलों ने नरेटिव बनाया है. मतदाताओं का रूझान उससे मेल नहीं खाता है. मतदाता न केवल खामोश हैं बल्कि उनमें उत्साह भी बहुत ज्यादा नहीं है.

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तीन फेज का टर्नआउट बताता हे कि कई प्रमुख राज्यों में मत-प्रतिशत उत्साहजनक नहीं है. मतदाताओं की निराशा इससे जाहिर हो रही है. शेष बचे फेज में यदि मतदाताओं का रूझान ऐसा ही रहा तो चुनावी परिणाम की दिशा अब तक के तमाम चुनाव सर्वेक्षणों को झुठला देंगे.

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खासतौर पर भाजपा की रणनीति और चुनावी प्रचार हर फेज के बाद बदल रहे हैं. उससे भाजपा की बेचैनी भी झलक रही है.

प्रधानमंत्री ने तो जिस तरह पिछडा कार्ड खेला है उससे जाहिर होता है कि उसने जिस सवालों को  लेकर मतदाताओं को प्रभावित करने का एजेंडा बनाया था वह उसके लिए संतोषजनक नहीं हे. लगातार गोलपोस्ट का शिफट होना किसी भी राजनीतिक दल के आत्मविश्वास की कमी को ही दिखाता है.

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भारत में वोट प्रतिशत के रूझान के राजनीतिक संदेश बेहद दिलचस्प हैं. आजादी के बाद हुए हालिया आम चुनाव में 66.6 प्रतिशत वोटर टर्नआउट से कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की थी.

1957 के दूसरे आम चुनाव में यही रूझान बना रहा और वोट प्रतिशत भी लगभग एक समान ही रहा. लेकिन 1962 के चुनाव में वोट प्रतिशत घट कर 55.4 प्रतिशत हो गया और कांग्रेस को पहली बार सीटों का भारी नुकसान हुआ. हालांकि उनको कंफर्ट  बहुमत मिल गया.

1967 का चुनाव भारत की राजनीति में राजनीतिक विमर्श के नजरिये से बहुत अहम साबित हुआ है. गैर कांग्रेस दलों के आंदोलनों के भारत के राजनीतिक पटल पर पहली बार अपनी मजबूत दस्तक दर्ज  किया. मतदाताओं में भी 1962 के बीच इसका असर यह हुआ की मत प्रतिशत तो बढा लेकिन वह सत्ता के बदलाव के लिए पर्याप्त नहीं था.

61 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने वोट अधिकार का इस्तेमाल किया और विपक्ष सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने में भी कामयाब हुआ. वह चुनाव नेहरू के बाद का पहला चुनाव था और  इस बीच ताशकंद में शास्त्री का भी निधन हो चुका था.

कांग्रेस ने बहुमत जरूर हासिल किया. लेकिन राजनीतिक विमर्श की दिशा बदलने का संकेत यह चुनाव दे गया.

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1971 में कांग्रेस के विभाजन के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी ने बहुमत हासिल किया. हालांकि 67 की तुलना में कम मतदान हुआ. लेकिन वोटर टर्नआउट ने भारत की राजनीति में विपक्ष के नेरेटिव को मजबूत ही बनाया.

1977 का चुनाव इस अर्थ में बेहद अलग जमीन पर लड़ा गया. इस बीच देश इमरजेंसी का मुकाबला कर चुका था और विपक्ष पूरी तरह गोलबंद था. लेकिन इस चुनाव का नेरेटिव लोकतंत्र की बहाली था और मतदाताओं ने इस सवाल पर पहली बार कांग्रेस की.

कांग्रेस को  60.5 प्रतिश्रात टर्नआउट के साथ बेदखल कर दिया. लेकिन इसके बाद के चुनाव का नरेटिव यह है कि कम मतदान प्रतिशत से सत्तापक्ष को नुकसान ही झेलना पड रहा है. 1980 में वोट तो 56.9 प्रतिशत पड़े लेकिन कांग्रेस की वापसी इससे हो गयी और जनता दल का प्रयास  कोमयाब नहीं हुआ. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में एक हुए चुनाव में एक बार फिर वोटर टर्नआउट बढा और कांग्रेस को भारी जीत मिली.

1984 का चुनाव भारत की राजनीति में बिल्कुल अलग नरेटिव है जिसमें इंदिरा गांधी की मौत की सहानुभूति का व्यापक असर पडा है. लेकिन 1989 में वोट प्रतिशत घटा और 61.9 प्रतिशत हुआ. लेकिन इससे कांग्रेस ने बहुमत खो दिया और सत्ता से दूसरी बार बाहर हो गयी.

1991 के चुनाव के बीच ही राजीव गांधी की हत्या हो गयी. बावजूद इसके वोटर प्रतिशत घटा. और 56 प्रतिशत मतदाताओं ने कांग्रेस को सबसे बड़े दल के रूप में पहली बार एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करने का अवसर दिया जो बहुमत की सरकार नहीं थी.

लेकिन उसने सरकार चलाने के लिए समर्थन हासिल कर लिया था. 96 और 98 के  चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता से बाहर हुई और 98 और 99 के मध्यावधि चुनावों में मामूली वोट के कम और बढने की स्थिति में सरकारें बदली रहीं.  2014 के चुनाव में 58 प्रतिशत वोट पड़े और शाइनिंग इंडिया के चकाचौंध के बावजूद 99 के वोट प्रतिशत 60 की तुलना में ये कम ही रहे और एनडीए सत्ता से बाहर हो गयी.

2009 में वोट रूझान 1 प्रतिशत कम रहा लेकिन यूपीए को समर्थन मिल गया. 2014 में भारी वोट उछाल से भाजपा ने पहली बार बहुमत हासिल किया. तीन फेज के वोट रूझान यदि आगे भी जारी रहे तो यह 2004 की तरह साबित होगा, यह संभावना जानकार व्यक्त कर रहे हैं.

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