Opinion

इस चुनाव में भी पर्यावरण नहीं बन पाया किसी भी दल का मुद्दा

Faisal Anurag

विकसित दुनिया के लगभग सभी लोकतंत्र के चुनावों में क्लाइमेट चेंज का मुद्दा जीतहार तय करने की स्थिति में तेजी से उभर रहा है. जबकि भारत जैने अनेक देशों में इस सवाल की चर्चा की चुनावों में नहीं होती.

भारत के राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र में तो पर्यावरण का सवाल बेमन से लिखे गये चंद शब्द में जहां-तहां ही दिखते हैं. यह हाल तब है जब भारत ने क्लाइमेट चेंज के वल्र्ड सबमिट में कई बार बडी भूमिका भी निभायी है.

ग्लोबल वार्मिग का सवाल भारत के सहित अनेक देशों के गरीबों के लिए लगातार घातक बनता जा रहा है. यह प्रकृति का तो नुकसान कर ही रहा है. लेकिन दुनिया के विकसित देश अपने वायदे से लगातार मुस्कराते हुए ग्लोबल वार्मिग को बढाने वाली बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

अमेरिकी प्रसिडेंट ट्रंप ने तो क्लाइमेट चेंज के विश्व अभियान से खुद को अलग कर लिया है. दुनिया भर के बड़े कारपारेट घरानो को यह लगता है कि क्लाइमेट चेंज का बढता आंदोलन उनके मुनाफे के खिलाफ है.

दुनिया भर में यह बहस तेज हो गयी है कि विकास की जिन नीतियों पर दुनिया चल रही है उसने ऐसे विनाशकारी प्रवृति को जन्म दे दिया है जिससे मनावता और प्रकृति दोनो ही गंभीर खतरे में हैं.

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पर्यावरणविदों को तो कई देशों में विकास विरोधी साबित करने के लिए कारपारेट भारी धनराशि खर्च करता है. जिन देशों की सत्ता को क्रोनी कैपिटल ही संचालन करने लगा है वहां तो क्लाइमेट चेंज के सवाल को ही हाशिये  पर धकेल दिया गया है. अनेक फार्मों ने इस खतरे के प्रति कई बार आवाज उठायी है.

भारत में विकास की नीतियों को लेकर एक ओर जहां राजनीतिक दलों में आम सहमहति है, वहीं सामाजिक और पर्यावरणविद इन नीतियों को बेहद घातक बता रहे हैं. चुनाव के समय इस तरह के गंभीर सवालों पर शायद ही कोई चर्चा करता है जबकि ये सवाल मानवता, प्रकृति और संसाधनों के लिहाज से अत्यंत अहम हैं.

इस बार भी राजनीतिक विमर्श में इस तरह के संजीदा सवालों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. यदि राजननीतिक दलों के चुनावी वायदों को देखा जाये तो उसमें भी इसकी चर्चा नहीं है. घोषणा पत्रों में कुछ ही दलों ने इस सवाल को स्थान दिया है.

ज्बकि यह सवाल बेहद अहम है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते वैश्विक पर्यावरण को खतरा तो पैदा ही हो रहा है, इससे दुनिया में पहले से मौजूद आर्थिक असमानता की खाई भी गहरी होती जा रही है. टेलीग्राफ ने इस संबंध में हुए एक अध्ययन के विश्लेषण को प्रकाशित किया है.

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अमेरिका स्थित दो शोधकर्ताओं ने इस संबंध में एक शोध किया है. उनके मुताबिक ठंडे देश जैसे कनाडा और नार्वे की अर्थव्यवस्था को इससे फायदा हो रहा है, जबकि भारत और नाइजीरिया जैसे गर्म देशों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. ये ठंडे देश विकास के पैमाने पर पहले से ही काफी आगे हैं.

इन शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में व्याख्या की है कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है. इसमें भारत के विषय में एक रोचक बात कही गई है. अध्ययन के मुताबिक अगर ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति नहीं पैदा होती तो भारतीय अर्थव्यवस्था अभी के मुकाबले 31 फीसदी बड़ी होती.

इसी अध्ययन में बताया गया है कि कनाडा जैसे ठंडे देशों में इसका उल्टा असर हुआ है. अध्ययन के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कनाडा की अर्थव्यवस्था में 32 फीसदी का इजाफा हुआ है. जबकि नार्वे की अर्थव्यवस्था में 34 फीसदी ज्यादा बढ़ी है.

इसकी वजह से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में 9.5 फीसदी और स्वीडन में 25 फीसदी की बढ़त हुई है.

माना जाता है कि जब तापमान न ज्यादा अधिक हो और न कम तो फसलें अच्छी होती हैं. इससे लोगों की सेहत भी अच्छी रहती है. ठंडे देशों के तापमान में थोड़ा इजाफा होने से इनकी अर्थव्यवस्था की सेहत में भी सुधार होता है. जबकि पहले से गर्म देशों का तापमान और गर्म हो जाता है, जिससे वहां तमाम तरह की समस्याएं सामने आने लगती हैं.

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं पर तापमान के उतार-चढ़ाव के असर का अध्ययन किया. इस अध्ययन से पता लगाया गया कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान में परिवर्तन न होता तो इनकी हालत कैसी होती? हालांकि साल दर साल इसका असर कम रहा है, लेकिन दशकों में इसका असर काफी महत्वपूर्ण रहा है. डिफेनबर्ग इस शोध में शामिल रहे हैं. वे कहते हैं, “ये बैंक के एक बचत खाते की तरह है जहां ब्याज की छोटी धनराशि लंबे समय यानी 30-40 साल में काफी अंतर पैदा कर देती है.”

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