Opinion

कामयाबी के बजाय नाकामयाबी को ही चुनावी हथियार बना रही है भाजपा

Faisal Anurag

पांच साल पहले की ही तो बात है. चुनावी प्रचार में गुजरात मॉडल, अच्छे दिन, किसानों, बेरोजगारों और महिलाओं के खिलाफ हुए अन्याय के खिलाफ जीवन बदल देने की बातें होती थीं.

काला धन की विदेशों से वापसी और हर खाते में पंद्रह लाख के वायदे पूरे देश में सनसनी बन रहे थे. पाकिस्तान और मुसलमान तो तब भी अभियान में थे लेकिन विकास की चर्चा हावी थी.

हालांकि हिंदी पट्टी में दलितों और पिछड़ों के साथ आदिवासियों को साधने के लिए उनके भीतर के उन विलुप्त ऐतिहासिक सवालों को खडा किया गया जिससे उनका ध्रुवीकरण हो.

सुहैलदेव जैसे नायक के इतिहास को पलट कर उन्हें हिंदु हितों का पैरोकार बना दिया गया और उसका पिछड़ों पर असर पैदा किया गया.

सुहैलदेव ने अपने समय के शासकों के जुल्मों और नाइंसाफी के खिलाफ जंग लड़ी थी, जिसमें हर तरह के भुक्तभोगी हिस्सेदार थे. लेकिन शासकों के मुसलमान होने के पहलू को इस तरह उजागर किया गया कि विकास के तुफान में उसका व्यापक असर हुआ.

पांच साल बाद न तो गुजरात मॉडल की चर्चा हरो रही है और न ही विकास शब्द सुना जा रहा है. यहां तक कि पांच साल में विकास के क्या नये मानक खड़े किये गये हैं. इस पर भी सत्ता पक्ष मौन-सा है.

आर्थिैक क्षेत्र की तमाम नाकामयाबियों को राष्ट्वाद के नाम पर गौण कर प्रचार को पाकिस्तान और पमाणु बम पर केंद्रित कर दिया गया है. भाजपा के प्रचार में भ्रष्टाचार की गूंज भी कम हो गयी है.

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भाजपा ने चुनाव अभियान के मुद्दों को लगातार बदला है. गुजरात में प्रधानमंत्री ने अब परमाणु बम की ताकत का सवाल खड़ा कर मतदाताओं लुभाने का नया दांव खेला है.

भाजपा की कोशिश है कि वह राष्ट्वाद के अकेले पैरोकार की छवि पेश कर अपनी सैन्य ताकत के सहारे मतदाताओं को अपने पक्ष में करेगी. भारत के चुनाव में कभी ऐसा नहीं हुआ कि सैन्य रणनीति के सवाल को उठाया गया हो. परमाणु बम के मामले में अमेरिका और रूस सहित दुनिया के अनेक देश शक्तिसंपन्न हैं. लेकिन उनके चुनावों में भी परमाणु बम के इस्तेमाल की खुली घोषणा कभी नहीं की गयी.

भारत ने भी परमाणु बम सातवें दशक में ही हासिल कर लिया था. लेकिन तब से हुए चुनावों में कभी किसी दल ने इस ताकत का खुला चुनावी इस्तेमाल नहीं किया. भारत की यह घोषित नीति है कि उसने परमाणु ताकत ऊर्जा और शांति के लिए इस्तेमाल किया है.

भारत के बारे में विश्व जनमत की धारणा रही है कि भारत कभी भी अपने परमाणु बम का इस्तेमाल आक्रमण के पहले हथियार के रूप में नहीं करेगा. भारत के तमाम दलों के बीच इस सवाल पर आम सहमति रही है.

प्रधानमंत्री के भाषण से यह सवाल उठा है कि भारत ने अपनी इस नीति और आम सहमति को बदल दिया है.

क्या भारत की विदेश नीति में सैन्य आक्रामकता को इजराइल की तरह प्रमुखता दे दी गयी है. प्रधान मंत्री के कथन के बाद दुनिया भर में इस सवाल उठना शुरू हो गया है.

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कब्रिस्तान और श्मसान के सवाल को जिस तरह प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश के चुनावों में उठाया था उसके बाद भारी धु्रवीकरण करने में भाजपा कामयाब हो गयी थी.

देश के विभिन्न तबकों में आर्थिक सवालों पर भारी नारजगी को एक बार फिर ऐसे ही सवालों के सहारे कम करने की भाजपा की रणनीति साफ दिख रही है. चुनाव के बीच भारत के विमानन सेवा में जिस तरह का संकट उभरा है उस का गहरा असर अन्य क्षेत्रों पर भी पड रहा हे.

जेट एयरवेज के ग्राउंडेड होने का ममला साधारण नहीं है. एयर इंडिया का संकट भी बेहद नाजुक  होता नजर आ रहा है. बीएसएनएल का संकट तो भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के संकटों को ही उजागर कर रहा हे.

बीएसएनएल में वेतन संकट खड़ा है. और कर्मचारियों पर छंटनी के बादल गहरा गये है. इस बीच वित्तमंत्री ने साफ कहा है कि भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति को बेचने जा रही है.

सार्वजनिक क्षेत्रों से कहा गया है कि वे अपनी तत्काल बेचने लायक संपत्तियों का तुरंत ब्योरा दें और यह भी बतायें कि चरणबद्ध तरीके से और कितनी संपत्तियों बेची जायेंगी.

भारत के सार्वजनिक क्षेत्र का देश की कोर इकोनामी में बड़ा योगदान है. भारत के लोगों के लिए नौकरियों का यह एक बडा क्षेत्र है. भरातीय रेल की संपत्तियों पर भी भारत सरकार की नजर है.

और उनकी जल्द ही बिक्री की जायेगी. वित्तमंत्री का बयान अच्छे दिनों के पांच साल पुराने सपनों पर तुषरापात है. वित्तमंत्री का बयान बताता है कि भारत का आर्थिक संकट कितना गहरा हो गया है और चुनाव के बाद इसका असर नकारात्मक ही होगा.

इमरान खान ने जब पाकिस्तन में आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकारी संपत्ति बेचने की योजना की शुरूआत की तो भारत में उसका सबसे ज्यादा मजाक भाजपा ने ही उड़ाया. अब उसी भाजपा सरकार में वित्तमंत्री एक तरह से खुला एलान कर रहे हैं कि भारत के सार्वजनिक क्षेत्र पर भारी संकट आने वाला है.

इस हालात में सत्तपक्ष को लगता है कि वोटरों की स्मृति से वह 2014 के चुनाव अभियान के लुभावने नारों की स्मृति को मिटा कर राष्ट्वाद के नाम पर कामयाब हो जपाएगी इस के लिए उसने ध्रीकरण के तमाम उपाय को अंेजाम में लाना भी शुरू कर दिया है.

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