LITERATURE

हिंदी कविता का एंग्री यंगमैन धूमिल

सुदामा पांडेय 'धूमिल' की जयंती पर विशेष

Ranchi : हिंदी कविता को एक अलग और विद्रोही अंदाज देने में आधुनिक युग में जिन कवियों का सबसे अधिक योगदान है उसमें मुक्तिबोध, बाबा नागार्जुन और धूमिल प्रमुख हैं. धूमिल के इस मिजाज की वजह से इन्हें हिंदी कविता का एंग्री यंगमैन कहा जाता है.

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सुदामा पांडेय जब मजह 11 साल के थे तब पिता की मौत हो गयी

सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ का जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी के निकट गांव खेवली में हुआ था. धूमिल के पिता शिवनायक पांडे एक मुनीम थे व इनकी माता रजवंती देवी घर-बार संभालती थी. जब धूमिल ग्यारह वर्ष के थे तो इनके पिता का देहांत हो गया.

महज 12 वर्ष की उम्र में हो गयी थी शादी

धूमिल का विवाह महज 12 वर्ष की आयु में मूरत देवी से कर दिया गया था. 1953 में जब मैट्रिक पास की तो गांव के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिसने मैट्रिक पास की थी. आर्थिक दबावों के रहते वे अपनी पढ़ाई जारी न रख सके.

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कलकत्ता में लोहा ढोने का काम किया

रोजगार की तलाश ‘धूमिल’ कलकत्ता गए. कहीं ढंग का काम न मिला तो लोहा ढोने का काम किया व मजदूरों की ज़िंदगी को करीब से जाना. उनके मित्र तारकनाथ पांडे ने उन्हें लकड़ी की कम्पनी मैसर्स तलवार ब्रदर्ज़ प्रा. लि० में नौकरी दिलवा दी. वहां डेढ वर्ष तक काम किया.

मालिक से हुई बकझक छोड़ी नौकरी

इसी बीच अस्वस्थ होने पर स्वास्थ्य-लाभ के लिए घर लौट आए. बीमारी के दौरान मालिक ने उन्हें मोतीहारी से गौहाटी चले जाने को कहा. ‘धूमिल’ ने अपने अस्वस्थ होने का हवाला देते हुए इनकार कर दिया. मालिक का घमंड बोल उठा, “आई एम पेइंग फॉर माई वर्क, नॉट फॉर योर हेल्थ!”‘धूमिल’ के स्वाभिमान पर चोट लगी तो मालिक को खरी-खरी सुना दी,”बट आई ऐम वर्किंग फॉर माई हेल्थ, नॉट वोर योर वर्क.”

फिर क्या था साढ़े चार सौ की नौकरी, प्रति घन फुट मिलने वाला कमीशन व टी. ए, डी. ए….’धूमिल’ ने सबको लात लगा दी.
इसी घटना से ‘धूमिल’ पूंजीपतियों और मज़दूरों के दृष्टिकोण व फ़ासले को समझे. अब उनका जनवादी संघर्ष उनकी कविता में आक्रोश बन प्रकट होने वाला था. धूमिल को हिंदी कविता के संघर्ष का कवि कजा जाता है.

आइटीआइ से डिप्लोमा कर नौकरी पायी

1957 में ‘धूमिल’ ने काशी विश्वविद्यालय के औद्योगिक संस्थान में प्रवेश लिया. 1958 में प्रथम श्रेणी से प्रथम स्थान लेकर ‘विद्युत का डिप्लोमा’ लिया. वहीं विद्युत-अनुदेशक के पद पर नियुक्त हो गए. फिर यही नौकरी व पदोन्नति पाकर वे बलिया, बनारस व सहारनपुर में कार्यरत रहे.

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अधिकारियों का कोपभाजन बने

1974 में जब वे सीतापुर में कार्यरत थे तो वे अस्वस्थ हो गये.अपनी स्पष्टवादिता व अखड़पन के कारण उन्हें अधिकारियों का कोपभाजन होना पड़ा. उच्चाधिकारी अपना दबाव बनाए रखने के कारण उन्हें किसी न किसी ढंग से उत्पीड़ित करते रहते थे. यही दबाव ‘धूमिल’ के मानसिक तनाव का कारण बन गया.

अक्टूबर 1974 को असहनीय सिर दर्द के कारण ‘धूमिल’ को काशी विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाया गया. डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन ट्यूमर बताया . नवंबर १९७४ को उन्हें लखनऊ के ‘किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाया गया. यहाँ उनके मस्तिष्क का ऑपरेशन हुआ लेकिन उसके बाद वे ‘कॉमा’ में चले गए और बेहोशी की इस अवस्था में ही 10 फरवरी 1975 को इनका निधन हो गया.

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धूमिल अपनी कविता में देश की राजनीतिक व्यवस्था की खामियों को भी बहुत बेबाक ढंग से उभारते हैं. वे इसकी फिक्र नहीं करते कि उनकी कविता से नेता खफा हो जाएंगे. उनकी प्रसिद्ध कविता में उनका तेवर देखने लायक है.

मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद౼
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
धूमिल पूंजीवाद की नब्ज भी पहचानते हैं और उसकी खामियों की ओर भी इशारा करते हैं. वे साफ और सीधे शब्दों में लिखते हैं
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं
यह तीसरा आदमी कौन है
और मेरे देश की संसद मौन है…

कविता क्या है ? धूमिल इसको ‘आदमी होने की तमीज़’ कहते हैं౼
कविता
भाषा में
आदमी होने की
तमीज़ है .

धूमिल की साहित्यिक कृतियाँ:
अभी तक धूमिल के चार काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें सम्मिलित हैं –
संसद से सड़क तक (इसका प्रकाशन स्वयं ‘धूमिल ने किया था),कल सुनना मुझे (संपादन – राजशेखर),धूमिल की कविताएं (संपादन – डॉ शुकदेव),सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (संपादन – रत्नशंकर. रत्नशंकर ‘धूमिल’ के पुत्र हैं.

(नवीन शर्मा वरिष्ठ पत्रकार व लेखक)

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