Opinion

सरकारों की ओर से कोरोना के प्रारंभिक खतरों को नजरअंदाज करने का खमियाजा भुगत रही है जनता

Faisal Anurag

अनथक परिश्रम कर रहे मेडिकल स्टाफ की परेशानी हल करने की दिशा में जो पहल किए गये हैं वे बेहद नाकाफी हैं. हालांकि एम्स के निदेशक के अनुसार उनके यहां कोरोना फ्रंटलाइनर के लिए तमाम सुरक्षात्मक इक्वपमेंट उपलब्ध हैं.

जब कि उसी संस्थान के जूनियर डाक्टरों की इस संदर्भ में सार्वजनिक पीड़ा सामने आ चुकी है. ताजा विवाद तो हिंदू राव अस्पताल के तमाम डाक्टरों और नर्सों की नाराजगी प्रकरण ने पैदा किया है.

इसके खिलाफ त्वरित कार्रवाई एनडीएमसी ने की है. यह विवाद मेडिकल स्टाफ की चिंताओं और परेशानियों को ही उजागर करता है. इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

चीन के वुहान में कोविड 19 के प्रसार के बाद ही दुनिया भर में कहा जाने लगा था कि यह महामारी सारी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लेगी. इसका अर्थ यह था कि दुनिया के सभी देशों को इससे निपटने की तैयारी युद्धस्तर पर करनी चाहिए थी.

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लेकिन जब तक संकट सामने नहीं आ गया अनेक देशों की सरकारों ने तत्परता नहीं दिखायी. अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनेक बयानों की चर्चा सरेआम की जा रही है. उन्होंने तो पहले इसे हल्के में लिया. और यह कहना शुरू किया कि अमरीका में इसका प्रभाव नहीं होगा.

तीन दिनों पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में जिम ओकोस्टा जो कि सीएनएन के संवाददाता हैं, ने उन तमाम बयानों की चर्चा कर ट्रंप से सवाल पूछे. परेशान कर देने वाले सवालों से तमतमाए ट्रंप ओकोस्टा को ही नीचा दिखने का प्रयास करते हुए स्वयं ही हास्यास्पद हो गये.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जानसन ने भी शुरू में कोविड 19 के खतरे कां गंभीरता से नहीं लिया. वहां का प्रेस भी मुखरता से जानसन की आलोचना से परहेज करती रहा. अब तो जानसन स्वयं इस बीमारी की गिरफ्त में आ गये हैं. 13 मार्च को भारत के स्वस्थ्य सचिव ने यह कह कर कि भारत में कोरोना का कोई व्यापक खतरा नहीं है, केंद्र सरकार के पक्ष को रखा था.

दुनिया के तमाम प्रेस ने इस तथ्य को रंखांकित करते हुए सरकारों से सवाल किया है कि आखिर वे इस वाययरस की गंभीरता को लेकर तैयारी क्यों नही करते रहे. हिंदू राव अस्पताल की परिघटना बताती है कि भारत को और ज्यादा सक्रियता से मेडिकल स्टाफ की वास्तविकत चिंताओं को दूर करना चाहिए.

क्योंकि भारत के स्वास्थ्य सचिव लव अग्रवाल ने 1 अप्रेल को कहा है कि भारत में इस वायरस से प्रभावितों की संख्या और बढ सकती है. चिेंता का एक और कारण वे नीतियां भी है, जिनकी स्पष्टता नहीं है.

यूएनडीपी के अनुसार 29 मार्च को भारत का एक कार्गो विमान 90 टन मेडिकल सुरक्षा इक्वपमेंट ले कर सर्बिया में उतरा है. भारत सरकार ने इस संदर्भ में कुछ नहीं कहा है. लेकिन जब भारत के ही मेडिकल स्टाफ इन इक्वपमेंट्स के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं तब यह बात खटकने लगती है.

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इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत दूसरे देशों को इस मुसीबत और आपदा में मदद नहीं करे. दुनिया के तमाम बड़े देशों में ऐसे दौर में अपने ही मित्र देशों की मदद से हाथ खींच लिया है.

ऐसी स्थिति में भारत को यह कदम नहीं उठाना चाहिए कि वह किसी और की मदद नहीं करे लेकिन अपने मेडिकल स्टाफ को भी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर तमाम इक्वपमेंट मुहैया कराए.

हालांकि उन्होंने लाकडाउन के दौर में की जा रही लापरवाहियों का उल्लेख के बीच यह कहा. अग्रवाल ने यह भी कहा है कि पिछले 24 घंटों में संक्रमितों की संख्या में अचानक आयी छलांग को अखिल भारतीय असर नहीं कहा जाना चाहिए.

क्योंकि यह छलांग तबलीगी जमात परिघटना के कारण है. उन्होने संकेत दिया कि लाकडाउन के दौरान किए गये उल्लंघन के कारण भी आने वाले दिनों में संक्रमण संख्या में बढोत्तरी हो सकती है. स्पष्ट है उनका इशारा मजदूरों के पलायान की ओर है.

इन सवालों को खारिज तो नहीं किया जा सकता. लेकिन इस सवाल को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि देश भर की सरकारों की तैयारी के प्रति अविश्वास ने इन श्रमिकों को घर की ओर वापसी के लिए सडक पर आने पर विवश किया.

इस बात की गारंटी सरकारों को करनी होगी कि उसकी घोषणाओं को जमीन पर उतारा जायेगा.  और इन तबकों का भरोसा इसी तरह जीता जा सकता है. एक बड़ी चुनौती तो यह भी है कि देश भर में नोवल कोरोना वायरस को ले कर जो माहैल बना हुआ है, उसे किस तरह एक भरेसे में बदला जाए.

खबरों से ऐसा लग रहा है कि लोग आतंकित हैं. इस भरोसे को लोगों तक ले जाने का मेकेनिज्म तुरंत तैयार करने की जरूरत हैं कि बचान का जो मेडिकल रास्ता है वही लोगों को सुरक्षा दे सकता है. अभी भी गांवों तक सही सूचानाएं नहीं पहुंच रही  हैं. यह बड़ी चुनौती है.

क्योंकि लव अग्रवाल का इशारा तो यही बता रहा है कि गांवों में यदि इसका विस्तार हुआ तो स्थिति भयावह हो सकती है. क्योंकि बड़ी में लोग बाहर से गांवों में गये है. अनेक ऐसी रिपोर्ट बता रही है कि इस चुनौती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. यह आपदा का वक्त है. और किसी को भी अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए.

जैसा कि एम्स के निदेशक डा. गुलेरिया ने कहा है कि उनका संस्थान किस तरह  पीपीइ इक्वमेंट को पुन: उपयोग के लायक बना ले रहा है. उस तकनीक को दूसरे संस्थानों और अस्पतालों को भी सीखना चाहिए.

फ्रंटलाइन डाक्टर, नर्सें और स्टाफ को इतिहास इस तथ्य के लिए याद करेगा कि भारत के कोरोना जंग में उन्होंने किन हालातों में जीत हासिल की.

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