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10-12 साल के बच्चों को मार कर पुलिस ने कुख्यात नक्सली बता दिया था, सीआइडी जांच को भी किया मैनेज, अब सच सामने आने की उम्मीद बढ़ी

डीजीपी से लेकर पलामू के तत्कालीन एसपी तक फंस सकते हैं

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Surjit singh

Ranchi: आठ जून 2015 की रात पलामू के बकोरिया में हुए कथित मुठभेड़ में पुलिस ने नक्सली अनुराग और 11 निर्दोष लोगों को मार दिया था. मुझे याद है. तब मैं हिंदी दैनिक प्रभात खबर में काम करता था. पहले ही दिन से शक था कि मुठभेड़ फर्जी है. पुलिस का कोई भी सीनियर अफसर मिलना नहीं चाह रहे थे. नौ जून को दीपाटोली स्थित आर्मी कैंट में एक कार्यक्रम में मैंने तत्कालीन एडीजी अभियान एसएन प्रधान से नरम लहजे में और लगभग फुसफुसाते हुए इसे लेकर सवाल किया था. ऐसा इसलिए क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि सेना के कार्यक्रम में कोई और हमारी बात सुने. लेकिन सवाल सुनते ही वह आवेश में आ गये थे और बहुत तेज आवाज में कहा था कि मारे गये सभी लोग नक्सली ही हैं. उनकी आवाज सुन कर कई लोग हमारी तरफ देखने लगे थे. और बात वहीं खत्म हो गयी थी. करीब साढ़े तीन साल बाद हाइकोर्ट के आदेश के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि मामले में पीड़ित पक्ष को न्याय मिलेगा. सच सामने आये इसके लिए न्यूज विंग ने लगातार एक दर्जन से अधिक तथ्यपरक स्टोरी की. जिससे यह साबित होता है कि मुठभेड़ फर्जी था. और डीजीपी समेत अन्य अफसर इसे असली मुठभेड़ बताने पर तुले रहे.

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एमवी राव को झेलना पड़ा दंश

घटना के बाद डीजीपी डीके पांडेय और तत्कालीन एडीजी अभियान एसएन प्रधान ने मारे गए सभी लोगों को कुख्यात नक्सली बताया था. इतना ही नहीं मामले की जांच के दौरान पुलिस के सीनियर अफसरों ने सीआइडी को मैनेज करने की कोशिश की. पहले तत्कालीन एडीजी सीआइडी अजय भटनागर, फिर अजय कुमार सिंह ने जांच के नाम पर कुछ नहीं किया. जब सीआइडी के तत्कालीन एडीजी एमवी राव ने जांच में तेजी लाने की कोशिश की, तो पुलिस के ही सीनियर अफसरों ने सरकार से मिल कर उनका तबादला करवा दिया. उन्हें दिल्ली में पदस्थापित करवा दिया. जांच में तेजी लाने का दंश आज भी वह झेल रहे हैं. एमवी राव के बाद प्रशांत सिंह को एडीजी सीआइडी बनाया गया. उन्होंने इस केस में क्या किया, यह नहीं पता, लेकिन अजय कुमार सिंह जब दुबारा सीआइडी के एडीजी बने, तब सीआइडी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट कोर्ट में जमा कर दिया.

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मारे गए लोगों में पांच नाबालिग थे. उनमें से दो की उम्र मात्र 12 साल व एक की 14 साल थी. चरकू तिर्की और महेंद्र सिंह की उम्र सिर्फ 12 साल थी. महेंद्र सिंह के आधार कार्ड में जन्म का वर्ष 2003 लिखा हुआ है, जबकि प्रकाश तिर्की की जन्म तिथि 01.01.2001 लिखी हुई है. इस तरह दोनों की उम्र क्रमशः 12 व 14 साल थी. मारे गए पांच नाबालिगों में से एक उमेश सिंह की उम्र सिर्फ 10 साल बतायी जा रही है. उमेश की मां के मुताबिक वह गाय चराने के लिए घर से निकला था.

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कई अफसरों को किया गया परेशान

बकोरिया कांड में स्वतंत्र मत रखनेवाले अफसरों में एकमात्र अफसर एमवी राव नहीं हैं. इस कथित फर्जी मुठभेड़ को सही करार देने और राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक से वाहवाही लूटने के क्रम में मुख्यमंत्री के समक्ष गलत तथ्य रख कर पुलिस के कई अन्य सीनियर अफसरों को परेशान किया गया. घटना के तुरंत बाद तत्कालीन एडीजी सीआइडी रेजी डुंगडुंग, रांची जोन की आइजी सुमन गुप्ता, पलामू के तत्कालीन डीआइजी हेमंत टोप्पो का भी तबादला कर दिया गया. सभी की पोस्टिंग शंटिंग पोस्ट पर की गयी. जहां उनके लायक काम नहीं थे. कुछ दिनों बाद लातेहार के तत्कालीन एसपी अजय लिंडा का भी तबादला कर दिया गया. क्योंकि वह भी फर्जी मुठभेड़ को सही बताने के लिए तैयार नहीं थे. इसके अलावा दारोगा हरीश पाठक को भी तंग किया गया. उन्हें गलत तरीके से मुकदमों में फंसाया गया.

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 पुलिस ने जानबूझ कर नहीं की शवों की पहचान

कथित मुठभेड़ में मरनेवाले 12 में से पांच नाबालिग हैं, यह घटना के वक्त ही पुलिस को पता चल गया था. सूत्रों के मुताबिक पुलिस को नाबालिगों के गांव-घर की जानकारी भी मिल गयी थी. लेकिन पुलिस ने उनके शवों की पहचान नहीं करायी. क्योंकि पुलिस नहीं चाहती थी कि घटना के तुरंत बाद यह बात सामने आये कि जिन 12 लोगों को कथित मुठभेड़ में मारा गया, उनमें पांच नाबालिग थे.

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पुलिस-जेजेएमपी का डर ऐसा था कि कलेजे के टुकड़े से लिपट कर रो भी नहीं सके परिजन

मासूम बच्चों को पुलिस ने कथित मुठभेड़ में मार गिराया. अखबारों में तसवीरें छपीं. बच्चों के मां-पिता, भाई-बहनों ने तसवीरें देखीं. अपने कलेजे के टुकड़े को पहचान भी लिया. पर चुप रहे. उस मां-बाप की तकलीफ, दुखः-दर्द का अनुभव न तो झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास कर सकते हैं, न डीजीपी डीके पांडेय, न घटना का सच जानने के बाद चुप रहनेवाले सरकार के बड़े अफसर और न ही कोर्ट के न्यायाधीश. अगर दर्द को समझ पाते तो मासूमों के शव के सामने लाखों रुपये का पुरस्कार नहीं बांटते. उस दर्द की हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं. पुलिस और जेजेएमपी का डर ऐसा कि अभागे मां-बाप अपने कलेजे के टुकड़े के शव से लिपट कर रो भी नहीं पाए. पुलिस ने शवों के साथ क्या किया, ढ़ाई साल बाद भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं. उमेश की मां पचिया देवी बताती हैः उमेश गारू मध्य विद्यालय में पढ़ता था. गाय चराने जंगल गया था, लौट कर नहीं आया. दूसरे दिन कलेजे के टुकड़े के मारे जाने की खबर मिली, पर डर से शव लेने नहीं गए. कलेजे के टुकड़े को अंतिम बार देख भी नहीं सके. शव से लिपट कर रो भी नहीं सके.

 

 

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