
Dhanbad : झारखंड में भाषा को लेकर उठा विवाद राजनीतिक घमासान के बीच जन आंदोलन के तौर पर धीरे धीरे आकार लेने लगा है. बिहारी बोलियों को बोलने वाले लोग अब इकट्ठे होकर अपनी भाषा के पक्ष में आंदोलन चलाने लगे हैं. झारखंड में चल रहे भाषा विवाद का मसला राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया है. आजसू पार्टी के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी, भाजपा सांसद विद्युत वरण महतो और विधायक लंबोदर महतो ने मंगलवार को नई दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात कर धनबाद-बोकारो में भोजपुरी, मगही और अन्य जिलों में मैथिली-अंगिका को क्षेत्रीय सूची में शामिल करने पर चल रहे व्यापक आंदोलन और इसे लेकर लोगों में व्याप्त आक्रोश से अवगत कराया था. इन सब के बीच मंगलवार को कांग्रेस पार्टी के जिला प्रभारी सह स्वास्थ मंत्री बन्ना गुप्ता धनबाद दौरे पर पहुंचे तो उन्होंने भाषा विवाद पर कांग्रेस का रुख तो स्पष्ट नहीं किया लेकिन, इशारे इशारे में बोकारो और धनबाद जिले में भोजपुरी, मगही और अंगिका को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से हटाए जाने के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के फैसले पर ऐतराज भी जताया. मंत्री बन्ना गुप्ता ने धनबाद के बरवाअड्डा में मीडिया से वार्ता के दौरान कहा कि भाषा पर कोई द्वेष राग नही है. भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका का सपोर्टर हूंं. राष्ट्र भाषा हिंदी तो हमे चाहिए ही चाहिए. साथ ही राज्य की सभी क्षेत्रीय भाषाओं का भी हम सम्मान करेंगे.
चूंकि, झारखंड में उपजे भाषा विवाद की आंच कहां तक पहुंच सकती है इसका आभास मंत्री बन्ना गुप्ता को है. इसलिए उन्होंने भाषा विवाद पर मरहम लगाने की कोशिश की. बन्ना गुप्ता समझते और जानते हैं कि सिर्फ बाहर से आकर बसने वाले लोग ही झारखंड में अंगिका, मगही और भोजपुरी नहीं बोलते हैं, बल्कि बिहार से सटे जिलों के लोग वहां आदिवासियों से पहले से ही रह रहे हैं और उनकी मातृभाषा सदियों से भोजपुरी, मगही और अंगिका है. भाषाई आंदोलनकारी 1932 के खतियान को आधार बनाकर झारखंड के वाशिंदे की पहचान करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन पलामू, गढ़वा, चतरा, कोडरमा, और अन्य जिलों के लोगों के पास 1932 से पहले से ही वहां की जमीन पर मिल्कियत है और वे इन चारों बिहारी बोलियों को बोलते हैं.
वहीं, उपजे भाषा विवाद से भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिल भाषाभाषियों ने झारखंड के विभिन्न जिलों में मंच बना लिया है. मंच अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन आने वाले दिनों में इन मंचों का भारी विस्तार हो सकता है और उनका आंदोलन झारखंडियों के आंदोलन से भी तीव्र हो सकता है. क्योंकि बिहार की सीमा से सटे झारखंड में सैंकड़ों साल से रह रहे लोग अपने का बाहरी कहे जाने पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं. यदि इन चार बोलियों के बोलने के कारण उनपर बिहारी पहचान थोपी जाती है, तो झारखंड के भाषाई आधार पर दो भागों में बंट जाने का खतरा है. एक भाग तो झारखंडी भाषा समूहों को बोलने वालों का होगा और दूसरा भाग बिहारी बोलियों के बोलने वालों का होगा.
दिलचस्प बात यह होगी कि दोनों वहां के मूल निवासी ही होंगे. हां, रांची, जमेशदपुर, बोकारो और धनबाद में इन बोलियों के बोलने वाले बाहर से आए हुए हैं, लेकिन उनमे से भी अधिकांश तीन-चार पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं. यदि दोनों तरफ से गोलबंदी हुई, तो हिंसक टकराव के भी आसार बन सकते हैं.
बताते चलें कि झारखंड बिहार के विभाजन से बना है. विभाजन के पहले और बाद में भी लाखों लोग झारखंड आकर बस चुके हैं. आजादी के बाद भारत का सबसे ज्यादा सार्वजनिक निवेश दक्षिण बिहार में ही हुआ था, जो आज झारखंड के नाम से जाना जाता है. खनिज संपदा तो यंहा पहले से ही भारी पैमाने पर मौजूद थी. इसलिए देश के दूसरे इलाकों से लाखों लोग यंहा आकर बस गए. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से यहां आकर बसने वाले लोगों की संख्या उनमें सबसे ज्यादा थी और इन लोगों की बोली भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका है.




