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गहराते भाषा विवाद के बहाने सत्ता पक्ष और विपक्ष में अपने ‘वोटर्स’ की नाराजगी मोल लेना नहीं आसान

Ranchi: शिक्षा विभाग, झारखंड के द्वारा जीटेट परीक्षा ली जानी है. इसके लिए जिलावार क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषा की अनिवार्यता भी तय की गयी है. पर भाषायी विवाद ऐसा खड़ा हो गया है कि विपक्ष तो विपक्ष, सत्ता पक्ष के लिए भी यह चिंता का सबब हो गया है. खासकर पलामू प्रमंडल में. यहां नागपुरी और कुडूख भाषा को क्षेत्रीय भाषा के रूप में सरकार द्वारा मान्यता दी गयी है. विवाद की जड़ यही है. सरकार के फैसले से युवाओं में जबरदस्त गुस्सा है. ऐसे में दलों को अपने ‘वोटर्स’ के नाराजगी का भी भय है. भाजपा ने इस मुद्दे को उठाकर माहौल गर्म कर दिया है. पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही इस मुद्दे को लेकर मुखर हो चुके हैं.राजपाल को ज्ञापन भी उनकी ओर से सौंप दिया गया है. मांग की गई है कि सरकार पलामू प्रमंडल में बोली जाने वाली भाषा मगही और भोजपुरी को शामिल करें. नागपुरी और कुडूख को हटाए. जदयू ने भी जेटेट परीक्षा में पलामू डिवीजन के लिए भाषा आधारित तुष्टिकरण करने का आरोप सरकार पर लगा दिया है. अब वित्त मंत्री और इसी डिवीजन के विधायक राधा कृष्ण किशोर, झामुमो के पूर्व विधायक और मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर के साथ साथ सत्तारूढ राजद की ओर से भी पलामू में नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की अनिवार्यता पर सवाल खड़ा किया गया है. बड़े पैमाने पर मैथिली भाषा का भी उपयोग राज्य में होने के बावजूद इसे जगह नहीं मिलने पर कई संगठनों ने भी नाराजगी जाहिर कर दी है.

जहां नागपुरी से नाता ही नहीं

यह सबको पता है कि पलामू प्रमंडल में मगही और भोजपुरी भाषा ही बोली जाती रही है. आज से नहीं, अरसे से. यहां किसी क्षेत्र में नागपुरी या कुडूख जैसी भाषा का उपयोग नहीं होता है. यहां तक कि इस प्रमंडल में रहने वाले आदिवासी भी नागपुरी या कुडूख नहीं बोलते हैं. फिर भी पता नहीं सरकार ने कैसे नागपुरी और कुडूख को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दे दिया है. अधिकारी कैसे सरकार को गुमराह करते हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है. विभिन्न जिलों में क्षेत्रीय भाषा की विसंगति को लेकर करीब दो-तीन साल पहले भी पूरे राज्य में युवाओं का बड़ा आंदोलन हुआ था. इस आंदोलन ने हेमंत सोरेन सरकार को परेशानी में डाल दिया था. माना जाता है कि जय राम महतो (वर्तमान में डुमरी विधायक) इसी भाषा विवाद से उत्पन्न हुए युवा नेता हैं.

सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ हुए उग्र विरोध के कारण जयराम महतो राज्य में युवाओं के बड़े नेता बन गए. यदि भाषा विवाद उत्पन्न नहीं हुआ होता तो शायद जयराम महतो आज यहां तक नहीं पहुंचते. जयराम को नेता बनाने में हेमंत सोरेन सरकार के अधिकारियों का बड़ा हाथ रहा. तब सरकार भी युवाओं के आंदोलन को नजरअंदाज कर इसे दबा रही थी. अब फिर यह मामला गर्म हो चुका है.

क्या कह रहा एनडीए

पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही के मुताबिक, मगही- भोजपुरी भाषा पलामू प्रमंडल में होने वाली प्रतियोगी परीक्षा में क्षेत्रीय भाषा में शामिल नहीं किया गया. इसकी जगह कुड़ुख और नागपुरी को शामिल कर राज्य सरकार ने तुगलकी फरमान जारी किया है. इसके ख़िलाफ़ राज्यपाल संतोष गंगवार से मिल कर उन्हें ज्ञापन सौंपा गया है.पलामू के परिपेक्ष्य में विस्तृत जानकारी भी दी है. जदयू, झारखंड के प्रवक्ता सागर कुमार ने कहा कि राज्य सरकार भाषा तुष्टिकरण पर आमादा है. पलामू डिवीजन में भोजपुरी और मगही को छोड़ा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. खूंटी जिले की स्थानीय भाषा की सूची में मुंडा समुदाय की भाषा मुंडारी को जगह मिलनी चाहिए.

राधा कृष्ण ने सीएम से लगायी फरियाद

सत्तारूढ इंडिया गठबंधन के नेताओं ने भी पलामू डिवीजन सहित दूसरे जिलों में स्थानीय भाषा के निर्धारण में लापरवाही बरते जाने को लेकर आवाज उठाई है. मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने तो सीएम हेमंत सोरेन को लेटर भी लिखा है. कहा है कि जीटेट की नियमावली का ड्राफ्ट शिक्षा विभाग ने तैयार कराया है. इसमें पलामू सहित कई जिलों में शिक्षकों की नियुक्ति में वहां की स्थानीय भाषा की जानकारी को अनिवार्य किया गया है. पलामू व गढ़वा में कुडूख तथा क्षेत्रीय भाषा के रूप में नागपुरी को अनिवार्य बनाया गया है. यहां कुडूख भाषा का प्रयोग बहुत ही कम किया जाता है. पलामू- गढ़वा में भोजपुरी, हिन्दी को अनिवार्य बनाया जाए. झामुमो के सन्नी शुक्ला और आशुतोष विनायक जैसे नेताओं ने पार्टी महासचिव और पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर से भेंट की है. कहा है कि पलामू डिवीजन में हिंदी ही प्रमुख संवाद भाषा है. मिथिलेश ठाकुर ने सीएम से इस संबंध में मुलाकात करने का आश्वासन दिया है. राजद, झारखंड के प्रदेश प्रवक्ता डॉ मनोज कुमार ने कहा है कि पलामू डिवीजन में हिंदी, भोजपुरी और मगही बोली जाती है. ऐसे में नागपुरी या अन्य भाषाओं को थोपा जाना ठीक नहीं.

झारखंड मैथिली मंच के संरक्षक और पूर्व वार्ड पार्षद (रांची नगर निगम) अरुण कुमार झा के मुताबिक, झारखंड सरकार द्वारा मैथिलों के प्रति उदासीनता दिखायी गयी है. निर्धारित क्षेत्रीय भाषा में गोड्डा, देवघर, दुमका सहित रांची एवं जमशेदपुर में लाखों की संख्या में मैथिली भाषा भाषी निवास करते हैं. बावजूद मैथिल को राज्य सरकार द्वारा जिलावार क्षेत्रीय भाषा की सूची में स्थान नहीं दिया गया है जो अपमानजनक है. सरकार अपनी गलतियां सुधारे.

देखा जाए तो पलामू प्रमंडल सहित अन्य हिस्सो में भाषा विवाद को लेकर आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. सरकार ने यदि समय रहते इस विवाद को नहीं सुलझाया तो संभव है फिर कोई बड़ा आंदोलन हो और जय राम महतो जैसा फिर कोई नेता उभर कर सामने आए.

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