
Manoj Khare
फेसबुक एक अजीब जगह है. यहां तथाकथित सेलिब्रिटी स्टेटस सर्वसुलभ है. कई लोग कुछ मित्र/फॉलोवर जोड़कर और लाइक/कमेंट जुटाकर खुद को सेलिब्रिटी/वीआईपी समझने का मुगालता पाल लेते हैं. उनकी वॉल पर एक किस्म का राग दरबारी चलने लगता है.
ऐसे में आत्ममुग्धि बढ़ती जाती है. और वे खुद बड़े लिक्खाड़ लेखक होने का भ्रम पाल लेते हैं. यहां तक कि उन्हें लगने लगता है कि सब लोग उनकी मित्रता पाने के लिए मरे जा रहे हैं. आये दिन ऐसे लोग फ्रेंडलिस्ट की सफाई करने या अमित्र-अभियान चलाने की धमकी देते रहते हैं, ताकि दूसरों को ‘कूड़ा-करकट’ बताकर अपना तथाकथित सेलिब्रिटी स्टेटस नमूदार कर सके.
इन फेसबुकिया (राग) दरबारों में प्रायः आपसी रार-तकरार भी होती रहती है. मैं अमूमन फेसबुक के प्याले में चलने वाले ‘कट्टी-मिट्ठी’ और परस्पर टांग-खिंचाई वाले छुटभैये ‘तूफानों’ में न तो भागीदारी करता हूं. और न ही उन पर लिखता हूं. पर अपवाद के तौर पर यह पोस्ट सबकी सनद के लिए लिख रहा हूं.
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ऐसा ही एक प्यालाई तूफान अभी कुछ दिन पहले ‘बुद्ध’, ‘कटोरी’ और ‘भगोना’ की संज्ञाओं के साथ फेसबुक पर चल रहा था. मैंने सम्बंधित पोस्टें नहीं पढ़ी थीं. पर बहुत सी महिलाएं दनादन उस पर काउंटर पोस्टें डाल रहीं थीं, इसलिए जिज्ञासा के तौर पर मैंने संबंधित मूल पोस्टों पर सरसरी नजर डाली और एकाध विनोदपूर्ण कमेंट भी किया.
यह एक फेसबुकयाई सेलिब्रिटी मित्र महोदय को नागवार गुजरा. उनके द्वारा भेजे कई संदेशे एक दिन मुझे इनबॉक्स में पड़े मिले. कि आपको फलां आदमी जैसों की पोस्टें बहुत अच्छी लगती हैं. कि आप उन्हें लाइक करते हैं. कि आप उन्हें सलाह भी देतें हैं. मैंने अर्ज किया कि किसे लाइक करना है और किस पोस्ट पर और क्या कमेंट करना है यह मेरा अधिकार है. अब क्या आपकी नाराजी/खुशी को ध्यान में रखकर कमेंट / लाइक करूँगा.
बोले अपनी आजादी आप रखिये, मना नहीं करता. पर अब मैं उनका मित्र नहीं रह सकता. मैंने कहा किसे मित्र रखना है, किसे नहीं यह फेसबुक पर सबको अधिकार है. आपका भी है. पर अभिव्यक्ति की आजादी मेरा अधिकार है जो कि मुझे अत्यंत प्रिय है.
उनके फेसबुकयाई अहं की इंतिहा यह हुई कि बोले मैं आपको “मुक्त” करता हूं. जैसे फेसबुक पर अपने मित्रों को उन्होंने बांध रखा हो! वे उनके बंधुआ हों! या गुलाम हों! अरे भैये इतनी गुलामी का अहसास तो मुझे वो सरकारी कम्पनी भी कभी नहीं कराती जिसकी मैं चाकरी करता हूं और जिसके वेतन की बदौलत मेरी रोटी-पानी ही पिछले 37 बरस से नहीं चल रहा है बल्कि पद, प्रतिष्ठा और गाड़ी-घोड़ा सब हासिल है. इतने कड़े कंडक्ट रूल्स तो उसके भी नहीं हैं कि मेरा हर लाइक/कमेंट नियंत्रित करने लगे.
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महाशय ने आगे यह भी कहा कि इनबॉक्स में इसलिए बता रहा हूं कि गलती से वे फिर मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न कर लें. मतलब फिर वही आत्ममुग्धि! वे यह मानकर बैठे हैं कि सब उनकी मित्रता के लिए इतने बेताब बैठे हैं कि अमित्र हो चुके लोग फिर चुपके से उनकी मित्रता पाने का प्रयास करेंगे ही और सेलिब्रिटी होने के नाते सम्भव है उन्हें याद न रहे और वे स्वीकार कर लें. है ना अद्भुत आत्ममुग्धि! और यह फेसबुक पर इकलौता उदाहरण नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है.
इसलिए मैं इस पोस्ट के माध्यम से हर आमो-खास को यह इत्तिला देना उचित समझता हूं कि जिसे मुझसे फेसबुकयाई मित्रता रखना हो रखे और तोड़ना हो, शौक से तोड़े. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.
अपवादस्वरूप सिर्फ चुने हुए पत्रकार, लेखक, कवि, कलाकार, कार्टूनिस्ट और साहित्यकार ही मेरी फ्रेंडसूची में ऐसे हैं जिनको मैं प्रायः फेसबुक पर आने के पहले भी पढ़ता था और पसंद करता था और उनसे मित्रता/सोशल मीडिया का यह सम्पर्क ही मेरे लिए अति महत्वपूर्ण है.
वे मेरे लिए वास्तविक सेलिब्रिटी हैं और उनमें से कई इतना बड़प्पन दिखाते हैं कि खुद होकर मुझ जैसे नाचीज को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज चुके हैं. बाकी लोग मेरे लिए न मुझसे छोटे हैं, न बड़े. सब बराबरी का दर्जा रखते हैं. जो आत्ममुग्ध हैं वे बेमतलब की खुशफहमी पाल कर न रखें जब चाहें आएं और जब चाहें रुखसत हो जाएं.
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