
Ranchi: यूं तो हमें लगता है कि जिंदगी की सारी मुश्किलें हमारे ही साथ हैं और सोचते हैं कि दूसरों की जिंदगी हमारी जिंदगी से बेहतर है, लेकिन सच्चाई इससे परे है. इंसान की जिंदगी कभी खुशी कभी गम के नाव पर सफर करती है. आज जो हम आपको स्टोरी बताने जा रहे हैं वो विनय जैन की है. राजधानी रांची स्थित कचहरी के अटल वेंडर मार्केट में छोटी सी जूट बैग की दुकान चलाते हैं. विनय की दोनों आंखों में रौशनी नही. लेकिन पहली नजर में उनका हाव भाव देखने से आपको ऐसा नहीं लगेगा कि उनकी दोनों आंखें नहीं हैं. विनय सामान्य लोगों की तरह से आपको सामान दिखायेंगे. सामान खरीदने के बाद जब आप उन्हें पैसे देंगे तो वे आप से पूछेंगे कि कितने का नोट दिया है. तब लगेगा कि उनकी आंखें तो हैं पर उन्हें दिखता नहीं है.

30 सालों से बैग बेचकर परिवार का पेट पाल रहे हैं विनय
विनय पिछले 30 वर्षों से फुटपाथ पर दुकान लगा रहे हैं. उनका जूट बैग का दुकान है. बैग बेचकर जो कमाई होती है उसी से अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं. उनके दो बेटे हैं बड़ा बेटा बीकॉम की पढ़ाई पूरी की. वहीं, छोटा बेटा ग्यारहवीं की पढ़ाई कर रहा है. परिवार का भी उन्हें भरपूर सहयोग मिलता है. बड़ा बेटा राहुल उन्हें सामान लाने में मदद करता है.
भाड़े के घर में रहते हैं, देते हैं 1600 रुपये
विनय बताते हैं कि दुकान से जो मिलता है उसी से परिवार का खर्च चलता है. पहाड़ी मंदिर के पास भाड़े के घर में रहते हैं. घर भाड़ा 1600 रुपये देते हैं. काफी मुश्किल से घर का खर्चा चल पाता है.
बेटे के लिये एक अदद नौकरी की तलाश
विनय बताते हैं कि बेटे राहुल के लिये नौकरी मिल जाती तो बड़ा अच्छा हो जाता. प्रयास कर रहे हैं लेकिन, कोई पहचान वाला भी तो नहीं है जिससे बेटे की नौकरी के लिये कहा जा सके.
सरकार से अबतक नहीं मिला कोई सहयोग
सरकार से उन्हें अबतक कोई सहयोग नहीं मिला. जबकि उन्होंने आवास के लिये कई बार अधिकारियों से बोले भी हैं. पर कुछ नहीं हुआ. उनके पास विकलांगता प्रमाणपत्र भी है.




