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स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली पहुंचाने में झारखंड सबसे फिसड्डी, 70 फीसदी अस्‍पतालों में छाया रहता है अंधेरा

Ranchi : एक ओर रघुवर सरकार ने दिसंबर 2018 तक हर गांव और हर घर में बिजली पहुंचाने का लक्ष्‍य तय किया है. वहीं दूसरी ओर राज्‍य के 70 फीसदी स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली आज तक पहुंचा ही नहीं है. यह बात विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र के ताजा रिपोर्ट में सामने आई है. डब्‍लूएचओ के द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली की उपलब्‍धता के मामले में झारखंड की हालत सबसे खराब है. झारखंड के बाद पड़ोसी राज्‍य बिहार में 64 फीसदी स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली पहुंची है. तीसरे नंबर पर जम्‍मू-कश्‍मीर है, जहां 63 फीसदी स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली नहीं है. यदि पूरे देश की बात करें तो 37 हजार 387 स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्र हैं और यहां सिर्फ 24 फीसदी स्‍वास्‍थ्‍य उपकेंद्रों में बिजली नहीं पहुंच सकी है.

झारखंड सरकार सूबे के सभी 39,376 के सभी घरों तक दिसंबर 2018 तक बिजली पहुंचा दिये जाने का लक्ष्‍य तय किया गया है. ऐसे में झारखंड के 70 फीसदी उपस्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों में बिजली की पहुंच नहीं होना, एक बडा सवाल है. इस पर विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा किया है.

राजधानी रांची में ही बिजली की स्थिति चरमरायी हुई है

एक ओर दिसंबर तक झारखंड के सभी घरों में 24 घंटे बिजली मुहैया करा लेने की बातें कही जा रही हैं. वहीं दूसरी ओर झारखंड की राजधानी रांची में ही बिजली की स्थिति चरमरायी हुई है. यहां विद्युत सुदृढ़िकरण के तहत अंडरग्राउंड केबलिंग का काम तय समय पर पूरा नहीं हो पाया है. साथ ही अंडरग्राउंड केबलिंग के नाम पर हर दिन शहर के कई इलाकों में कई-कई घंटे  बिजली काटी जा रही है. वहीं दूसरी ओर गढवा, पलामू, बोकारो, हजारीबाग, लातेहार जैसे जिलों में 24 घंटे में कुछ घंटे ही बिजली दी जा रही है.

बिजली की खराब व्‍यवस्‍था कि वजह से राज्‍य में उद्योग-धंधों को चलाना करोबारियों के लिए महंगा साबित हो रहा है. घंटों बिजली कटने की वजह से यहां के कारोबारी जेनरेटर का सहारा लेते हैं. जेनरेटर से कारोबार करना 30 रुपये प्रति यूनिट से भी ज्‍यादा महंगा पड़ता है.

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