
Ranchi: प्रकृति, सौहार्द और सामूहिकता का पर्व सरहुल आज पूरे झारखंड में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. सरहुल को लेकर हर तरफ अखड़ा सजा हुआ है. इन सब के बीच आदिवासी धर्मगुरु जगलाल पहान ने परंपरा के अनुसार शुक्रवार की सुबह पूजा-अर्चना की और बीते कल घड़ों में रखे पानी का सुबह में मुआयना करने के बाद भविष्यवाणी की. बताया कि इस वर्ष मानसून की सामान्य बारिश होगी. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज बालक-बालिका आदिवासी छात्रावास करमटोली पहुंचे. वहां उनका पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया. उन्होंने राज्यवासियों को सरहुल पर्व पर शुभकामनाएं दी. मुख्यमंत्री ने अखड़ा में पूजा-अर्चना की. साथ ही मांदर की थाप पर झूमे. वहीं, मुख्यमंत्री ने सिरम टोली स्थित सरना स्थल भी गये. वहां भी उन्होंने पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की और पारंपरिक नृत्य किया.
महिला कॉलेज में आधारभूत संरचनाओं को मजबूत किया जायेगाः मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आदिवासी हॉस्टल का कायाकल्प सरकार के द्वारा किया जाएगा. जिसके लिए सरकार के द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी गई है. योजना के तहत 500 छात्र छात्राओं के लिए भव्य छात्रावास बनाए जाएंगे. इसके लिए स्वीकृति मिल चुकी है. मुख्यमंत्री ने कहा कि महिला कॉलेज के लिए भी कार्य योजना बनाने को कहा गया है. रांची के अलावा जिन शहरों में महिला कॉलेज हैं वहां इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाएगा. बहुत जल्द रांची के महिला कॉलेज के साइंस और आर्ट्स ब्लॉक को भव्य रूप देने के लिए काम किया जाएगा.
सीएम की अपील हर कोई लगाए एक पेड़
आदिवासी हॉस्टल के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सिरमटोली सरना स्थल पहुंचे. यहां उन्होंने कहा कि आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती प्रकृत को संरक्षित करने का है. हमारी परंपरा जल जंगल और जमीन को बचाने से जुड़ी हुई है, लेकिन समय के साथ इन बुनियादी चीजों में कमी होती जा रही है, जो बेहद ही चिंताजनक है. सरहुल का यही संदेश है कि सभी लोग प्राकृतिक चीजों को संरक्षित करने के लिए प्रयास करें. इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लोगों से एक पेड़ जरूर लगाने की अपील की जिससे पर्यावरण को हम संरक्षित कर सकें.
क्या कहते हैं जगलाल पाहन
सरहुल पर्व में ही आदिवासी और जनजाति समुदाय धरती मां और भगवान सूर्य से फल-फूल एवं पत्तियों के इस्तेमाल की इजाजत भी मांगते हैं. जगलाल पहान के अनुसार इससे पहले फल-फूल का सेवन वर्जित रहता है. सरहुल पूजा के साथ ही नए वर्ष का कृषि चक्र भी शुरू हो जाता है. सरहुल में मुख्यतः तीन दिन का आयोजन होता है, जिसमें पहले दिन जनजातीय समाज के लोग उपवास रखते हैं. सुबह खेत एवं जलाशयों में जाकर केकड़ा एवं मछली पकड़ते हैं. पूजा के बाद रसोई में उसे सुरक्षित रख देते हैं. ऐसी मान्यता है कि फसल बोने के समय केकड़ा को गोबर पानी से धोया जाता है, उसके बाद उसी गोबर पानी से फसलों के बीज को भीगा कर खेतों में डाला जाता है.
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