
Pawan Singh
आएगा वही क्योंकि, वही, “वह है” जो रस्सी को भी सांप की तरह दिखा सकता है. आएगा वही, क्योंकि उसे अंधों के शहर में आईना बेचने का हुनर पता है. उसे यह भी पता है कि अफीम से भी बड़ा नशा उसके पास है. धर्म का और उन्माद का. संस्कृति के अभिमंत्रित जल से वो पूरे देश में छींटे मारने की कला जानता है.
वह चंद्रकांता का अय्यार है और वह शातिर है सारे तिलिस्म गढ़ने में. इसलिए वह फिर से आएगा. वह इसलिए भी आएगा क्योंकि “झूठ को पंख” लगाकर वह बेचता है. वह शब्दों का बाज़ीगर है. इस लिए वही आएगा. वह इसलिए भी आएगा क्योंकि वह किलविश है…कालनेमि है… उसे अपने बुने हुए अंधेरे के कायम रहने पर पूरा विश्वास है.
वह इसलिए बार-बार आएगा क्योंकि वह जहर बनकर लोगों के दिमाग में घर कर चुका है. वह आएगा क्योंकि लोगों की आवाजें अब दालान तक भी नहीं आतीं. वह फिर से आएगा क्योंकि दिमाग़ की खिड़कियों की सिटकिनियां चढ़ा कर लोग बैठ चुके हैं.
ताजी बयार अब किसी को नहीं चाहिए. रौशनी भी नहीं चाहिए. विवेक शून्यता ही तो भरना चाहता था वह, वह अब कामयाब है. उसे पता है कि हिप्नोटाइज अर्थात् वशीकरण या वशीकृत लोग अब उसके पीछे हैं. वह अट्टाहस करता है और नीरो के मानिंद बांसुरी बजाता है. वह बार-बार आएगा क्योंकि वह वर्तमान का सर्वशक्तिमान छलिया है.
वह इसलिए भी आएगा क्योंकि वह धृतराष्ट्र व दुर्योधन और जरासंध का मानस पुत्र है. कृष्ण ने अवतरण से इंकार कर दिया है. ऐसे में मृत चेतना व विवेक को जागृत कौन करेगा? इसलिए वहीं आएगा.
न कोई लोहिया है, न जयप्रकाश है, न गांधी है..सब गांधारी की भूमिका में हैं. अब लोग पैदल चलते रक्तरंजित पांवों को देखकर, भूख से दम तोड़ते बच्चों, सड़क पर बच्चे जनती मांओं, पीठ पर बेटी की लाश ढोते हुए लाचार बाप पर, लाश हो चुकी मां के चेहरे पर पानी उड़ेलते हुए दो साल के बच्चे पर भी नहीं रोते.
दरअसल, आंखों की संवेदनाओं पर केंचुल आ चुकी है. अब अश्क भी नहीं निकलते जब देखते और पढ़ते हैं कि वो पूरे परिवार के साथ जहर खाकर मर गया. अब हम टीवी के पर्दे पर, अपने ‘शीतायन’ में काफी पीछे हुए इसे किसी पटकथा की तरह देखते हैं और अखबारों में रोज की कहानी की तरह पढ़ते हैं और भूल जाते हैं.
यह भूल जाते हैं समय का चक्र निर्ममता से चापता है, कोल्हू की तरह… आज वह पिसा है कल आपका भी नंबर आएगा….. यही तो भुला दिया है “उसने”….
इसलिए वह फिर से आएगा…धर्म के नाम पर आएगा, स्तुतिगान से आएगा, छद्म राष्ट्रवाद के उन्माद से आएगा लेकिन “वही” आएगा…वह सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उसकी मुट्ठी में सारे आधुनिक “संजय” कैद हैं…ठीक वैसे ही जैसे रावण की मुट्ठी में कुबेर, इंद्र और शनि कैद थे..इसलिए वह आएगा.
वह साम-दाम-दंड-भेद का महारथी है. वह सारे दांव-पेंच का माहिर व शातिर खिलाड़ी है. वह आधुनिक “लिएंडर पेस” है… उसके पास खेलने का भरपूर “स्पेस” है.. इसलिए वह आएगा. वह धरा पर “दिए” जलवा कर यह विश्वास दिलाने की कला में “मेघनाद” सरीखा है कि देखो मेरी शक्ति…. यहां मैं “तारे जमीं पर” भी उतार सकता हूं… लोग तालियां बजाकर इस “झूठे सच” को स्वीकार भी कर लेंगे.
इसलिए “वह” आएगा और उसके बार-बार आने को कोई नहीं रोक सकता…क्योंकि उसे पता है कि वह अगर दिन को रात कहेगा तो लोग रात कहेंगे…. जो बात हो उसे पसंद वही बात करेंगे…
वह इतना बड़ा बाज़ीगर है कि भूखे लोगों को “चांद” दिखाकर “रोटी” कहकर बेंच लेता है और नंगों को “आसमान” की “चादर” ओढ़ाकर सुला देता है…इसलिए वह जरूर आएगा….वह अंधेरे को उजाला कह कर खूबसूरती से बेंच रहा है और लोग खुश हैं…. इसलिए भी वह आएगा…
वह आएगा
वह आएगा
फिर आएगा….
डिस्क्लेमरः पवन कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख मूलतः उनके फेसबुक वॉल पर प्रकाशित हुआ है.





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