
Sanjay Prasad
Jamshedpur : रिजल्ट का मौसम आते ही अंकों की रेस शुरू हो जाती है. एक नंबर से कोई सिकंदर बन जाता है तो कोई गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है. अंकों की इस रेस की मिसाल रविवार 17 जुलाई को आईसीएसई के रिजल्ट में भी दिखी, जब एक नंबर से कोई इंडिया टॉपर बन गया. कुल 500 में 499 अंक लाने वाले इंडिया टॉपर, 498 अंक लाने वाले सेकेंड टॉपर और 497 अंक लाने वाले थर्ड टॉपर हो गये. अंकों की यह दौड़ कई बार विद्यार्थियों में अवसाद का कारण भी बन जाती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे टॉप नहीं कर पाये.
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) स्कूल की लंबे समय तक प्रिंसिपल रही विपिन शर्मा कहती हैं – यह रेस 100 मीटर की दौड़ है. इससे जिंदगी की मैराथन नहीं जीती जा सकती. यही कारण है कि सीबीएसई ने ग्रेडिंग सिस्टम लागू किया, ताकि विद्यार्थियों में एक-एक अंक को लेकर जो मारामारी होती है, वह नहीं हो.
मुझे लगता है कि किसी एक एक्जाम से ज्यादा, जिंदगी के इम्तहान को पास करना ज्यादा जरूरी है. आपकी कामयाबी में किसी एक परीक्षा के अंकों से ज्यादा आपके नॉलेज, स्किल और एफिशिएंसी का योगदान होता है. पैरेन्ट्स के साथ ही स्कूलों को भी यह समझना होगा और अंकों की रैट रेस से बच्चों को बाहर निकालना होगा. इसके लिए सोच में बदलाव करने की जरूरत है. औसत बच्चे ही जिंदगी में ज्यादा सफल होते हैं. – विपिन शर्मा (शिक्षाविद)
केंद्र सरकार भी अंकों की जगह ग्रेडिंग सिस्टम लायी और परीक्षार्थियों में बोर्ड परीक्षा का हौवा कम करने के लिए स्कूल एक्जामिनेशन पर जोर दिया. लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली अंकों के दलदल से बाहर नहीं निकल पा रही है. बाद में ग्रेड की जगह फिर से अंकों को लाया गया. मुझे लगता है कि नयी शिक्षा प्रणाली के आने के बाद बड़ा अंतर दिखाई देगा, क्योंकि नयी शिक्षा प्रणाली कॉन्सेप्चुअल लर्निंग पर आधारित है. बकौल शर्मा, मैं कई बार आईआईटी या दूसरी परीक्षाओं को लेकर देखती हूं कि स्टूडेन्ट्स इन परीक्षाओं को लेकर काफी ऑब्सेस्ड होते हैं, लेकिन आपकी प्रतिभा की असली परीक्षा कार्यक्षेत्र में होती है. आपने भले ही आईआईटी में पढ़ाई कर ली, मगर जीवन या कार्यक्षेत्र में सफल नहीं हो पाए तो फिर उसका कोई मतलब नहीं है.
अंक ही ईश्वर
शिक्षा को करीब से देखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी हमारे देश में अंक ही ईश्वर है. अंकों के आधार पर पर ही आपकी जिंदगी की सफलता और असफलता को मापा जाता है. यहां तक कि पैरेन्ट्स का प्यार भी अंकों के समानुपाती होता है. अगर अंक नहीं तो जिंदगी बेकार, वाली पैरेन्ट्स की सोच बेहद घातक है. हाल के सालों में अंकों की रेस कम करने के लिए कई सकारात्मक पहल भी हुए है. मसलन बारहवीं के अंकों के आधार पर देश के टॉप कॉलेजों में होने वाले दाखिला में अंकों की जगह अब प्रवेश परीक्षा आयोजित की जा रही है. लेकिन एक तरह से यह भी अंकों की ही दौड़ है. यही नहीं जितनी भी प्रतियोगी परीक्षाएं हैं, वह सारे अंकों पर आधारित है. अब तो कई परीक्षाओं में पर्सेन्टाइल आ गया है, जिसमें एकाध अंकों से रैंक में काफी अंतर आ जाता है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में स्कूल स्तर से ही अंकों की इस दौड़ को खत्म करने की कोशिश की जानी चाहिए. साथ ही परीक्षाओं के पैटर्न में भी बुनियादी बदलाव जरूरी है.
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मुझे लगता है कि किसी एक एक्जाम से ज्यादा, जिंदगी के इम्तहान को पास करना ज्यादा जरूरी है. आपकी कामयाबी में किसी एक परीक्षा के अंकों से ज्यादा आपके नॉलेज, स्किल और एफिशिएंसी का योगदान होता है. पैरेन्ट्स के साथ ही स्कूलों को भी यह समझना होगा और अंकों की रैट रेस से बच्चों को बाहर निकालना होगा. इसके लिए सोच में बदलाव करने की जरूरत है. औसत बच्चे ही जिंदगी में ज्यादा सफल होते हैं. – विपिन शर्मा (शिक्षाविद)


