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रिप्लिका इस्टेट ने आर्मी लैंड का पहले बनाया हुक्मनामा, फिर करायी रजिस्ट्री और म्यूटेशन करवा कर बेच दिया-3

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Akshay Kumar Jha

Ranchi:  ऐसा झारखंड में ही संभव है. एक ऐसी जमीन जो है आर्मी की. लेकिन उसपर कब्जा करने के लिए फर्जी तरीके से पहले आदिवासी लैंड बताकर सरेंडर कराया जाता है. उसके बाद उसका हुक्मनामा बनवाया जाता है. रजिस्ट्री करायी जाती है और फिर म्यूटेशन भी करा लिया जाता है.

म्यूटेशन कराने के बाद जमीन को एक भारी भरकम कीमत पर बेच दी जाती है. खरीदने वाला दोबारा से रजिस्ट्री करा लेता है. यह सब खेल होने के बाद जब मामला एक कोर्ट में आता है, तो मालूम चलता है कि जमीन तो डिफेंस की है.

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मीडिया में खबर आती है, लेकिन हिम्मत की दाद दीजिए जमीन पर निर्माण काम नहीं रुकता है. जमीन माफिया की पकड़ और पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है. कैसे हुआ यह सारा खेल न्यूज विंग इसका खुलासा करने जा रहा है.

रिप्लिका इस्सेट ने आर्मी की जमीन की करायी रजिस्ट्री और म्यूटेशन

2009 के आसपास इस जमीन पर रिप्लिका इस्सेट की नजर पड़ी. रिप्लिका इस्टेट के डायरेक्टर अशोक सिन्हा ने पहले फर्जी तरीके से इसे आदिवासी जमीन बनाते हुए सरकार के पास इसे सरेंडर कराया. सरेंडर कराए जाने के बाद किसी जनार्दन पांडे नाम के जमीनदार से इसका हुक्मनामा तैयार किया गया.

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हुक्मनामा तैयार होने के बाद इस जमीन की रजिस्ट्री करा दी गयी. जबकि अरगोड़ा अंचल के हिनू मौजा के खाता नंबर 122 के प्लॉट नंबर 1602, 1603 शुद्ध रूप से ये आर्मी की जमीन है.

इस बात को एसएआर कोर्ट मान चुकी है. जमीन का म्यूटेशन करा दिया गया. जबकि म्यूटेशन करने वाले अधिकारी को अच्छी तरह से पता होगा कि यह जमीन डिफेंस लैंड है.

निश्चित तौर पर गलत जमीन का म्यूटेशन करने पर तत्कालीन सीओ जांच के घेरे में आते हैं. दूसरी तरफ एसएआर कोर्ट में जमीन की असलियत सामने आने के बावजूद तत्कालीन सीओ पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं होती है. जिससे रांची में जमीन माफिया का मनोबल बढ़ा.

पुलिस ने फ्रॉर्ड केस को दीवानी साबित कराया

आर्मी लैंड का किसी और के साथ एग्रीमेंट कराने पर रिप्लिका के डायरेक्टर अशोक सिन्हा के खिलाफ चार जून 2017 को फ्रॉर्ड का केस दर्ज हुआ. जिस अंचल कार्यालय ने एक आरटीआई के जवाब में लिखा था कि यह जमीन रिप्लिका इस्टेट के साथ-साथ आर्मी की भी है. उसी कागजात के साथ छेड़छाड़ कर कोर्ट में यह कागजात उपलब्ध कराया गया.

लेकिन इस बार इसमें जमीन आर्मी की होने का उल्लेख नहीं किया गया. ऐसे में कोर्ट की तरफ से मामले को जमीन से जुड़ा हुआ यानि दिवानी मामला करार दिया गया.

सरकार ने दी थी आर्मी को जमीन लेकिन आर्मी ने अधिग्रहण नहीं कियाः अशोक सिन्हा

मामले पर रिप्लिका के डायरेक्टर अशोक सिन्हा ने न्यूज विंग से बात करते हुए कहा कि 1945 में आर्मी ने ब्रीटिश सरकार को जमीन के लिए लिखा था. सरकार उस वक्त जमीन देने को तैयार हो गयी थी. लेकिन आर्मी ने जमीन का अधिग्रहण नहीं किया.

वहीं एसएआर कोर्ट के फैसले पर उन्होंने कहा कि एक आदिवासी ने अपनी जमीन वापसी के लिए कोर्ट में अपील की थी. जिसमें मैं भी इंटरविन करने में शामिल था. लेकिन कोर्ट ने अपील खारिज कर दी. वैसे अब मेरा इस जमीन से कोई लेना-देना नहीं है. मैंने यह जमीन मनोज कुमार साहू को बेच दी है.

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