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मानव विकास सूचकांक: देश में सबसे पिछड़े हैं आदिवासी व दलित, फिर भी केंद्रीय बजट में इनके लिए 3% ही बढ़ोतरी

Ranchi :  आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि में वित्त मंत्रालय ने एक फरवरी को आम बजट पेश किया. लेकिन देश के सबसे पिछड़े समूह आदिवासी और दलितो के नाम पर खर्च होने वाली राशि में मात्र तीन प्रतिशत की वृद्धि की गयी है. इससे साफ झलकता है कि केंद्रीय बजट में दलित व आदिवासियों की उपेक्षा की गयी.

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सरकार बातें तो करती है, लेकिन बजट के समय भूल जाती है

आदिवासी व दलित समुदाय के लिए केन्द्रीय बजट में किये गये प्रवधानों पर सामाजिक कार्यकर्ता बलराम ने अपनी राय दी है. कहा है कि अगर 2020-21 के बजट को देखें तो पाते हैं कि अनुसूचित जाति के लिए 83, 257 करोड़ रुपये आंवटित हुए. और अनुसूचित जनजाति के लिए 53, 653 करोड़ रुपये. ये धनराशि अजा की 323 स्किमों के लिए और अजजा की 331 स्किमों के अंतर्गत आवंटित की गयी. यह राशि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए दी गयी है.

सरकार लगातार दलित और आदिवासी समुदायों के विकास की आवश्यकता पर बात करती रही है. हालांकि यह वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में प्रतिबिंबित नहीं होता है. अनुसूचित जाति के बजट में लक्षित योजनाओं का अनुपात 19:43 है. इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति का बजट अनुपात 32:2 है.

यह बजट का 19, 428 करोड़ है. वास्तव में ये सामान्य योजनाएं हैं. जिन्हें अजा और अजजा का आवरण पहना दिया गया है. सच मायनों में ये अजा और अजजा समुदाय की गुणवत्ता को पूरा नहीं करते. क्योंकि वास्तव में ये सामान्य स्किम हैं. इसलिए ये अजा/अजजा के और सामान्य आबादी के फासले को कम नहीं करतीं.

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पिछड़े वर्ग की महिलाओं की उपेक्षा

एनसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार कहते हैं अगर बजट को देखें तो हम पाते हैं कि केंद्रीय बजट में दलित आदिवासियों के साथ भेद-भाव किया गया. उसमें भी दलित व आदिवासी महिला को इस बजट में प्राथमिकता नहीं मिली है.

उन्होंने कहा कि दलित और आदिवासी महिलाओं को बहुत कम प्राथमिकता दी गयी है. या कहना चाहिए कि प्राथमिकता नहीं दी गयी है. 2020-21 के बजट में दलित महिलाओं के लिए 0.8 प्रतिशत है. यानी उनके लिए 7986.91 करोड़ रुपये सीएसएस और सीएस द्वारा आवंटित किये गये हैं. आदिवासी महिलाओं के लिए 0.34 प्रतिशत यानी 3174 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं.

लड़कियों के लिए बड़ी मांग वाली पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप में लड़कियों के लिए पर्याप्त राशि आवटन नहीं की गयी. अजा लड़कियो के लिए 251 करोड़ और अजजा लड़कियों के लिए 82 करोड़ रुपये आवंटित किये गये. पिछले वर्ष की तुलना में देखा जाए तो मामूली बढ़ोत्तरी है.  ये महिलाएं आर्थिक संकट से भी गुजर रही हैं. खासकर ग्रामीण भारत में उनकी आय के साधन सिमट गये हैं.

जैसा कि एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है. पिछले छह साल में 2.8 करोड़ ग्रामीण महिलाएं ग्रामीण बाजार से बाहर हो गयी हैं. बजट में अजा महिलाओं के लिए 195 करोड़ और अजजा महिलाओं के लिए 87 करोड़ रुपये का आवंटन दिखाकर एक उदासीन तस्वीर पेश की गयी है. उन्होंने कहा कि मानव सूचकांक में देश में सबसे पिछड़े वर्ग हैं दलित व आदिवासी समुदाय.

पिछड़े वर्ग के बच्चे भी रहे हाशिये पर

झारखंड नरेगा वॉच के राज्य समन्वयक जेम्स हेंरेज और भोजन का अधिकार अभियान के राज्य संयोजक अशर्फी नंद प्रसाद ने कहा कि इस बजट में दलित व आदिवासी समुदाय के बच्चों के साथ भी अन्याय हुआ है. क्योंकि देश में कुपोषण जैसी गंभीर समस्या है. बच्चे जो कि देश की कुल आबादी का 29.50 हैं,  वित्त योजना बनाने वालों की दृष्टि में उपेक्षित ही रहते हैं.

वर्तमान वित्त बजट 2020-21 में भी उनकी उपेक्षा की गयी है. उन पर बहुत कम घ्यान दिया गया है. उनकी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों की सुरक्षा, बाल विवाह, बालश्रम आदि पर फोकस नहीं किया गया है. राष्ट्रीय बाल श्रम प्रोजेक्ट के लिए अजा एवं अजजा के बच्चों के लिए सिर्फ 30 करोड़ आवंटित किया गया.

यह सरकार की अजा व अजजा के बच्चों के प्रति उपेक्षा को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि बच्चों की जरूरत के लिए स्टेटमेंट 12 के तहत सिर्फ 96042 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया है. बच्चों के लिए बजट के आवंटन का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अजा और अजजा के बच्चों के लिए काफी कम बजट का प्रावधन किया गया है.

विभिन्न मंत्रालयों की अनुसूचित जाति के बच्चों की 20 स्किमों का अघ्ययन करने पर पता चलता है कि उनके लिए 20,838 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं. वहीं अनुसूचित जनजाति के बच्चों के लिए 12, 635 करोड़ रुपये 17 स्किमों के तहत आवंटित किये गये हैं.

कार्यक्रम में इनकी रही भागीदारी

आदिवासी एवं दलित समुदाय के लिए केन्द्रीय बजट में किये गये प्रावधान पर चर्चा में तारामणि साहू, अकाश, राकेश किड़ो मौजूद रहे. परिचर्चा के बाद केंर्दीय बजट में दलित आवासियों समुदाय के लिए क्या है,  इस मुद्दे  को लेकर राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान और भोजन के अधिकार अभियान आदि संगठनों की ओर से प्रेस कांफ्रेस भी किया गया.

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