
Ranchi : 2017 में झारखंड में जुवेनाइल जस्टिस रूल बना था. इसके आलोक में राज्यभर के विभिन्न थानों में बाल कल्याण की दिशा में बाल मित्र थाना पिछले तीन सालों में खोले गये. कुल 611 थानों में से 210 थानों में बाल मित्र थाना संचालित हो रहा है.
रूल के अनुसार, इसमें बच्चों के लिए अनुकूल थाना, चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट और अन्यान्य अहम कार्यों को प्रोत्साहित किया जाना है. इसके लिए राज्य सरकार द्वारा 50 लाख रुपये का आवंटन वित्तीय वर्ष 2018-19 में किया गया.
लेकिन झारखंड राज्य बाल संरक्षण आयोग अब तक यही सोचने में लगा है कि नियमावली के अनुसार फंड का उपयोग कैसे और किस तरह से हो.
इसे भी पढ़ेंः 7 से 16 फरवरी तक चलेगा इंटरनेशनल मेगा ट्रेड फेयर, आठ देशों के लगेंगे स्टॉल
क्या है बाल मित्र थाना का उद्देश्य

सीआइडी और यूनिसेफ के द्वारा बाल मित्र थाना के गठन की पहल हुई थी. अपराध अनुसंधान विभाग, झारखंड के अनुसार 2016 में 27, वर्ष 2017 में 84 और वर्ष 2018 में 99 बाल मित्र थाना का गठन किया गया. उद्देश्य था, बच्चों के मामले में पुलिस अधिकारी संवेदनशील हों.
और किसी तरह की अमियमितता होने पर समुचित कार्रवाई करें. बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा का ध्यान रखा जाये. यूनिसेफ झारखंड की प्रमुख मधुलिका जोनाथन के अनुसार किशोर न्याय अधिनियम 2015 बच्चों के हित में है. इसे जल्द से जल्द पूरी तरह धरातल पर उतारा जाना चाहिए.
बाल मित्र पुलिस थाना इसी दिशा में उठाया गया कदम है. इसके तहत यह सुनिश्चित किया जायेगा कि बच्चों के साथ थानों में मित्रवत व्यवहार किया जायेगा. बाल मित्र थाना के लिए 21 मानक बनाये गये हैं. इस मानक को संसाधन और समुदायों तक पुलिस की पहुंच को ध्यान में रख कर तैयार किया जाता है.
इसे भी पढ़ेंः सात माह बाद काउंसेलिंग करने पर अड़ी सीडब्ल्यूसी गुमला, परिजनों के लिखित आवेदन के बाद छोड़ा बच्चियों को
रांची में खुला था झारखंड का पहला बाल मित्र थाना

झारखंड का पहला बाल मित्र थाना वर्ष 2011 में रांची के गोंदा थाना में खुला था. सीआईडी की एडीजी आशा सिन्हा और रांची प्रक्षेत्र की डीआईजी संपत मीणा ने इस थाने का उद्घाटन किया था. दक्षिणी छोटानागपुर प्रक्षेत्र से इस थाने की शुरूआत हुई थी.
जिसे धीरे-धीरे पूरे राज्य में खोला गया है. उद्घाटन समारोह में एडीजी आशा सिन्हा ने कहा था कि बाल अपराधियों से पुलिस का व्यवहार आम अपराधियों से अलग हो, इसी उद्देश्य से इस थाने को मूर्त रूप दिया गया है. इसमें जूवेनाइल जस्टिस एक्ट-2000 के प्रावधानों से दक्ष पुलिस अधिकारी और पुलिसकर्मी को लगाया जाएगा.
बाल मित्र थानों के लिए निर्धारित मापदंडों पर उठते सवाल
किसी थाना में बाल मित्र थाना स्थापित करने को कुछ मापदंड तय किये गये हैं. बच्चों को बैठने, शौचालय और पेयजल की सुविधा हो. थाने के बाल कक्ष में बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी या कोई प्रषिक्षित पुलिसकर्मी उपस्थित हो. बच्चों से बातचीत करने को अलग से कमरा या स्थान होना चाहिए.
बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी का बाल कल्याण समिति, किशोर न्यास बोर्ड, बाल गृह के अधीक्षक, प्रोबेशन पदाधिकारी व जिला विधिक सेवा के साथ समन्वय होना चाहिए. बच्चों-किशोरों से पुलिस कैसे पेश आती है, उनसे कैसे पूछताछ की जाती है, कहां रखा जाता है, पूछताछ के वक्त पहनावा और अन्य ऐसे बुनियादी तथ्यों की जानकारी पुलिस पदाधिकारियों को होनी चाहिए.
वास्तविक रूप से सभी चिन्हित बाल मित्र थानों में ऐसी स्थिति नहीं दिखती. कई थानों में ऐसे बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी हैं जिन्हें कभी इस संबंध में समुचित ट्रेनिंग नहीं मिली. थाना में आनेवाले बच्चों के लिए एक कमरा सुनिष्चित रखना भी चुनौती है. कई बार तो बच्चों के लिए खानपान तक की व्यवस्था अपने पैसों से करनी पड़ती है.
जेजे फंड में 80 लाख की पड़ी है राशि
पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार ने 50 लाख रुपये का आवंटन जेजे एक्ट को प्रभावी बनाने को दिये थे. एक्ट के अनुसार सीएसआर फंड, व्यक्तिगत चंदा या अन्य स्तर से भी एक्ट के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सहयोग लिया जा सकता है. इस आधार पर लगभग 30 लाख रुपये एकत्रित हुए. अर्थात लगभग 80 लाख रुपये जेजे एक्ट को सुदृढ़ करने को उसके खाते में पड़े हुए हैं.
फंड के उपयोग की योजना पर जारी है काम
झारखंड राज्य बाल संरक्षण संस्था के निदेशक डीके सक्सेना के अनुसार झारखंड राज्य बाल संरक्षण संस्था जेजे एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बेहतर प्रयास कर रही है. जेजे एक्ट के क्रियान्वयन के लिए विभिन्न संरचनाएं हैं, उसमें सबकी जवाबदेही है.
जो फंड संस्था के पास हैं, उनका विभिन्न स्तरों पर उपयोग किया जाना है. संस्था जल्दी ही इस संबंध में रणनीति बनायेगी. इसके बाद फंड का बाल कल्याण के लिए उपयोग करना शुरू हो जायेगा.
इसे भी पढ़ेंः #NirbhayaCase: एक साथ होगी फांसी, दिल्ली HC ने आगे की अपील के लिए दोषियों को दी एक हफ्ते की मोहलत




