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सीबीआई विवाद में रफाल डील भी एक अहम मुद्दा

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Faisal Anurag

केंद्र सरकार ने जिस तरह आधी रात को सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को जबरन अवकाश पर भेजा है उससे कई तरह के सवाल उठे हैं. विशेष निदेशक राकेश आस्थाेना को भी छुटटी पर भेज दिया गया है और नागेश्वकर राव को अंतरिम निदेशक बना दिया गया है. उल्लेखनीय है कि एम नागेश्वर राव को आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सीबीआई ने हटाने की सिफारिश की थी. बावजूद इसके सीबीआई में मचे घमासान के बीच उन्हें इसका प्रभार दिया गया है.

सीबीआई के इस प्रकरण के कई गंभीर पहलू है. केंद्र पर आरोप लग रहा है वह अस्थाभना को बचाने के लिए गुजरात मॉडल का प्रयोग कर रही है. केंद्र को निदेशक को छुटटी पर भेजने का कानूनी हक नहीं है और न ही बिना नियुक्ति समिति के बैठक के केंद्र किसी अन्यी को निदेशक बना सकता है. साथ ही अस्थातना मामले की जांच कर रहे तेरह अधिकरियों का भी रातो-रात तबादला किया जाना संदेह को पुख्ताय ही बना रहा है. इसके साथ ही यह तथ्यध भी सामने आ रहा है कि इस पूरे प्रकरण का एक पहलू रफाल घोटाले से जुड़ा है. निदेशक आलोक वर्मा से पिछले दिनों अरूण शौरी, प्रशांत भूषण और यशवंत सिन्हाह ने मुलाकात कर उन्हें इस मामले में कुछ अहम दस्तावेज दिए थे. प्रधानमंत्री इस मुलाकात से नाराज बताए गए थे और माना जा रहा है कि सरकार को अंदेशा है कि आलोक वर्मा इस दस्ताेवेज के आधार पर मामला सीबीआई में दर्ज कर जांच शुरू कर सकते हैं. इससे सरकार में बेचेनी थी. यह भी चर्चा है कि आलोक वर्मा ने केंद्र सरकार से रफाल संबंधी कुछ फाइलों की मांग की थी. प्रधानमंत्री और अमित शाह के प्रिय अफसर अस्था ना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद से केंद्र सरकार वर्मा से काफी नाराज थी और माना जा रहा है कि इन्हीं कारणों से वर्मा के खिलाफ केंद्र ने कदम उठाया.

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रफाल मामले में केंद्र लगातार दबाव में आता जा रहा है और यह प्रमाणित भी होता जा रहा है कि इस डील में सब ठीक-ठाक नहीं है. दिल्ली् में यह चर्चा है कि इस मामले में प्रशांत भूषण और अरूण शौरी ने जो दस्तावेज सीबीआई को दिये हैं उसमें काफी तथ्यम और प्रमाण हैं. शौरी ने कहा भी है कि उनके दस्तादवेजों से साफ है कि यह पूरी डील एक बड़ा घोटाला है और इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाफचार हुआ है. शौरी ने इसे बोफर्स से कई गुणा ज्यांदा बड़ा  घोटाला बताया है. इस मामले में केंद्र सरकार की घबड़ाहट दिखने लगी है. सरकार इस पर स्थिति साफ करने की बजाय जिस तरह का कदम उठा रही है उससे उस पर अंदेशा बढ़ता ही जा रहा है. सीबीआई के निदेशक के खिलाफ उठाए गए ताजा कदम के बाद यह मामला सोशल मीडिया में चर्चा में है. मीडिया पर पूरी तरह नियंत्रण के बावजूद इस विवाद का गहराना सरकार की सेहत के लिए ठीक प्रतीत नहीं हो रहा है.

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राकेश अस्थारना को सीबीआई में प्रधानमंत्री ने अपनी पहल पर ही लाया था और तमाम तरह की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया था. अस्थााना की भूमिका को लेकर सीबीआई के अनेक अधिकारी परेशान रहे हैं. उन्हें लगता रहा है कि राजनीतिक विवाद सेटल करने के लिए इस संस्थाश का अस्थालना इस्तेमाल कर रहे हैं. अनेक राजनीतिक मामलों को निपटाने के अस्था ना के तरीके के प्रति आलोक वर्मा की नाराजगी सार्वजनिक है. यह भी कहा जा रहा है कि सीबीआई का जिस तरह राजनीतिक इस्तेामाल अस्था ना ने किया है, उससे सीबीआई के अनेक अधिकारी अप्रसन्नर हैं. इस परिप्रेक्ष्यह में तमाम प्रकरण साबित करता है कि इस शीर्ष जांच एजेंसी ने केवल पिंजरे के तोतो की ही भूमिका नहीं निभायी है, बल्कि उसने सरकार के विरोधी नेताओं के खिलाफ कदम भी उठाया है. अपनी गिरफ्तारी रोकने के लिए हाईकोर्ट दिल्लीत में अर्जी अस्थाहना ने दर्ज की है. उसमें लिखा है कि आम नागरिक को परेशान करने की पुलिस की असीमित क्षमता है. तो क्याक अपनी ही भूमिका को अस्थारना ने इस रूप में उजागर किया है, यह भी चर्चा को विषय बना हुआ है.

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अस्थाैना मामले की जांच कर रहे 13 अधिकरियों के अचानक हुए तबादले से भी साफ लग रहा है कि क्याी अस्थांना को बचाने की कोशिश की जा रही है. आखिर इस तबादले की मंशा क्याा है. केंद्र इस का ठोस जवाब देने की स्थिति में भी नहीं है. कार्रवाई तो अस्थाना के खिलाफ होनी थी, लेकिन उन्हें  बचाने के सारे उपक्रम किए जा रहे हैं.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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