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गुड गवर्नेंस का सड़ांध बाहर निकल रहा है

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Kumar Saurav

सीबीआइ के नंबर एक और नंबर दो के ओहदे पर बैठे अधिकारियों के बीच का विवाद इस बात की गवाही दे रहा है कि भले ही देश के हुक्मरान गुड गवर्नेंस का दंभ भरें, लेकिन हकीकत कुछ और है. सीबीआइ की इस खुली लड़ाई का नतीजा जो भी निकले देश की जनता की नजरों में इसकी साख का संकट लंबे समय तक बना रहेगा. सीबीआइ कोई स्वायत्त संस्था नहीं है यह बात सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भी पता चलता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह पिंजड़े में बंद तोता है. इसका इस्तेमाल राजनेता अपने-अपने फायदे के लिए करते रहे हैं. इस बात का अंदाजा तो बहुत पहले से था कि सीबीआइ के भीतर भी सब कुछ पाक-साफ नहीं और वहां भी भ्रष्टाचार की नाली का पाट धीरे-धीरे बढ़ रहा था. उसी का सड़ांध अब बाहर निकल रहा है.

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पूरे घटनाक्रम की जिम्मेवारी किसकी

इस पूरे मामले में सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा ने दो बार प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचित किया. दूसरी बार की सूचनी औपचारिक पत्र के माध्यम से. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग का काम सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देखते हैं. पूर्व निदेशक अलोक वर्मा ने जिस संक्रमण की बात कही है वह सभी ओऱ बढ़ रहा है. या यह कहें कि संक्रमण इतनी तेजी से फैल रहा है कि पूरा सिस्टम इसकी चपेट में आ सकता है. शासन-प्रशासन के इस ढांचे को यदि बचाना है तो भ्रष्टाचार के इस संक्रमण को फैलने से रोकना होगा.

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पहले भी कई मामले आये हैं अस्थाना के

राकेश अस्थाना मूल रूप से गुजरात कैडर के अधिकारी हैं और पीएम औऱ अमित शाह के चहेते हैं. राहुल गांधी उन्हें ‘ब्लू आइड बॉय’ भी कह चुके हैं. अस्थाना पर पहले भी एक मामला दर्ज हो चुका था. गुजरात की एक कंपनी के मामले में फेवर करने और भ्रष्ट अचरण करने के मामले में सीबीआइ ने ही एफआइअर दर्ज किया था, जिसमें राकेश अस्थाना का भी नाम शामिल था. इसके अलावा राकेश अस्थाना कई हाइ प्रोफाइल मामलों की जांच से भी जुड़े रहे हैं जिनका नतीजा सिफर रहा है. इसमें विजय माल्या और अगस्ता वेस्टलैंड के मामले शामिल हैं. मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अस्थाना ने ही क्लीन चिट दी थी. यह बात लगभग साफ हो चुकी है कि आलोक वर्मा सीबीआइ में गैर-संवैधानिक राजनीतिक दखल को रोकने का प्रयास कर रहे थे. राकेश अस्थाना पहले सीबीआइ चीफ के तौर पर काम कर चुके थे, और उन्हें इस दखल से कोई खास परेशानी नहीं थी.

आगे क्या

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इस मामले में सीबीआइ के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के लिए 26 अक्टूबर की तारीख दी है. अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ही टिकी हैं. चौतरफा संकट के समय में इस वक्त सुप्रीम कोर्ट से लोगों को बड़ी आस है.

 

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