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कमजोर होता जा रहा है पुलिस का खुफिया तंत्र, टेक्निकल सेल पर बढ़ी निर्भरता

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Ranchi: तकनीक के युग में पुलिस तो हाईटेक हो गई है, लेकिन अपने महत्वपूर्ण अंग जमीनी मुखबिरी तंत्र को पुलिस ने कहीं पीछे छोड़ दिया है. मौजूदा वक्त में जमीनी मुखबिरों का स्थान थानों पर दलाल किस्म के लोगों ने ले लिया है.

बीते समय का मुखबिरी तंत्र ध्वस्त होने से राज्य में बढ़ते अपराधों पर रोकथाम लगा पाने में पुलिस नाकाम साबित हो रही है. इसकी मुख्य वजह है कि, जमीनी मुखबिरों की जगह थानों पर दलालों ने ले लिया है,जो अपराधियों से साठगांठ कर धनउगाही में लगे रहते हैं.

झारखंड में मौजूदा वक्त में पुलिस का खुफिया तंत्र कमजोर होते जा रहा हैं और पुलिस पूरी तरह सर्विलांस ट्रैकिंग सिस्टम पर निर्भर होती जा रही है.

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प्रदेश के किसी भी थाने में आपराधिक वारदात घटित होते ही पुलिस सबसे पहले क्राइम ब्रांच फोन कर अपराध की सूचना देती है. क्योंकि उसे पता है कि सर्विलांस के जरिए आसानी से अपराधियों से संबंधित जानकारी हासिल की जा सकती है.

जबकि कई वर्षों पहले यह काम थाना स्तर पर पुलिस द्वारा आम जनता के बीच से खड़ा किया हुआ जमीनी मुखबिर करता था. जो अपराधियों के ही बीच में बैठ कर उनकी अपराधिक साजिश की सूचना पुलिस को दिया करता था.

पुलिस के पास ऐसे मुखबिर नहीं हैं जो घटना की दे सके पूर्व जानकारी

राज्य में आपराधिक घटनाएं बढ़ गई हैं. अपराधी हर दिन कहीं-न-कहीं घटना को अंजाम देकर खुली चुनौती दे रहे हैं. कई ऐसे बड़े घटना में शामिल अपराधियों को पुलिस पकड़ पाने में असफल हो रही है. घटना की पूर्व जानकारी दे सकें, पुलिस के पास ऐसे मुखबिर नहीं हैं और जो हैं उनका भरोसा अफसरों पर नहीं रहा.

पुलिस के कमजोर सूचना तंत्र के कारण राज्य में कई अपराधिक घटनाएं हुई और उसे सुलझाने में पुलिस सफल नहीं हो पाई है. हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सर्विलांस के जरिए पुलिस वारदात के बाद अपराधियों तक पहुंच सकती है, लेकिन जमीनी स्तर के मुखबिर के जरिए पुलिस अपराधियों तक वारदात होने से पहले ही पहुंच सकती है.

पुलिस एकतरफा जानकारी देने वाले मौकापरस्त लोगों का सहारा ले रही है

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, खुफिया तंत्र मजबूत बनाने के लिए पुलिस को मिसलेनियस फंड मिलता है. थाने के क्षेत्रफल के अनुपात में यह राशि 25 से 50 हजार रुपए तक होती है.

जानकारों के मुताबिक, यह राशि मुखबिरों पर खर्च नहीं होती.
पुलिस एकतरफा जानकारी देने वाले मौकापरस्त लोगों का सहारा ले रही है.

इस कारण अपराधिक घटनाओं को रोक पाने में पुलिस विफल रही. पहले मुखबिर पुलिस के लिए जान जोखिम में डाल कर काम करते थे. इससे पुलिस को पहले ही कई मामले की जानकारी हो जाती थी और बड़ी-बड़ी घटनाएं टल जाती थीं या चंद दिनों में खुलासा हो जाता था. अपराधी पकड़े जाते थे. मुखबिर उनसे दूर होते गए और अपराध बढ़ता जा रहा है.

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इसलिए दूर होते गए सूचना देने वाले

मुखबिरी कर चुके कुछ लोगों के अनुसार, पुलिस ने भरोसा खो दिया है. वे अफसरों के लिए काम करते हैं तो अपराधियों से जान का खतरा रहता है और इससे दूर होने की कोशिश करते हैं तो फर्जी मामलों में फंसाकर पुलिस जेल भेज देती है.

ऐसी स्थिति में दोनों के बीच पिसना पड़ता है. मिली जानकारी के अनुसार, पुलिस अगर किसी अपराध को खोल पाने में नाकाम होती तो इसका ठीकरा थाने के मुखबिर पर फोड़ कर उसे ही जेल भेज देती है.

पुलिस अधिकारियों के पास नहीं है समय

पहले पुलिस की मदद के लिए मुखबिरों का मजबूत तंत्र हुआ करता था. कुछ अब मुखबिरी को झंझट समझने लगे और पुलिस से दूर होते गए. मुखबिर तैयार करने की जिम्मेदारी जिले के एसपी और थानेदारों की होती है.

इसके लिए अफसरों के पास समय होना चाहिए. लेकिन अब अफसरों के समय नहीं रहता. पुलिस अधिकारियों की तबादला नीति ऐसी है कि साल-छह महीने में उन्हें हटा दिया जाता है.

ऐसे में क्षेत्र का लॉ एंड ऑर्डर दुरुस्त रखना उनके लिए चुनौती होती है. पहले किसी थाने में थानेदार तीन-तीन साल तक रहते थे.

कैसे बनते थे जमीनी मुखबिर

इलाके के ऐसे युवक जो छोटे-छोटे अपराध किए हों, पुलिस अफसर उन्हें भरोसे में लेते थे. मिसलेनियस फंड से उन्हें दो से पांच हजार रुपए तक महीना मिलता था. छोटे मामलों में अफसर थाने में उनकी पैरवी सुनते थे.

कुछ काम भी दिलवा दिया करते थे जिससे उनकी रोजी-रोटी चलती रहे. बदले में ऐसे युवक अफसरों के लिए मुखबिरी करते थे. क्षेत्र के अपराधी या वहां होने वाली हर गतिविधियों की जानकारी देते थे. इससे पुलिस पहले ही सतर्क हो जाती थी और गुप्त सूचना पर कार्रवाई करती थी.

पहले थानों में मुखबिर रखना जरूरी होता था

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पहले थानों पर मुखबिर रखना जरूरी होता था. इससे क्षेत्र में अपराध होने के बाद अपराधियों को पकड़ने में मदद मिलती थी, पर मौजूदा समय में मनचाहे थाने में पोस्टिंग के लिए धन का खेल होता है. जिसके चलते अपने दिये रुपये जल्दी वसूलने के लिए थानेदार थानों पर दलाल किस्म के मुखबिर एक्टिव कर रुपए कमाने में जुट जाते हैं.

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