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30 करोड़ की साड़ी के 1000 करोड़ की कंपनी ढूंढने पर बीजेपी सांसद महेश पोद्दार ने दी सलाह, कहा – विरोधाभासी फैसलों से बचना बेहतर

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Ranchi: श्रम विभाग राज्य की निबंधित महिला मजदूरों के बीच साड़ी और पुरुष मजदूरों के बीच शर्ट और पैंट का कटपीस बांटने की तैयारी में है. राज्य में करीब आठ लाख मजदूर निबंधित हैं. कपड़ा खरीदने के लिए निकाली गयी निविदा आजकल चर्चा में है.

इससे पहले श्रम विभाग ने साड़ी खरीदने के लिए जो निविदा निकाली थी, उसमें 1000 करोड़ रुपये से ऊपर का उत्पादन हर साल करनेवाली कंपनी ही हिस्सा ले सकती थी. इसके अलावा वैसी कंपनी भी टेंडर में हिस्सा ले सकती है, जो पांच करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के हिसाब से सालाना बिक्री कर रही है.

अब उसमें थोड़ा चेंज कर दोबारा से टेंडर निकालने की तैयारी है. लेकिन 1000 करोड़ की कंपनी ढूढने की वजह से विभाग चर्चा में आ गया है. यहां तक कि बीजेपी के राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार भी मामले पर विभाग और सरकार को सलाह देने का काम कर रहे हैं.

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सांसद ने किया ट्विट होने लगे ट्रोल

महेश पोद्दार ने आठ तारीख को एक ट्विट किया. ट्विट में उन्होंने लिखा कि “शिल्पकारों के उत्पाद बिकवाने के लिए #Flipcart के साथ MOU और श्रमिकों के बीच धोती-साड़ी- पैंट-शर्ट बांटने के लिए 1000 करोड़ की कंपनी की तलाश!!! ऐसे विरोधाभासी फैसलों से बचना बेहतर।”

 

महेश पोद्दार के ट्विट के बाद समाजसेवी आरपी शाही ने भी ट्विट किया. उन्होंने लिखा कि “आप लोगों ने झारखंड के संस्थानों से साड़ी ख़रीदने का सुझाव देकर कितने एजेंटों की नींद ख़राब कर दी। अब पैंट का कपड़ा यहाँ कौन बनाता है?”

 

इस ट्विट पर अजय भंडारी नाम के शख्स ने ट्विट किया और कहा कि “Pant का कपड़ा चाहे कोई न बनाता हो, Pant बनाने वाले तो हज़ारों हैं। Bangluru aur Gurugram के कारखानों में भी यहीं के कारीगर काम करते हैं। फिर Jharkraft या खादी बोर्ड के माध्यम से, यहीं से खरीदारी क्यों नहीं?”

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समस्या कि पैंट का कपड़ा तो विभाग देगी, लेकिन सिलाई का खर्च कौन देगा

श्रम विभाग की तरफ से मजदूरों को सिर्फ पैंट का कटपीस दिया जाएगा. बाकी पैंट की सिलाई मजदूरों को खुद से करनी है. एक पैंट की सिलाई 300 रुपए के आस-पास आती है. जबकि एक मजदूर की एक दिन की दिहाड़ी ही 300 होती है.

ऐसे में मजदूरों के लिए सिलाई का खर्च देना खासा मुश्किल हो सकता है. मजदूरों को साड़ी और शर्ट-पैंट देने के लिए थोक में खरीदारी की जायेगी. एक ही रंग की साड़ी और शर्ट-पैंट के कपड़े दिये जायेंगे. इस तरह मजदूरों के लिए कपड़े यूनिफार्म की तरह हो जायेंगे.

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