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दो साल में 2006 एकड़ में लगी ‘नशे’ की फसल को नष्ट किया पुलिस ने

Ranchi : दुनिया में अफीम की खेती के लिए अफगानिस्तान बदनाम है, लेकिन झारखंड मिनी अफगानिस्तान बन चुका है. जहां बिना किसी डर अफीम की खेती की जाती है. देश और दुनिया में उस ज़हर की तस्करी होती है. ड्रग माफिया और उग्रवादी संगठन इस अवैध कारोबार से मालामाल हो रहे हैं.

झारखंड ऐसा राज्य है जहां के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 30 फीसदी हिस्सा जंगल है. वो राज्य जो कभी अपनी खनिज संपदाओं के लिए जाना जाता था, अब अफीम जैसे नशीले पदार्थ की अवैध खेती की वजह से मिनी अफगानिस्तान के नाम से बदनाम हो रहा है. साल दर साल यहां अवैध तरीके से अफीम की खेती बढ़ती जा रही है जिसकी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों भी तस्करी हो रही है.

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राज्य के 9 जिलों में अफीम की नष्ट फसलों का आंकड़ा

चतरा में 829 एकड़, खूंटी में 951 एकड़, लातेहार में 76 एकड़, रांची में 83 एकड़, पलामू में 17 एकड़, चाईबासा में 17 एकड़, सरायकेला में 30 एकड़, सिमडेगा में 11 डिसमिल और गिरिडीह में 11 डिसमिल अफीम की फसल नष्ट की गयी है. वहीं राज्य में 2020 और 2021 में 2006 एकड़ में अफीम की फसल को नष्ट किया गया है. 2019 और 2020 तक 1838 एकड़ में अफीम की फसल को नष्ट किया गया था.

चतरा में 808 एकड़, खूंटी में 666 एकड़, लातेहार में 137 एकड़, रांची में 170 एकड़, पलामू में 31 एकड़, हजारीबाग में 07 एकड़, गुमला में 1.5 एकड़, चाईबासा में 14 एकड़ और रामगढ़ में 1.5 एकड़ में अफीम की फसल को नष्ट किया गया था.

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यूं तो अफीम की खेती एमपी, यूपी और राजस्थान के कुछ इलाकों में वैध तरीके से होती है, जिसका इस्तेमाल दवाइयां बनाने में होता है. अफीम की खेती के लिए सेंट्रल नारकोटिक्स ब्यूरो से लाइसेंस लेना होता है. उसके बाद ही कोई व्यक्ति अफीम की खेती कर सकता है, हालांकि इसके बाद अफीम की पूरी पैदावार सरकार को सौंपनी पड़ती है.

लेकिन झारखंड में अफीम के ये खेत पूरी तरह से अवैध हैं. दूसरे राज्यों के ड्रग माफिया और उग्रवादी संगठन ग्रामीणों को पैसों का लालच देकर बड़े पैमाने पर अफीम की अवैध खेती करा रहे हैं. अफीम की ये खेती नक्सल प्रभावित इलाकों में होती है. जहां बिना सुरक्षा जाना अपनी मौत को दावत देना होता है.

स्थानीय ग्रामीण अफीम की खेती करते हैं, बाहर के लोग इन्हें शुरुआत में खेती करना सिखाते हैं. और अब प्रोत्साहन देकर खेती कराते हैं. नक्सलियों का भी इसमें योगदान है.

नक्सली भी अफीम की खेती में शामिल होते हैं. यहां के ग्रामीण अशिक्षित हैं इसलिए वो ज्यादा पैसों के लालच में बहकावे में आ जाते हैं.

झारखंड के 24 में से 9 जिलों में अफीम की खेती हो रही है. 2019 और 2020 में कुल 1800 एकड़ में लगी अफीम और पोस्ता की फसल को नष्ट किया गया है. 2020 और 2021 में 2006 में एकड़ में अफीम की फसल नष्ट की गयी है.

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2020 और 2021 में कितने मामले हुए दर्ज

  • चतरा जिले में 24 लोग गिरफ्तार, 41 मामले दर्ज
  • खूंटी में 25 लोग गिरफ्तार, 21 मामले दर्ज
  • लातेहार में कोई गिरफ्तारी नहीं, 3 मामले दर्ज
  • रांची में कोई गिरफ्तारी नहीं, एक भी मामला दर्ज नहीं
  • पलामू में 29 लोग गिरफ्तार,4 मामले दर्ज
  • चाईबासा जिले में 2 लोग गिरफ्तार, 3 मामले दर्ज
  • सरायकेला जिले में एक भी गिरफ्तारी नहीं, एक मामला दर्ज
  • सिमडेगा में दो गिरफ्तार, 2 मामले दर्ज
  • गिरिडीह में एक मामला दर्ज, एक की गिरफ्तारी
  • कुल 82 लोग गिरफ्तार, 76 मामले दर्ज

एक एकड़ में 40 किलोग्राम अफीम

जानकार बताते हैं कि एक एकड़ जमीन में 40 किलोग्राम अफीम की पैदावार होती है. स्थानीय बाजार में 25 हजार रुपये किलो बिकती तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक लाख रुपये तक इसकी कीमत होती है.

अफीम के फल से निकलनेवाला पोस्ता दाना बाजार में एक हजार रुपये किलोग्राम, फल का छिलका भी 500 से 700 रुपये प्रति किलो बिक जाता है. यूपी और कोलकाता की मंडियों तक अफीम पहुंचायी जाती है.

वहां से माल चेन्नई और बांग्लादेश जाता है. पुलिस के अनुसार बनारस और गोरखपुर के व्यापारी इससे अधिक जुड़े हैं. इससे हेरोइन और ड्रग तैयार होता है. सूत्रों के अनुसार झारखंड में अफीम का सालाना अवैध व्यापार 100 करोड़ से अधिक का है.

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