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#TB में बेहतर प्रदर्शन के लिए #NITIAayog ने #Jharkhand को दिया था पहला स्थान, जबकि 18 की जगह 7 कर्मचारी ही कार्यरत

आरटीपीसी की रिपोर्ट ने बताया, कितनी कर्मचारियों की है कमी. 16 जिलों के निजी अस्पतालों ने एक भी मरीज का सफल इलाज नहीं किया. टीबी जांच के लिये एडवांस रेफरल लैब में कार्यरत मात्र चार. दवाइयों की कमी से जूझ रहे जिले, लेकिन चार में एक मेडिकल ऑफिसर पद पर.  

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Chhaya

Ranchi : रिवाइज्ड नेशनल टीबी कंट्रोल प्रोग्राम (आरएनटीसीपी) की ओर से जारी वार्षिक रिपोर्ट 2019 में झारखंड से संबधित कई जानकारियां हैं.

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उन्हीं में एक जानकारी यहां राज्य और जिला स्तर पर महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत कर्मचारियों की संख्या से संबंधित भी है. रिपोर्ट 2018 के आंकड़े बताती है.

राज्य स्तर पर टीबी से संबधित कई ऐसे पद हैं जो स्वीकृत ही नहीं हैं. स्टेट अकाउंटेंट, फार्मासिस्ट एसडीएस, स्टोर असिस्टेंट जैसे कर्मचारियों के लिये दो-दो पद स्वीकृत हैं लेकिन कार्यरत एक-एक ही हैं.

मेडिकल ऑफिसर के लिये चार पद हैं लेकिन कार्यरत एक है. लैब टेक्नीशियन के लिये चार पद स्वीकृत हैं लेकिन कार्यरत दो हैं.

Vision House 17/01/2020

यहां तक कि टीबी, एचआइवी को-ऑर्डिनेटर के लिए एक पद होते हुए भी कोई कार्यरत नहीं है. इस तरह पूरे 18 कर्मचारियों की जरूरत है. लेकिन वर्तमान में सात कर्मचारी ही कार्यरत हैं.

इसके पहले नीति आयोग की रिपोर्ट आयी थी जिसमें राज्य को टीबी में बेहतर परफार्मेंस के लिए पहला स्थान दिया गया. 2018 के आंकड़ों पर ही यह रैंकिंग दी गयी.

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एडवांस टीबी टेस्ट के लिये मात्र चार कर्मचारी लैब में

रेफरल लैब आइआरएल में आठ पद स्वीकृत हैं जिसमें से चार ही कार्यरत हैं. टेक्निकल ऑफिसर और लैब अटेंडेंट के लिए पद ही सृजित नहीं हैं. माइक्रोबायोलॉजिस्ट के दो, जिसमें से एक कार्यरत है.

सीनियर लैब टेक्निशियन के लिए एक, जो कार्यरत है. डाटा इंट्री ऑपरेटर के लिये एक पद स्वीकृत है लेकिन कोई कार्यरत नहीं है. राज्य स्तर पर कुल 26 पद हैं जिसमें से दस पदों पर कोई भी कर्मचारी कार्यरत नहीं है.

रेफरल लैब अत्याधुनिक लैब होते हैं जिसमें टीबी की आधुनिक उपकरणों से जांच की जाती है. राज्य टीबी सेल में यह स्थित होता है.

चार में से मात्र एक मेडिकल ऑफिसर

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राज्य में बोकारो, गिरिडीह जैसे जिलों में दवाइयों की कमी रहती है. यहां एमडीआर टीबी से संबधित दवाइयां अक्सर नहीं रहतीं.

कुछ मरीजों ने बताया कि जब भी वे दवाई लेने जाते हैं, जिला टीबी सेल में दवाइयां नहीं रहती हैं. राज्य टीबी सेल की जिम्मेदारी है कि वो राज्यों में पर्याप्त दवाई आपूर्ति करें.

रिपोर्ट की मानें तो राज्य में मेडिकल ऑफिसर के लिए चार पत्र स्वीकृत हैं जबकि कार्यरत मात्र एक हैं. ऐसे में दवाइयों की सप्लाई पर काफी असर पड़ रहा है.

बोकारो और गिरीडीह के टीबी चैंपियंस के अनुसार इन जिलों में एमडीआर टीबी की दवाइयां आये दिन नहीं मिलतीं. फिलहाल गिरीडीह में पिछले चार माह से ये स्थिति है.

जबकि एमडीआर टीबी में दवाइयां रोकने से परेशानी और बढ़ जाती है.

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जिला स्तर पर मात्र दो सीनियर मेडिकल ऑफिसर टीबी

रिपोर्ट की मानें तो राज्य में पांच जिला स्तरीय सीनियर मेडिकल ऑफिसर टीबी के पद स्वीकृत हैं. लेकिन कार्यरत दो हैं. इन जिलों के नाम रिपोर्ट में नही हैं.

जिला टीबी सेल में उपस्थित मेडिकल ऑफिसर की बात करें तो लगभग आठ पद स्वीकृत है लेकिन कार्यरत एक भी नहीं है. जिला स्तरीय अन्य पदों को देखे तो कुल 822 पद स्वीकृत हैं. इसमें से कार्यरत 561 हैं.

ऐसे में लगभग 261 पद रिक्त हैं. राज्य और जिला स्तर पर देखें तो लगभग 284 पद खाली हैं.

राज्य टीबी सेल और आरएनटीपीसी के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मानें तो उन्हें भी हैरानी होती है कि राज्य को नीति आयोग की रिपोर्ट में पहला स्थान कैसे मिल गया.

टीबी के क्षेत्र में काम करने वाले कुछ लोगों का भी यहीं मानना है.

निजी अस्पतालों की परफार्मेंस दयनीय

जिलाकुल मरीजसरकारी अस्पताल में सफल इलाजनिजी अस्पताल में सफल इलाज
चतरा9107230
देवघर119092382
धनबाद25121883635
दुमका27921882347
गढ़वा12385100
गिरीडीह202012080
गोड्डा145312120
गुमला10308233
हजारीबाग14036290
जामताड़ा8708230
खूंटी5515270
कोडरमा6332360
लातेहार6113470
लोहरदगा3923400
पाकुड़155212540
पलामू305221821
पश्चिमी सिंहभूम339528320
पूर्वी सिंहभूम4006208115
रामगढ़94137674
रांची577821100
साहेबगंज32531380484
सरायकेला-खरसांवा2124168430
सिमडेगा7593620

 

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