
Manoj Mishra
Dhanbad : अच्छी नौकरी का ख्वाब लेकर बीआइटी सिंदरी में बीटेक की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं में आधे से अधिक सिर्फ डिग्री लेकर निकल रहे हैं. बीटेक के बाद प्लेसमेंट में कॉलेज की हालत खराब है. कर्ज लेकर, जमीन बेचकर या गिरवी रखकर अपने बच्चों को इंजीनियरिंग के कोर्स में दाखिला दिलाने वाले मां-बाप भी यह नहीं जानते कि उनका सपना पूरा होगा या नहीं.
बीआइटी सिंदरी के पांच वर्षों में नौकरी का आंकड़ा कभी भी 40 फीसदी से ऊपर नहीं गया. लाखों रुपये फीस लेने के बावजूद कॉलेज छात्रों को नौकरी दिलाने में विफल है. छात्र अपने दम पर नौकरी पा रहे हैं. उसके बाद कॉलेज उनसे अपना प्लेसमेंट रिकॉर्ड चमका रहे हैं.
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2013 के बाद तेजी से गिरावट
आंकड़ों के अनुसार बीआइटी सिंदरी के सत्र 2012-13 से लेकर सत्र 2018-19 तक प्लेसमेंट की स्थिति बेहद खराब है. आधे से अधिक छात्र कॉलेज से खाली हाथ ही डिग्री लेकर निकल रहे हैं. वहीं 2007-08 से लेकर 2012-13 तक पास हुए बीटेक छात्रों में से आधे को कॉलेजों से कोई प्लेसमेंट नहीं मिला.
हालांकि 2012-13 तक प्लेसमेंट पाने में सत्र की स्थिति सबसे बेहतर रही. इसके बावजूद आधे छात्र लाखों रुपये और चार साल खर्च करने बाद कॉलेज से खाली ही हाथ लौटे.
बीआइटी सिंदरी के सत्र 2018-19 में कुल 725 छात्रों में से अबतक 214 को ही प्लेसमेंट पाने में सफलता हाथ लगी है. सत्र 2017-18 में प्लेसमेंट पाने में 273 छात्र सफल रहे थे. सत्र 2016-17 में 266, सत्र 2015-16 में 315, सत्र 2014-15 में 304, सत्र 2013-14 में 320 और सत्र 2012-13 में 361 छात्रों ने प्लेसमेंट पाने में सफलता अर्जित की.
वहीं 2007-08 से लेकर 2011-12 तक पास हुए बीटेक छात्रों में प्लेसमेंट का आंकड़ा सत्र 2007-08 में 493/680, सत्र 2008-09 में 406/739, सत्र 2009-10 में 468/739, सत्र 2010-11 में 526/739, तथा सत्र 2011-12 में 462/717 रहा.
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नौकरियां घटीं, पैकेज भी कम हुआ
बीआइटी सिंदरी इंजीनियरिंग कॉलेज में पिछले पांच सालों से प्लेसमेंट इंचार्ज के पद पर कार्यरत डाॅ घनश्याम का कहना है कि पहले आइटी कंपनियां लगातार हर राज्य के कॉलेजों से छात्रों को नौकरियां दे रही थीं, लेकिन अब इन नौकरियों में 30-40 फीसदी तक कमी आ गयी है.
इतना ही नहीं, नौकरी कम होने के साथ ही औसत वेतन पैकेज में भी कमी आ रही है और इस पैकेज की स्थिरता में 30 फीसदी तक गिरावट देखी गयी है. अब उम्मीदवारों का सालाना वेतन पैकेज भी 3-4.2 लाख रुपये से गिरकर 1.5-2.8 लाख रुपये पर आ गया है.
डाॅ घनश्याम कहते हैं कि यह केवल बीआइटी सिंदरी की ही बात नहीं है, देश-प्रदेश में बीटेक में पढ़ने वाले लाखों छात्रों के सपनों की हकीकत यही है. देश में इंजीनियरिंग कराने वाले इंस्टीट्यूट तो लाखों में हैं लेकिन जॉब देने में पीछे हैं.
उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) के आंकड़ों के अनुसार सत्र 2012-13 से सत्र 15-16 तक पास हुए बीटेक छात्रों में से आधों को कॉलेजों से कोई प्लेसमेंट नहीं मिला. बीते छह वर्षों में इंजीनियरिंग की कई ब्रांच और कॉलेज बंद हो चुके हैं.
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आधी से ज्यादा सीटें रह जाती हैं खाली
वहीं बीआइटी के प्रोफेसर उपेन्द्र प्रसाद का मानना है कि बीआइटी को छोड़कर झारखंड के स्टूडेंट्स अपने राज्य के ही इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला नहीं लेते. राज्य के 16 इंजीनियरिंग कॉलेजों में 6,870 सीटें हैं, जिसमें से मुश्किल से आधी भी नहीं भर पातीं. परीक्षा में चयन होने के बाद भी स्टूडेंट्स यहां के कॉलेजों में दाखिला लेने के बजाय दूसरे राज्य के कॉलेजों में एडमिशन लेते हैं.
अच्छे शिक्षकों की भारी कमी : पूर्व निदेशक
बीआइटी के पूर्व निदेशक प्रो एसके सिंह का कहना है कि सरकारी कॉलेज में भी अच्छे शिक्षक नहीं हैं, बीआइटी भी इससे अछूता नहीं है. राज्य के कई इंजीनियरिंग काॅलेज बिना निदेशक और विभागाध्यक्ष के चल रहे हैं. जो विभागाध्यक्ष हैं, वे पीएचडी नहीं हैं. क्लास में पढ़ाने जाते हैं तो लड़के उनका मजाक उड़ाते हैं. वे बच्चों को क्लास में मैनेज नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें पढ़ाना नहीं आता.
शिक्षक और छात्र का अनुपात तो दूर की बात है. 20 स्टूडेंट्स पर एक शिक्षक होना चाहिए, लेकिन किसी भी कॉलेज में यह अनुपात मेंटेन नहीं है. हर विभाग में एक प्रोफेसर, दो एसोसिएट प्रोफेसर और 6 असिस्टेंट प्रोफेसर होने चाहिए, लेकिन कोई ऐसा कॉलेज नहीं है, जहां पर इस गाइडलाइन को माना जाता है. जिन इंजीनियरिंग पासआउट छात्रों को कोई नौकरी नहीं मिलती, वह इन कॉलेजों में शिक्षक बन जाते हैं. पढ़ने-पढ़ाने से उसका कोई नाता नहीं होता। इस वजह से इन कॉलेजों के छात्र को जाॅब प्लेसमेंट नहीं मिल रहे हैं.
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बीआइटी सिंदरी : प्लेसमेंट रेकार्ड सत्र 2007 से 2019 तक
| 2007-08 | 493/680 |
| 2008-09 | 406/739 |
| 2009-10 | 468/739 |
| 2010-11 | 526/739 |
| 2011-12 | 462/717 |
| 2012-13 | 361/725 |
| 2013-14 | 320/725 |
| 2014-15 | 304/725 |
| 2015-16 | 315/725 |
| 2016-17 | 266/725 |
| 2017-18 | 273/725 |
| 2018-19 | 214/725 अब तक |
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