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मेनहर्ट घोटालाः कैसे ल्यूब्रिकेंट माना जाने वाला भ्रष्टाचार व्यवस्था का इंजन बन गया, जानिये पहली चार गलतियां

Saryu Roy

 2000 रांची झारखंड की राजधानी बनी. लेकिन राजधानी जैसी कोई बात रांची के पास उस वक्त नहीं थी. बरसात के दिनों में रांची की सड़कें तालाब हो जाया करती थीं. कमोबेश आज भी यही स्थिति है. लिहाजा 2003 में रांची हाईकोर्ट ने रांची की सिवरेज ड्रेनेज दुरुस्त करने का आदेश निकाला. तीन साल की अबोध राजधानी रांची की नालियों को दुरुस्त कर राजधानी लायक काबिल बनाना था. काम शुरू हुआ ही था कि सरकार बदल गयी. 2006 में रघुवर दास, अर्जुन मुंडा की सरकार में उप मुख्यमंत्री औऱ नगर विकास मंत्री थे. रांची शहर में सिवरेज और ड्रेनेज को लेकर काम होना था. विभाग ने इस काम के लिए ORG/SPAM Private Limited का चयन किया. कंपनी ने काम शुरू कर दिया. करीब 75 फीसदी डीपीआर बनने के बाद कंपनी से काम वापस ले लिया गया और काम मैनहर्ट कंपनी को दे दिया गया. पूर्व मंत्री सरयू राय शुरू से ही मैनहर्ट को काम दिए जाने पर ऐतराज जता रहे हैं. वो पूरे मामले को एक घोटाला साबित कर चुके हैं. लेकिन किसी सरकार की तरफ से मैनहर्ट मामले की जांच सही तरीके से नहीं हुई. अब सरयू राय ने पूरे मामले पर एक किताब लिखी है. न्यूज विंग पूरे किताब को किस्त दर किस्त छापने जा रहा है. इस सिरीज की यह पहली किस्त है.

 

विकास कार्यों में भ्रष्टाचार की अनगिनत कहानियां हैं.

लाभ, लोभ और असुरक्षा मानव प्रवृति की जड़ में है. आम धारणा है कि समाज ने इसे काफी हद तक स्वीकार कर लिया है. माना जाने लगा है कि शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार होना कोई अनहोनी नहीं है. यह एक आम घटना है. जो अक्सर हमारे आसपास घटती रहती है. अवसर मिला तो खाकपति देखते-देखते लाखपति बन जाता है. उसके घर-परिवार की, उसके रिश्तेदारों-नातेदारो की, लगुओं-भगुओं की कारस्तानियां मुंह चिढ़ाती रहती हैं. एक धारणा पैर पसारने लगी है कि व्यवस्था की इस प्रक्रिया में जिसका समायोजन नहीं हो पाता है, जो किसी न किसी कारण विक्षुब्ध हो जाता है, जिसे भ्रष्टाचार करने का अवसर हाथ नहीं लगता, वही इसका विरोध करता है. इसे उजागर करने की मुहिम से जुड़ता है, इसका भंडाफोड़ करने के लिए कोई न कोई जुगत लगाता है.

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आम मानसिकता हो गई है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं. जिसे अवसर नहीं मिलता है वह विरोध का स्वर उठाता है. विकास कार्यों में भ्रष्टाचार के बहते जलस्रोत में हाथ धो लेने की होड़ में हर कोई लगा हुआ है. एक अन्य धारणा भी घर करती जा रही है कि भ्रष्टाचार के विरोध से कुछ होता-जाता नहीं है. भ्रष्टाचारी प्रभाव वाला है तो उसका कुछ बिगड़ता नहीं. उल्टे विरोध करने वाला ही प्रताड़ित होता है. ऐसा भ्रष्टाचारी सीना तान कर चलता है. अपने समाज में प्रतिष्ठा पाता है. उसके समर्थन में एक दबाव समूह खड़ा हो जाता है. इसलिए भलाई इसी में है कि चुपचाप रहो. समय का इंतजार करो. इनके सामने घुटने टेक दो. या इनसे आंखें फेर लो या इनका कुकर्म उजागर होने के अवसर का इंतजार करो. इसके लिए मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ता जैसा कोई अप्रत्यक्ष माध्यम ढूंढो.

भ्रष्टाचार के अधिकांश मामले आजकल इन्हीं माध्यमों से सामने आ रहे हैं. भ्रष्टाचार के बारे में एक राय यह भी है कि यह विकास के इंजन में ग्रीस-मोबिल जैसा काम करता है. यह ग्रीस -मोबिल विकास के इंजन का स्वास्थ्य ठीक रखता है. प्रगति के पहिया को बिना अवरोध गतिशील रखता है. अधोसंरचना निर्माण में लगे सरकार के कार्य विभागों में पहले इसे एक दस्तूर के रूप में लिया जाता था. कनीय अभियंता से बड़ा बाबू, कैशियर और अभियंता प्रमुख से विभाग/ निदेशालय प्रमुख तक की इसमें यथायोग्य हिस्सेदारी निर्धारित रहती थी. कार्य को गतिशील रखने के लिए यह व्यवस्था अभिमंत्रण के स्तर तक सीमित थी. सरकार के सचिवालय-मंत्रालय आम तौर पर इसकी परिधि से दूर रहते थे. इसे ‘दाल में नमक’ की या कार्य व्यवस्था में ‘ल्युब्रिकेंट’ की संज्ञा दी जाती थी.

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कालांतर में इसका स्वरूप बदलता गया. सचिवालय-मंत्रालय भी इसमें डुबकी लगाने लगे. इसमें हस्तक्षेप करने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करने लगे. फिर ऐसा समय आया कि कार्य व्यवस्था में ल्युब्रिकेंट माना जानेवाला भ्रष्टाचार ही व्यवस्था का इंजन बन गया. परियोजनाओं के प्राक्कलन के समय ही इसका प्रावधान किया जाने लगा. राज्य की समृद्धि बढ़ी तो समय के साथ उर्वर मेधावी मस्तिष्कों ने इसके अलग स्वरूप की रचना कर डाली. बड़ी विकास परियोजनायें परामर्शियों के हवाले की जाने लगीं. सरकारी तंत्र कूपमंडूक माना जाने लगा. परामर्शियों को वैश्विक दृष्टिकोण के ज्ञाता की संज्ञा मिल गई. परियोजनाओं का विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन बनाने का काम परामर्शियों के हवाले हो गया. विभाग का योगदान नियमानुसार इनके कामों पर स्वीकृति की मुहर लगाने भर तक सीमित हो गया.

परियोजना बड़ी है तो सरकार परियोजना प्रतिवेदन तैयार करने के लिए बड़ा परामर्शी नियुक्त करेगी ही करेगी. चयन के उपरांत परामर्शी ही निविदा प्रपत्र तैयार करेगा. उस आधार पर संवेदक नियुक्त होंगे. कार्य आरम्भ होने पर परामर्शी उसका पर्यवेक्षण करेगा. विभाग प्रमुखों का काम परामर्शियों और संवेदकों द्वारा समय-समय पर जमा किये जाने वाले विपत्रों की समीक्षा करने, इन्हें स्वीकृत करने और इनका भुगतान सुनिश्चित करने तक ही सिमट गया है.

सम्प्रति हमारे महत्वाकांक्षी कहे जाने वाले विकास कार्य ‘‘समय‘‘ की इसी पटरी पर चल रहे हैं. भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘‘सबहीं नचावत राम गोसाईं‘‘ की पटकथा के पात्रों की तरह हम सब इसमें डूब-उतरा रहे हैं.  स्वनिर्धारित, परनिर्धारित या परिस्थितिजन्य अपनी भूमिकायें निभा रहे हैं. भ्रष्टाचार का यह स्वरूप अब ‘‘इंजन में ग्रीस-मोबिल या दाल में नमक‘‘ की सीमा में नहीं रहा. लक्ष्मण रेखा लांघकर यह लाभ-लोभ के निहित स्वार्थ का भागीदार हो गया है. सत्ता शीर्ष से नियंत्रित भ्रष्टाचार का यह स्वरूप सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान के दंभ में विस्तार पाते जा रहा है. इसकी व्याप्ति अंतरराष्ट्रीय हो गयी है.

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विश्व बैंक निर्धारित विशिष्टियों और वैश्विक निविदा के आधार पर विश्वविख्यात बाह्य ताकतें विकास के अखाड़े में अपने स्थानीय सहयोगियों का साथ लेकर ताकत आजमाने लगी हैं. शीर्ष को प्रभावित कर अपना दबदबा कायम करना इनकी मुख्य रणनीति बन गई है. साम-दाम, दंड-भेद की राजनीति अपनाकर इन्होंने शासन के सभी अंगों को अपने पाश में जकड़ लिया है. नियम-कानून में मनमाना परिवर्तन कराना, नीतियों में मनोनुकूल बदलाव कराना, वित्तीय नियमावली की प्रासंगिक धाराओं को शिथिल कराना इनके बांयें हाथ का खेल हो गया है. चोरी भी और सीनाजोरी भी. इनका घोष वाक्य बन गया है. ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ है या नहीं हो रहा है. देश में सतर्कता आयोग, लोकपाल का प्रावधान किया गया है.

राज्य में लोकायुक्त, निगरानी ब्यूरो का गठन हुआ है. राष्ट्र और प्रदेश के स्तर पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम बना हुआ है. निगरानी ब्यूरो, सीबीआई, ईडी जैसे अनेक सरकारी संगठन सक्रिय हैं. अनेक स्वयंसेवी समूह, गैर सरकारी संगठन भ्रष्टाचार के विरोध में काम कर रहे हैं. सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारियां लेकर ये लोग जनहित याचिका के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से भ्रष्ट आचरण करने वालों पर प्रहार कर रहे हैं. इस प्रयास के कारण कई संगीन घोटालों के पर्दाफाश हुए हैं. कई भ्रष्टाचारी दंडित भी हुए.  वे जेल की सलाखों तक पहुंचे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रांसपैरेन्सी इंटरनेशनल संस्था इस समस्या के खिलाफ लगातार लगी हुई है. पर ‘‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की‘‘ की तरह भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. आखिर क्यों? क्या कारण है.

ऐसा नहीं कि सत्ता के गलियारों में सक्रिय नवीन व्यवस्था के किरदारों में सबके सब भ्रष्ट एवं अविवेकी हैं. आज भी यहां खुलकर खेलनेवालों की संख्या सीमित है. उनका बहुमत नहीं हैं. पर कार्यस्थल पर प्रभाव पूरा है. कहा जाता है और सही कहा जाता है कि समस्या दुर्जन शक्तियों की सक्रियता के कारण नहीं बल्कि सज्जन शक्तियों की शिथिलता के कारण घनीभूत होती है. प्रशासनिक ढांचा में व्याप्त असुरक्षाजनित भय के कारण ये किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती हैं. स्थानांतरण-पदस्थापन की पीड़ा और सेवा की असुरक्षा का भय इनकी सबसे कमजोर नस है.

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 जिसके कारण ये या तो दुर्जन शक्तियों के सहयोगी हो जाते हैं या चुप्पी साध लेते हैं. इनमें कुछ तो ‘चुपचाप, भ्रष्टाचारी साफ होने की परिस्थिति आने की प्रतीक्षा में अपनी परोक्ष भूमिका तलाश लेते हैं. पर अधिकांश लकीर का फकीर होकर कारवां से जुड़े रहने में ही भलाई समझते हैं. जो हो रहा है उसे मान लेने की मानसिकता बना लेते हैं. इससे भ्रष्टाचार पोषित व्यवस्था का हौसला बढ़ता है. वह मदमस्त हो जाती है.  बेपरवाह हो जाती है. नियम कानून को ठेंगा दिखाने लगती है. यह सब तभी मुमकिन होता है जब भ्रष्ट आचरण को उपर वाले की सरपरस्ती हासिल रहती है. ऊपर से नीचे तक एक श्रृंखला बन जाती है. जिसकी कड़ियां भ्रष्ट आचरण का प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन करने में ही अपनी शान समझती हैं.

व्यवस्था के इस स्वरूप ने ऊपर से नीचे तक छोटे से बड़ों का मकड़जाल बना लिया है. बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह की तरह छुटभैयों की कारस्तानियां परवान चढ़ने लगी हैं. ऐसी स्थिति में जनहित इसका सबसे बड़ा शिकार बन गया है. आमजन तक सेवा सुविधा पहुंचानेवाला तंत्र शासन प्रणाली के मूल उद्देश्य से भटक गया है. हर सेवा-सुविधा वास्तविक लाभुक व्यक्ति-समूह-समाज-स्थान तक पहुंचने के लिए अवैध सेवा शुल्क का मोहताज हो गई है. इन्हें आमजन तक पहुंचाने के लिए पदस्थापित व्यक्ति मोल-तोल करने वाला किरदार बन गया है. समाज या विकास की अंतिम सीढ़ी पर बैठा व्यक्ति बिना कुछ लिए-दिये अपना सामान्य हक पाने का भरोसा खोने लगा है.

यही दस्तूर बन गया है. दस्तूरी मनमर्जी बन गई है. ऐसी स्थिति में इसके विरोध में स्वर उठाने वाला व्यवस्था का दुश्मन करार दिया जाता है. जनहित का प्रतीक आम आदमी सरकारी तंत्र और समाज के बिचौलियों की सांठगांठ के बीच पिसने के लिए मजबूर हो जाता है. संविधान की धाराओं पर आधारित ‘हक’ आमजन को दिलानेवाले नागरिक चार्टर एवं अन्य प्रावधान दिखावा की वस्तु बनकर रह जाते हैं. शीर्ष पर बैठी भ्रष्ट व्यवस्था के नाक-कान बने ये निहित स्वार्थी तत्व जनता की छाती पर मूंग दलने की भूमिका में अक्सर दिखते रहते हैं. ये भय और भ्रष्टाचार का संयुक्त उपक्रम कायम कर लेते है.

मुर्गी और अंडे की तरह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि इनमें कौन किसका जनक है, किसका अस्तित्व किससे है? इसमें से उत्पन्न जनता की हताशा शीर्ष पर काबिज भ्रष्ट व्यवस्था की स्वाभाविक परिणति के रूप में सामने आती है. हम, आप, ये, वो सभी इसमें अपनी भूमिका स्थापित करने में लग जाते हैं. फिर इस बीच से ही कोई खड़ा होता है जो खतरा मोल लेता है. और भ्रष्ट व्यवस्था के विनाश का बीज बनता है. तमाम संकटों के बीच यह भरोसा बना रहे, इसका प्रयत्न सज्जन शक्तियां करें तो घोर अंधकार के बीच प्रकाश की यह किरण ही परिवर्तन का आधार बन सकती है.

इस मनोभाव को धारण करने वाला ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ समय आने पर लौ को मशाल बना देता है. कंगूरे ढहते हैं तो परपीड़क की भूमिका निभाने वाले छुटभैये खुद-ब-खुद काल के गाल में समा जाते हैं. समय का तकाजा है कि यह विश्वास बना रहे. अक्सर सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार है क्या? भ्रष्ट आचरण की परिभाषा क्या है? गुणी जनों ने इस प्रश्न के भिन्न-भिन्न उत्तर दिए हैं. भ्रष्टाचार को विविध प्रकार से परिभाषित किया है. इन्होंने इसके सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, परिस्थितजन्य प्रकारों का विश्लेषण किया है. इसके उर्ध्व, क्षैतिज, अधोगामी प्रभावों का भी विश्लेषण किया है. भ्रष्टाचार के बारे में कहा गया है कि यह योग्यता की बलि चढ़ाता है. अयोग्य को प्रोत्साहित करता है. सही के स्थान पर गलत को प्रश्रय देता है. स्वाभिमानी मेधा इसका पहला शिकार बनती है.

संसाधनों को अपनी कुंडली में समेट लेता है. आर्थिक-सामाजिक विषमता बढ़ाता है. परियोजना कार्यों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है. व्यवस्था की नींव में दीमक का काम करता है. प्रतिस्पर्धात्मक चयन के स्थान पर मनोनुकूल मनोनयन को प्राथमिकता देता है. भ्रष्टाचार परपीड़क प्रवृति का पोषक है. समाज जीवन की नींव को खोखला बना देता है. भोग-विलास की संस्कृति के लिए उर्वरक का काम करता है. असामाजिक प्रवृति के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है. सामाजिक-सांस्कृतिक तानाबाना को छिन्न-भिन्न कर देता है. घर-परिवार, अड़ोस-पड़ोस में प्रतिस्पर्धी लोलुपता का माहौल बना देता है. यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दुश्मन है. इससे मनमानी को बढ़ावा मिलता है. सामूहिकता समाप्त होती है. काला धन का जनक इसकी स्वाभाविक परिणति है. यह समान्तर अर्थव्यवस्था का जनक है. इससे एकाधिकार पनपता है. इसके पूर्ण परिमाण का आकलन कठिन है. आदि, आदि.

यह सब सही है, परंतु मुझे लगता है कि सामाजिक-राजनीतिक-शासकीय जीवन में शीर्ष पर आसीन व्यक्तियों के भ्रष्टाचार का संबंध दायित्व निर्वाह में होने वाली गलतियों को देखने-परखने के दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है. काम करते समय गलतियां होना स्वाभाविक है. परंतु जब गलती का पता चल गया, किसी ने गलती की ओर इशारा कर दिया, तब गलती या गलतियों को सुधार लेने से, इनका परिमार्जन कर लेने से भ्रष्टाचार पनपने के संभावना की भ्रूण हत्या हो जाती है. वह आकार ग्रहण करने के पहले ही समाप्त हो जाता है.

परंतु गलती का पता चल जाने पर, इसका संकेत मिल जाने पर, गलती करने वाला इसे सुधारने में रूचि नहीं लेता, बार बार बताये जाने पर भी इससे विमुख नहीं होता तो इसका मतलब है कि वह गलतियां जानबूझकर कर रहा है. योजनानुसार कर रहा है.  निहित स्वार्थवश कर रहा है. बाह्य शक्तियों के प्रभाव में कर रहा है. तब वह भ्रष्टाचार कर रहा है. बार-बार याद दिलाने के बाद भी वह रुकता नहीं है. गलतियां करता जाता है तो इसका मतलब है कि वह आदतन भ्रष्टाचार करता जाता है. एक गलती पर परदा डालने के लिए उससे भी बड़ी गलती यानी बड़ा भ्रष्टाचार करने लगता है तो उसका यह भ्रष्टाचार घोटाला में परिवर्तित हो जाता है.

भ्रष्टाचार की यह परिभाषा और पैमाना मुझे उपयुक्त लगती है. गलती की जानकारी हो जाने पर उसे सुधार लेना भ्रष्टाचार पनपने की संभावना को शून्य कर देना है. गलती का पता चलने के बाद भी उसे छुपाने के लिए गलती पर गलती करते जाना ही भ्रष्टाचार करना है. भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है. पहले एक छोटी गलती होती है, फिर छोटी गलती को छुपाने के लिए बड़ी गलतियां होती हैं. और एक बार मुंह को खून का चस्का लग गया तो ये गलतियां आदत बन जाती हैं. फिर सुनियोजित और संस्थात्मक भ्रष्टाचार का रूप ले लेती हैं. ये घोटालों की जड़ बन जाती हैं. जिस विषय को इस पुस्तक का केन्द्र बिन्दु बनाया गया है, उसे भी भ्रष्टाचार की इस कसौटी पर कसें तो उसका आरम्भ भी एक छोटी सी गलती से उपजा भ्रष्टाचार है, जो कालांतर में घोटाला बन गया.

सम्पूर्ण शासन व्यवस्था इस भ्रष्टाचार पर परदा डालने में जुट गई. रांची शहर के लिए सिवरेज-ड्रेनेज की सुदृढ़ व्यवस्था करने के लिए माननीय उच्च न्यायालय का 2003 में एक आदेश हुआ. तत्कालीन सरकार ने इसके लिए खुली निविदा के आधार पर दो परामर्शियों का चयन किया. इनका काम पूरा होने की कगार पर था कि चुनावोंपरांत राज्य की सरकार बदल गई. नगर विकास विभाग के मंत्री भी बदल गये. उन्होंने, बिना कारण बताये, एग्रीमेंट की शर्तों की परवाह किये बिना इन परामर्शियों के काम पर रोक लगा दी. इन्हें हटा दिया. इनके स्थान पर नया परामर्शी बहाल करने के लिए वैश्विक निविदा प्रकाशित हुई. बेवजह विश्व बैंक की गुणवत्ता आधारित प्रणाली को निविदा प्रकाशन और मूल्यांकन का आधार बनाया.

निविदा खुली तो मूल्यांकनकर्ताओं ने पाया कि कोई भी निविदादाता निविदा की शर्तों पर योग्य नहीं पाया गया है. मूल्यांकनकर्ताओं ने इस निविदा को रद्द कर और निविदा शर्तों को बदलकर ‘गुणवत्ता और लागत आधारित’ प्रचलित प्रणाली के आधार पर नई निविदा प्रकाशित करने का परामर्श दिया. तत्कालीन नगर विकास मंत्री जी ने यह परामर्श नहीं माना. शर्तों में बदलाव कर इसी निविदा के आधार पर परामर्शी चयन हेतु मूल्यांकन करने का दबाव डाला. ऐसा करना नियम विरुद्ध था. पर सरकारी अधिकारी इस दबाव के आगे झुक गये. इस प्रकरण में यह पहली गलती थी. शर्तों में बदलाव कर निविदा का मूल्यांकन आरंभ हुआ. शर्तों में बदलाव के बावजूद जो योग्य नहीं ठहर रहा था, उसे योग्यता के मूल्यांकन में योग्य करार दिया गया. तकनीकी मूल्यांकन में पक्षपात कर उसे सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया गया.

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फिर वित्तीय मूल्यांकन में मंत्री स्तर तक निगोशिएशन कर अधिक वित्तीय लागत पर उसे कार्यादेश दे दिया गया. मंत्रिपरिषद् ने भी इस पर मुहर लगा दी. यह दूसरी गलती थी. इसके अगले दिन विधानसभा में अनियमितता का यह सवाल उठा. तीन दिन तक विधानसभा बाधित होती रही. सरकार के सामने एक अवसर था कि पूरी प्रक्रिया पर पुनर्विचार कर गलती स्वीकार कर ले. पर नगर विकास विभाग के मंत्री श्री रघुवर दास ने ताल ठोंककर विधान सभा में घोषणा की. सांच को आंच क्या? हम किसी भी जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं. यह तीसरी गलती थी.

जान-बूझकर गलत को सही ठहराने का दुस्साहस था, दंभ था. विधानसभा अध्यक्ष ने जांच के लिए विधानसभा की विशेष जांच समिति का गठन कर दिया. इस जांच समिति को नगर विकास विभाग ने सहयोग नहीं किया. जांच सिमित को प्रभावित किया. समिति के सामने गुमराह करने वाला विवरण प्रस्तुत किया. इस कारण जांच समिति विषय वस्तु की गहराई में जाकर जांच नहीं कर सकी. और सतही प्रतिवेदन देकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. अपनी साख बचाने के लिए, बला टालने के लिए एक शर्त लगाकर जांच प्रतिवेदन दे दिया कि विषय के कतिपय तकनीकी बिन्दुओं की जांच कराकर सरकार आगे की कार्रवाई कर सकती है. गलती छुपाने के लिए समिति को गुमराह करना, समिति के सामने झूठा विवरण प्रस्तुत करना यह चौथी गलती थी.

(लेखक राज्य के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी है. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है)

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7 Comments

  1. मैं हर समय आपके साथ हूँ।क्योंकि आपने पूरे झारखंड को लूटने वाले लोगों पर जाँच की मांग कर पूरा सबूत के साथ विवरण प्रस्तुत किया है।

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