Opinion

संयुक्त राष्ट्र संघ : जरूरत मुकम्मल बदलाव की है

क्या कोरोना वायरस संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार का कारक बन सकता है?

Faisal Anurag

क्या कोरोना वायरस दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के बाद बने संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार का कारक बन सकेगा? खास कर उस हालत में जब दुनिया एक तरफ कोविड 19 की महामारी की गिरफ्त में डरी सहमी है. और दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था खास्ताहाल है. और उसमें सुधार लाने के उपक्रम विफल ही साबित हो रहे हैं. एक नयी परिघटना यह है कि 1990 के बाद जिस विश्व सहयोग और मुक्त बाजार की जीत का दावा जोरशोर से किया जा रहा था, वह संकीर्ण राष्ट्रवाद का शिकार होता नजर आ रहा है.

और दुनिया के नेतृत्व पर लिबरल ताकतें कमजोर हो रही हैं. ज्यादातर देश अपने हितों में सिमटते जा रहे हैं. और विश्व एक बड़े टकराव की तरफ बढ़ता दिख रहा है. कोरोना वायरस छह लाख से ज्यादा लोगों की मौत का कारण बन चुका है. और विकसित देशों सहित लगभग सभी देशों की स्वस्थ्य सेवाएं बेपर्दा हो चुकी हैं. दुनिया में चुनावी जीत के लिए तमाम तरह के अलोकतांत्रिक तौर तरीकों को अपनाया जा रहा है. असहमत विचारों को बर्बरता के साथ कुचला जा रहा है.

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इन हालातों में भारत के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक सामाजिक परिषद को संबोधित करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में यूएनओ की भूमिका और प्रासंगिकता पर सुधार करते हुए इसमें सुधार लाया जाये. इसके पहले भी मोदी सहित दुनिया के अनेक देश यूएनओ की बड़ी और कारगर भूमिका के लिए परिवर्तन की मांग करते रहे हैं. इसमें ब्राजील,जर्मनी, जापान भी शामिल हैं. इन देशों ने यूएनओ के भीतर एक समूह का गठन भी किया है. जिसमें भारत भी शामिल है. डा मनमोहन सिंह भी अपने कार्यकाल के दौरान सुधार की मांग करते रहे हैं.

इस समय दुनिया एक बड़े वैश्विक नेतृत्व के संकट से गुजर रही है. यूएनओ के प्रमुख अंतोनियो गुटरेस ने कुछ महीने पहले ही कहा था कि इस समय दुनिया को नेतृत्व देनेवाले नेताओं का अभाव है. जिन नेताओं में यह क्षमता है या तो वे छोटे देशों के हैं या फिर आर्थिेक रूप से कमजोर हैं. गुटरेस के इस बयान को दुनिया ने गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन कोविड 19 से निपटने में वैश्किव नेतृत्व का संकट सबसे ज्यादा महसूस किया गया. इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि माहामरी ने ज्यादातर देशों को आत्म संरक्षणवादी बना दिया है. और दूसरों की तकलीफों से बेखबर भी. क्यूबा जैसे छोटे से देश को छोड़ कर कोई भी देश दूसरों की मदद में खुल कर नहीं आया. जिन देशों ने बड़े-बड़े दावे किये उनकी हालत तो यह है कि वे अपने ही देश में मरीजों की तकलीफों को कम नहीं कर पाये. और कोरोना वायरस से उपजे आर्थिक विवशता को कम करने में कारगर साबित नहीं हुए.

जर्मनी जैसे कुछ ही अन्य देश हैं जिन्होंने अपने नागरिकों का पूरा ध्यान रखा है. और कोविड 19 के विस्तार को भी नियंत्रित करने में कम समय लगाया है. इसमें न्यूजीलैंड की सराहना पूरी दुनिया कर रही है. जहां कि महिला प्रधानमंत्री जसिंडा अर्डेन का नाम सम्मान से लिया जा रहा है. महामारी के समय जिस साहस और कल्पनाशीलता का परिचय उन्होंने दिया वह बेमिसाल है. इसके पहले एक आतंकी हमले में भी उनकी भूमिका लोगों का भरोसा जीतने और देश की विविधता को बनाए रखने में की गयी थी. इस श्रेणी में कुछ अन्य छोटे देशों का नाम भी शामिल है. जिसमें वियतनाम सर्वोपरि है.

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दुनिया का यह ऐसा देश है जहां कोरोना वायरस के कारण एक भी व्यक्ति को मरने नहीं दिया गया है. जापान व ताइवान ने भी इस माहारी में बेहतरीन प्रदर्शन किया है. लेकिन इन देशों की विश्व राजनीति में वह भूमिका नहीं है जिसकी बात प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं. पहले विश्वय़ुद्ध के बाद विजेताओं ने लीग आफ नेशन का गठन किया था. लेकिन दुनिया को हड़पने की प्रतियोगिता को लीग नहीं रोक पाया. दूसरे महायुद्ध के बाद यूएनओ अस्तित्व में आया. उसे भी युद्ध विजेता देशों ने अपने हित में बनाया था. हालांकि बाद में इसका विस्तार हुआ. दुनिया में बड़े बदलाव हुए. उपनिवेशों की मुक्ति आंदोलन की बड़ी भूमिका इसमें रही. जवाहर लाल नेहरू के साथ टीटो और नासिर से जिस गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरूआत हुई, उसने दुनिया के वर्चस्ववादी देशों को भी बदलने के लिए बाध्य किया.

बावजूद यह बदलाव अधूरा रहा. क्योंकि आर्थिक तंत्र नहीं बदला. दुनिया में विषमता बढ़ी. और इसने राजनीतिक तौर पर नियंत्रण जैसा हासिल करने का प्रयास किया. यूएनओ के बाद भी शीतयुद्ध के दौर में यह संस्थान बहुत कारगर नहीं रहीय अमेरिकी हितों के अनुकूल कार्य करती रही. इराक युद्ध के समय तो यह साफ हो गया कि दुनिया भले ही परस्पर सहयोग की बात कर रही हो लेकिन यूएनओ अमेरिका के युद्ध थोपने के प्रयासों के समाने बेबस है. अब तो इराक पर हमले की सच्चाई सामने आ चुकी है. और इसने यूरोप के अनेक देशों में राजनीतिक भूचाल भी पैदा किया है. जिसमें अमेरिका के नाटो सहयोगी ब्रिटेन ओर फ्रांस भी शामिल हैं.

एक और बड़ी समस्या यह उठ खडी हूई है कि जिन दक्षिणपंथी नेताओं ने लोगों के वोट पा कर सत्ता पायी है वे लोकतंत्र को अपने अपने देशों में सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं. लोकतंत्र के लिए उठने वाल तमाम आवाजों को कुचल रहे हैं. इन हालातों में यूएनओ लोकतंत्र, शांति और जलवायु संरक्षण के लिए कितना कारगर कदम उठा सकेगा और वैश्विक स्तर पर बढ़ते आर्थिक राजनीतिक विषमता को रोक सकेगा.

यह सवाल इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि आर्थिक तौर पर दुनिया कारपोरेट की गिरफ्त में है. और यही राजनीति को नियंत्रित कर रही है. एक कारगर यूएनओ सुधार इसके बगैर संभव नहीं है कि उन तमाम देशों की इसमें बराबर की भूमिका हो. यह निर्णायक भी हो. यह तभी संभव है जब छोटे देशों के प्राकृतिक संसाधनों की लूट को खत्म किया जाये. और यूएनओ पर ज्यादा आर्थिक सहयोग करने वाले देशों की मंशा को भी दरकिनार किया जाये.

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कोरोना के बाद की दुनिया के बदलने का सारा दारोमदार इस पर निर्भर है कि वैश्विक तौर पर आर्थिक नियंत्रण की जानलेवा होड़ खत्म हो पाती है या नहीं. दुनिया समानतामूलक लोकतंत्र की स्थापना कर पाती है या नहीं. सुरक्षा परिषद में कोफी अन्नान ने बदलाव का जो प्रस्ताव तैयार किया था और जिस पर कुछ सालों से विचार हो रहा है, हो सकता है उसमें मामूली सुधार के साथ मान लिया जाये. लेकिन इससे दुनिया में समानता की न तो उम्मीद बलवती होगी और न ही स्थायी शांति की. जरूरत मुकम्मल बदलाव की है.

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