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भंवर में फंस सकता है महागठबंधन, वामदलों के बाद झामुमो का एक खेमा अकेले मैदान में उतरने का भर रहा दंभ

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Ranchi : भाजपा को शिकस्त देने से पहले ही महागठबंधन भंवर में फंसता जा रहा है. वामदलों के बाद झामुमो का एक खेमा अकेले चुनावी अखाड़े में उतरने का दंभ भर रहा है. हालांकि, पूर्व में महागठबंधन को लेकर हेमंत सोरेन, बाबूलाल मरांडी, डॉ अजय कुमार, लालू यादव और वाम दल भी सहमति जता चुके थे. बाद में महागठबंधन में वाम दलों को साथ लेकर चलने का सवाल पीछे छूट गया है. वाम दलों को गठबंधन में स्थान न मिलने के संकेत के बाद वाम मोर्चा बनाकर लोकसभा चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम करने लगे हैं.

झामुमो के भी अलग होने के संकेत

महागठबंधन का बड़ा किरदार झामुमो भी गठबंधन से अलग होकर अकेले दम पर चुनाव लड़ेगा, ऐसी चर्चा राजनीतिक गलियारों में आम होती जा रही है. इन चर्चाओं का जो आधार सामने आ रहा है, वह कई संकेत दे रहा है. इसमें महागठबंधन को लेकर भाजपा विरोधी दलों की बैठक रांची में होटल बीएनआर चाणक्य में हुई थी, जिसमें झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने भाग नहीं लिया. हांलाकि पार्टी के एक-दो पदाधिकारी इसमें जरूर शामिल हुए. वहीं, दिल्ली में हुई बैठक में झामुमो की ओर से कोई शामिल नहीं हुआ. बैठक में झामुमो की ओर से संदेश भेजा गया कि लोकसभा में पार्टी चार सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, लेकिन विधानसभा में अधिक सीटें पार्टी को मिलनी चहिए, इस बात को भी तय किया जाये. लोकसभा के लिए पार्टी की ओर से दुमका, राजमहल सिटिंग सीट के साथ चाईबासा, गिरिडीह लोकसभा सीट पर दवेदारी की गयी है. वहीं, सूत्रों के मुताबिक महागठबंधन को लेकर दिल्ली में दिसंबर के पहले सप्ताह में होनेवाली बैठक में राज्य में महागठबंधन की रूपरेखा सामने आने की उम्मीद है. लेकिन, अगर इस बैठक में झामुमो के शीर्ष नेता शामिल नहीं होंगे, तो माना जा रहा है झामुमो गठबंधन से दूर हो जायेगा.

कब-कब झामुमो को कितनी सीट मिली और किससे किया था पार्टी ने गठबंधन

13वीं लोकसभा का 1999 में आम चुनाव हुआ. इसमें झामुमो अकेले चुनाव लड़ा था, जिसमें पार्टी किसी भी सीट पर चुनाव नहीं जीत सकी और 13वीं लोकसभा में झामुमो का सफाया हो गया. इसके बाद झामुमो ने यूपीए गठबंधन के साथ 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा, जिसमें भाजपा को मुंह की खानी पड़ी और एक सीट से ही संतोष करना पड़ा. वहीं, झामुमो चार सीटों पर चुनाव जीता. इसमें राजमहल, दुमका, गिरिडीह और जमशेदपुर की सीटें थीं. 15वीं लोकसभा के लिए चुनाव 2009 में हुए. झामुमो ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, लेकिन कई सीटों पर झामुमो और कांग्रेस ने गठबंधन के बाद भी एक-दूसरे के विरोध में उम्मीदवार उतार दिये थे. झामुमो को दो सीट पर जीत मिली, जिसमें दुमका और पलामू की सीट थी. वहीं कांग्रेस को एक सीट ही हाथ लगी. 2014 के आम चुनाव में भी झामुमो और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़े. इसमें झामुमो सिर्फ राजमहल और दुमका की सीट बचा पाया. मोदी लहर में भाजपा ने 12 सीट पर सफलता पायी.

झामुमो कर रहा है परिस्थिति का आकलन

झामुमो के सूत्रों के मुताबिक, पार्टी पूर्व में हुए गठबंधन का विश्लेषण कर रही है. साथ ही, नफा-नुकसान का भी आकलन किया जा रहा है. वहीं, पार्टी झारखंड नामधारी दलों से होनेवाली भविष्य की चुनौती का भी आकलन कर रही है, जिसमें बाबूलाल मरांडी का झारखंड विकास मोर्चा रोड़ा नजर आ रहा है. इस आधार पर पार्टी के कुछ बड़े पदाधिकारी महागठबंधन के विरोध में तर्क रख रहे हैं.

झामुमो का एक खेमा नहीं चाहता गठबंधन में शामिल हो पार्टी

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी को लोकसभा चुनाव से ज्यादा विधानसभा चुनाव में जोर देने की बात की जा रही है. इसके लिए पार्टी के वरीय पदाधिकारी अकेले चुनाव लड़ने का माहौल बना रहे हैं. क्योंकि, लोकसभा चुनाव में अधिक सीटों पर उम्मीदवार देकर विधानसभा में पार्टी मजबूत स्थिति में होगी. अगर गठबंधन में झामुमो शामिल हो जाता है, तो पार्टी के कार्यकर्ता दूसरे दलों में भी भाग सकते हैं. इससे बचने के लिए अकेले चुनाव लड़ने को बेहतर माना जा रहा है. झामुमो के नेता बाबूलाल मरांडी को बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं. साथ ही, झामुमो के कई नेता लोकसभा चुनाव लड़ना चहते हैं. वे भी नहीं चाह रहे हैं कि झामुमो गठबंधन करे. वहीं, सूत्रों के अनुसार झामुमो का एक मजबूत खेमा, जिसका प्रभाव कार्यकरी अध्यक्ष हेंमत सोरने पर है, वह खेमा नहीं चहता कि महागठबंधन हो और वह खेमा भाजपा के संपर्क में भी है.

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