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मेयर आशा लकड़ा ने सीएम को लिखा पत्र, महाधिवक्ता के मंतव्य से बढ़ सकता है भ्रष्टाचार

Ranchi: रांची की मेयर का नगर निकाय के अधिकारियों के साथ विवाद कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है. अब संयुक्त सचिव द्वारा महाधिवक्ता के मंतव्य का नगर निकायों को पालन करने का मामला भी गरमा गया है. ऐसे में मेयर डॉ आशा लकड़ा ने सीएम हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है. जिसमें उन्होंने कहा है कि नगर निकायों में महाधिवक्ता के मंतव्य को हथियार की तरह इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिए जाने की संभावना है.

साथ ही उन्होंने लिखा है कि महाधिवक्ता ने झारखंड नगरपालिका अधिनियम-2011 की धारा-74,75,76 समेत अन्य धाराओं को जिस प्रकार से परिभाषित किया है, उससे संविधान के तहत नगर निकायों के जनप्रतिनिधियों को प्राप्त शक्तियों को खत्म कर दिया गया है. जिससे साफ है कि कानून को भी तोड़ कर दर्शाया गया है. इसलिए उन्होंने सीएम से इस मामले में अवलोकन कर उचित कार्रवाई करने की मांग की है.

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मेयर शक्तियों को किया धूमिल

उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर धारा 74 सिर्फ सामान्य बैठक के लिए है, लेकिन महाधिवक्ता के मंतव्य में धारा-74 को दो भाग में दर्शाया गया है. एक सामान्य बैठक, दूसरा जरूरत आधारित बैठक. ऐसे में मेयर को दी गई शक्तियों को धूमिल किया गया है. अब नगर विकास विभाग से मिले पत्र व महाधिवक्ता के मंतव्य को अचूक हथियार की तरह इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसकी शुरुआत रांची नगर निगम के नगर आयुक्त मुकेश कुमार ने कर दी है.

जबरन हस्ताक्षर का बना रहे दबाव

25 व 27 मार्च 2021 को निगम परिषद् की बैठक, 19 मार्च 2021 की स्थायी समिति की बैठक में झारखंड नगरपालिका अधिनियम-2011 के विरुद्ध उपस्थापित एजेंडों पर नगर आयुक्त को विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था. लेकिन उक्त बैठक में जानकारी दिए बिना एजेंडो जबरन प्रस्तुत किया गया. वहीं झारखंड नगरपालिका अधिनियम का हवाला दिया गया. अब महाधिवक्ता का मंतव्य आने के बाद अधोहस्ताक्षरी पर जबरन हस्ताक्षर करने का दवाब बनाया जा रहा है. साथ ही कहा कि इस संबंध में महाधिवक्ता ने अधिनियम के विरुद्ध गलत मंतव्य देकर राज्य सरकार को भी गुमराह करने का काम किया है.

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क्या है महाधिवक्ता के मंतव्य में

महाधिवक्ता के मंतव्य के अनुसार मेयर/अध्यक्ष निगम परिषद व स्थायी समिति की बैठक आहुत नहीं करेगा. बैठक की तिथि व एजेंडा नगर आयुक्त ही तय करेंगे. यदि एजेंडा पर मेयर/अध्यक्ष हस्ताक्षर नहीं करेगे तो नगर आयुक्त स्वयं हस्ताक्षर कर उसे प्रेषित करेंगे. भले ही यह एजेंडा झारखंड नगरपालिका अधिनियम के विरुद्ध ही क्यों न हो? मेयर/अध्यक्ष न तो समीक्षा बैठक कर सकते हैं और न ही अधिकारियों को गलत कार्य करने पर स्पष्टीकरण की मांग कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. जिन योजनाओं को परिषद् व स्थायी समिति की बैठक में चुने हुए जनप्रतिनिधियों के माध्यम से स्वीकृति प्रदान की गई हो उन योजनाओं की भी समीक्षा नहीं करनी है.

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