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मैडम शिक्षा मंत्री जी, क्या ऐसी खराब शिक्षा व्यवस्था को ही एडॉप्ट कर रहे हैं दूसरे राज्य !

Sweta kumari

झारखंड की सरकार सूबे में हर स्तर पर विकास के दावे कर रही है. इसका प्रचार भी खूब कर रही है. छह सितंबर को हिन्दी दैनिक अखबार दैनिक भास्कर में शिक्षा मंत्री नीरा यादव का एक बयान छपा है. उन्होंने अपने कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में उठाये गये कदमों की सराहना की है. साथ ही कहा कि दूसरे राज्य भी इसे एडॉप्ट कर रहे हैं. यह बात उन्होंने झारखंड एकेडमिक काउंसिल के ऑडोटोरियम में राज्यस्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह में कही. शिक्षक दिवस के अवसर पर इस समारोह का आयोजन किया गया था. शिक्षा और शैक्षणिक संस्थानों में सुधार हो, इसके लिए उनके स्तर से क्या-क्या कदम उठाये गये, इसका जिक्र उन्होंने अपने संबोधन में नहीं किया है, लेकिन उन्होंने जो महत्वपूर्ण बातें कही हैं, वह निम्न हैं :

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–              प्रत्येक दिन हमारे लिए शिक्षक दिवस के सामान है.

–              मानसिकता में परिवर्तन ही बड़ा बदलाव है.

–              गुरु-शिष्य की परंपरा को कायम करने की आवश्यकता है.

–              उनकी कार्यशैली की तारीफ दिल्ली तक में हो रही है.

–              केंद्रीय मानव संसाधन विकास विभाग की ओर से दूसरे राज्यों को झारखंड की शिक्षा कार्यशैली को अपनाने की सलाह दी गयी.

–              फिर उन्होंने 12 शिक्षकों को पुरस्कृत भी किया. 

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अब हम झारखंड की शिक्षा की स्थिति पर गौर करें, तो मंत्री जी के दावे सही नहीं दिखते. शिक्षा की स्थिति को लेकर जो तथ्य सामने आये हैं, उससे तो यही पता चलता है कि पिछले चार सालों में झारखंड में शिक्षा-व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है. इसका असर मैट्रिक और इंटर के परीक्षा  परिणाम पर पड़ा है. सरकारी आंकड़े ही शिक्षा मंत्री की विफलता को उजागर कर रहे हैं. जब उन्होंने शिक्षा मंत्री का पद संभाला था, यानी वर्ष 2015 में. तब मैट्रिक का रिजल्ट 71.20  प्रतिशत था, जो वर्ष 2018 में घटकर 59.48 प्रतिशत हो गयी. इससे पहले वर्ष 2016 में 67.54 प्रतिशत औऱ वर्ष 2017 में 67.83 प्रतिशत था. साफ है हालात खराब ही होते जा रहे हैं. शिक्षा व्यवस्था की खऱाब स्थिति का असर सिर्फ मैट्रिक परीक्षा के परिणाम पर ही नहीं दिखता है.

इंटर परीक्षा का परिणाम भी शिक्षा मंत्री के दावे को झुठलाता ही नजर आ रहा है. वर्ष 2018 में इंटर का रिजल्ट सिर्फ 48.34 प्रतिशत रहा, जो वर्ष 2015 में 63.88 प्रतिशत था. वर्ष 2016 में 58.36 प्रतिशत और वर्ष 2017 में 52.36 प्रतिशत रहा था.

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इन तथ्यों के आलोक में कोई भी यह कह सकता है कि झारखंड में शिक्षा के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. भलें ही शिक्षा मंत्री कुछ भी दावा कर लें. वर्तमान सरकार में शिक्षा का स्तर सुधरने के बजाय खराब से खराब होते जाने की बड़ी वजह स्कूलों में शिक्षक का ना होना है. करीब 90 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं. लेकिन सरकार को शिक्षकों को नियुक्त करने की कोई जल्दी नहीं है. करीब 20 हजार शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. लेकिन सरकार उन्हें अभी नियुक्ति पत्र नहीं देना चाहती. सरकार शिक्षकों को 15 नवंबर को राज्य स्थापन दिवस समारोह में नियुक्ति पत्र देगी. यानी स्थापना दिवस की शोभा बढ़ाने के लिए शिक्षकों को लगभग तीन माह बाद नियुक्ति पत्र मिलेगी और हाई स्कूल के छात्रों को तीन माह बाद पढ़ाने के लिए शिक्षक मिलेंगे.

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ये तो हुई आंकड़ों की बात, लेकिन क्या सही मायने में राज्य में शिक्षा व्यवस्था सही से चल रही है. क्योंकि एक ओर तो शिक्षा मंत्री व्यवस्था दुरुस्त होने की बात कहकर अपनी पीठ खुद ही थपथपा ले रही हैं. लेकिन दूसरी ओर राज्य के शिक्षक मंत्री से नाराज हैं. वे अपनी मांगों के लिय़े आंदेलन कर रहे हैं. शिक्षक दिवस के दिन ही वित्त रहित हाईस्कूलों और इंटर कॉलेजों को अधिग्रहण करने और घाटानुदान का दर्जा देने के अलाव अन्य मांगों को लेकर राजभवन के सामने हजारों की संख्या में शिक्षकों ने धरना दिया.  इतना ही नहीं जैक की अनुशंसा के बावजूद 99 मदरसाकर्मियों के वेतन का भुगतान नहीं किया गया. ये सभी शिक्षक 18 महीने से भूखे हैं. इसके अलावा इलाज के अभाव में चार शिक्षकों ने दम तोड़ दिया. दोनों खबरें दैनिक भास्कर में उसी पन्ने पर प्रमुखता से छपी है, जिसमें शिक्षा मंत्री का बयान छपा है. दोनों खबरों से तो यही लगता है कि हमारे शिक्षक ना सिर्फ सरकार से नाराज हैं, बल्कि भूख से बिलबिला भी रहे हैं और इलाज के आभाव में मर भी रहे हैं.

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