
Faisal Anurag
महामारी से निपटने की सरकारी क्षमता का अभाव भारत की त्रासदी है. 21वीं सदी में विभिन्न राज्यों में बच्चे जिस तरह अस्पतालों में मर जाते हैं, वह राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों की स्वास्थ्य सेवा, नीति और दक्षता पर गंभीर टिप्पणी है.
बड़ी से बड़ी घटनाओं से सबक नहीं सीखने के बजाए कोशिश यह की जाती है कि घटनाओं को तात्कालिकता में ही देखा जाए. देश हेल्थ रिसर्च में बेहद कमजोर है. इस कारण अनेक छोटी बीमारियां भी मौत का बड़ा कारण बन जाती हैं.
इंसेफ्लाइटिस और निमोनिया जैसी बेहद सामान्य बीमारियां देशभर में हर साल हजारों की संख्या में बच्चों को लील जाती हैं. झूठे आंकडों के जाल से बाहर निकले बगैर रोकथाम के उपलब्ध साधन भी सब तक नहीं पहुंच पाते हैं.
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बिहार में जिस तरह एक्यूट इंसेफ्लाइटिस मात्र दस दिनों में ही 125 बच्चों की मौत का कारण बना है, वह उस राज्य सरकार के लिए शर्म का विषय है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में तेजी से विकास गति का दावा करता है. बिहार सरकार के आंकड़ों में दावा किया जाता है कि राज्य की विकास दर 12 प्रतिशत है.
झारखंड भी इस तरह का ही दावा कर रहा है कि राज्य की विकास दर की गति बेहद तेज है. झारखंड सरकार का तो दावा है कि उसने कुपोषण के मामले में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है, लेकिन जमीनी हकीकत ही रघुवर दास सरकार के दावे को गलत साबित कर देते हैं.
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झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ उन राज्यों में हैं, जहां बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें होती हैं. इन राज्यों में भूख से होने वाली मौतें भी हैं. जिनकी चर्चा को गायब कर देने का सुनियोजित प्रयास किया जाता है. जिन बच्चों की किलकारी से पूरे गांव को हंसना चाहिए था, वहां कुपोषण का भयावह अंधेरा है.
देश में 37 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जबकि इन चारों राज्यों का आंकड़ा 49 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. यानी हर दूसरा बच्चा इन राज्यों में कमजोर है. आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर समूहों के बच्चों के कुपोषण का आंकड़ा तो 50 प्रतिशत की रेखा पार जाता है. इन राज्यों के कुछ खास जिलों के आंकड़े तो बेहद भयावह हकीकत को बयां करते हैं.
बिहार में पिछले एक दशक से अप्रैल से जून के महीनों के मध्य बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होती है. यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि मानवजनित हत्या जैसा मामला है. इन मौतों का मुख्य कारण एक्यूट इंसेफ्लाइटिस है, जिसे स्थानीय बोली में चमकी बुखार कहकर पुकारा जाता है.
मशहूर चिकित्सक डॉ. स्कन्ध गुप्ता के अनुसारस एक्यूट इंसेफ्लाइटिस के कारक अनेक हैं. कुपोषण, विषाणु, कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र मुख्य हैं. लीची रोग की गति को तेज करती है. 2012 और 14 में भी बिहार में चमकी बुखार ने महामारी का रूप ले लिया था. तब भी हर्षधन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री थे और उन्होंने सौ प्रतिशत टीकाकरण और बिहार में चार बड़े अस्पताल बनाने की घोषणा की थी.
लेकिन न तो सौ प्रतिशत टीकाकरण हुआ और न ही इस बीमारी के लिए विशेष अस्पताल अस्तित्व में आये. इस बार फिर वे इसी तरह का वायदा कर वापस गये हैं. बिहार सरकार का दावा है कि उसने ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष आइसीयू का निर्माण किया है. लेकिन यह दावा भी तथ्यों पर सही नहीं है. चिकित्सकों की भारी कमी से बिहार ही नहीं झारखंड भी जूझ रहा है.
इंडिया टुडे की एक पुरानी खबर के अनुसार, 2017 में झारखंड में 800 बच्चों की मौत इंसेफ्लाइटिस और निमोनिया के कारण हो गयी थी. यह सिलसिला 2018 में भी जारी रहा. जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में बड़ी संख्या में बच्चों की मौत का हादसा मात्र दो साल पुरानी बात है. इसके बाद बच्चों के स्वास्थ्य की देखरेख और बीमारियों की रोकथम के बड़े-बड़े दावे झारखंड सरकार ने किये थे.
दो साल बीत जाने के बाद भी झारखंड सरकार के काम नाकाफी हैं. झारखंड का स्वास्थ्य बजट तो बेहद ही कम है. 2019 के बजटीय प्रावधान के अनुसार, मात्र 4.85 प्रतिशत बजटीय राशि ही इसके लिए निर्धारित की गयी है. न तो शोध के लिए प्रावधान है और न ही ग्रामीण स्वस्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने कोई खास कदम उठाया है.
निजी अस्पतालों का जाल बिछाकर सरकारों का अपने दायित्व से भागने का इतिहास नया नहीं है. पिछले पांच सालों में यह प्रवृति इतनी हावी होती जा रही है कि एम्स जैसे संस्थान में निजीकरण की प्रक्रिया के खिलाफ वरीय चिकित्सकों का विरोध सार्वजनिक है.
उस दौर को हम याद कर सकते हैं, जब हैजा हमारे देश में एक ऐसी बीमारी थी, जिसे मौत के साये के रूप में देखा जाता था. भारत ने उस दौर में इसपर काबू पाया जब भारत अपने निर्माण के सबसे कठिन दौर में था. झारखंड में डायरिया, मेनेंजाइटिस, निमोनिया और इंसेफ्लाइटिस का संकट गहराता ही जा रहा है और कैंसर का विस्तार इसे भवायह ही बना रहा है.
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