न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

आर्थिक सुस्ती के खिलाफ मोदी सरकार को उठाने होंगे बड़े कदम

1,308

Faisal Aurag

आर्थिक जंग के आलमी माहौल में भारत के सामने पोलिटिकल इकोनोमी की चुनौतियां गहरी हैं. राजनीतिक तौर पर बड़ी कामयाबी के बाद अब मोदी सरकार को आर्थिक सुस्ती के खिलाफ बड़ा कदम उठाना ही होगा.

चुनाव के पहले और चुनाव प्रक्रिया के दौरान सकल उत्पाद और रोजगार संकट को ले कर जो बातें कही जा रही थी और मोदी सरकार जिन आंकड़ो को छुपा रही थी अब प्रकाश में आ गये हैं.

इन आकड़ों को भारत सरकार ने ही जारी कर बता दिया है कि पिछले पांच सालों में जीडीपी सबसे कम है और हाल के सालों में भारत का जीडीपी चीन के मुकाबले कम है. यह आंकड़ा तब है जब कि जीडीपी के पैमानों को बदला गया है.

इसे भी पढ़ेंः सामाजिक आंदोलन को मिलेगी नयी दिशा या इसे स्थायी पराजय का शिकार होना पड़ा है

यदि 2014 के पहले के मानदंड से देखा जाए तो यह बेहद भयावह आंकड़ा है. भारत के अर्थ जगत का यह विचित्र चमत्कार है कि शेयर मार्केट में भारी उछाल देखा जा रहा है, जबकि आटोमोबइल सेक्टर सहित अनेक सेक्टर में उत्पादन बेहद कम दर्ज किया गया है. भारत का औद्योगिक उत्पादन और कृषि उत्पादन के आंकड़े तो अर्थ व्यवस्था को लेकर बेचैनी पैदा कर रहे हैं.

अमरीका इरान प्रतिबंध के कारण भारत के सामने सस्ता फासिल फ्यूल खरीदने की चुनौती गहरी हुई है. अब नई सरकार बनने के बाद जिस तरह अमरीका ने जीपीएस से भारत को बाहर किया है. इससे निर्यात के प्रभावित होने का अंदेशा है. अमरीका ने अनेक उत्पादों में जो टैक्स राहत इस के तहत भारत को दिया था उसमें से कई को अब राहत से मुक्त कर दिया गया है.

हालांकि कहा जा रहा है कि इससे भारत के निर्यात को ज्यादा नुकसान नहीं होगा, लेकिन कई जानकार कह रहे हैं कि इस तरह की बातें केवल आर्थिक माहौल में अफरातफरी रोकने के लिए की जा रही हैं.

इकोनोमी विशेषज्ञों के बीच भारत की आर्थिक स्थिति को ले कर गंभीर बहस हो रही है. भारत के कारपोरेट घरानों और भारत के मझोले उद्योगों के बीच जिस तरह की बहस की जा रही है उससे साफ लग रहा है कि भारत की इकोनोमी की दिशा को लेकर अनेक तरह का अंदेशा है. 2014 में मोदी ने भारत की आर्थिक नीति को गति देने और उसमें भारी सुधार के वायदे के साथ चुनाव जीता था. भारत के अधिकांश कारपोरेट घरानों ने मोदी को खुल कर समर्थन दिया था. 2019 में भी वह समर्थन बरकरार है. मोदी ने जिस सुधार की बात की थी उसे अंजाम नहीं दिया गया औऱ इसका असर विदेशी निवेश पर भी पड़ा.

विश्व के कारपोरेट घरानों में इसके कारण निराशा भी पैदा  हुई. पूंजीवाद समर्थक दुनिया के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में 2017 के बाद से इस कारण मोदी सरकार की अलोचना पहले तो दबे स्वर में शुरू हुई लेकिन 2018 में इस पर खुल कर लिखा गया. इस कारण चीन से अपनी पूंजी समेटने में तत्पर अनेक पश्चिमी कारपारेट जिसके लिए भारत एक बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद उनके लिए मुफीद नहीं जान पड़ा और वे इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे अनेक आशियान देशों की तरफ मुड़ गये.

दुनिया ने एक भवावह शतयुद्ध का दौर देखा है. उसकी स्मृतियां अब भी मौजहूद हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद महाशक्तियों का शीतयुद्ध तो थमा लेकिन अब वह आर्थिेक शीत युद्ध में बदल गया है. इस समय चीन को लेकर अमरीका जितना सख्त दिख रहा है इसका असर यूरोपीयन यूनियन पर भी है. अमरीका में अगले साल ही प्रसिडेंट का चुनाव है और माना जा रहा है कि ट्रंप इस जंग को और तेज करेंगे.

इस जंग में जिन देशों को आर्थिक तौर पर परेशाने होगी उसमें भारत भी है, क्योंकि ट्रंप धुर दक्षिणपंथी एजेंडा को तेज करेंगे. इसका एक बड़ा कारण तो यह है कि दुनियाभर में दक्षिणपंथी की राजनीतिक वापसी होती दिख रही है.  जहां वे नहीं जीत रहे हैं वहां भी उनका वोट शेयर बढ़ रहा है.

इसे भी पढ़ेंः कालखंडों का अंतराल और विपक्षी गठबंधन की हार

हालांकि मोदी सरकार की छवि भी एक धुर दक्षिणपंथी की है. बावजूद इसके ट्रंप के अपने राष्ट्रीय हित उन्हें इस तरह के कदम उठाने पर बाध्य कर रहे हैं. पिछले चुनाव में ट्रंप ने अमरीकी मूल्यों को दरकिनार कर जिस तरह से नस्लवाद का सहारा लिया था उसके ओर गंभीर होने की आशांका है.

इन नीतियों का भारत की आर्थिक परिघटना से नाभिनाल का रिश्ता है. ग्लोबल इकोनोमी में कल्पना की गयी थी कि सभी देशों को समान जमीन उपलब्ध होगी, लेकिन महाशक्तियों ने ही इसे नहीं माना.

ग्लोबल इकोनोमी के समर्थक रहे इकोनोमी के नोबल पुस्कार प्रप्त अनेक विद्वान तो ग्लोबलाइजेशन की नीतियों को विफल बता रहे हैं और इसे छोटे देशों के लिए घातक बता रहे हैं. दुनिया की छठी बड़ी इकोनामी भारत भी इसकी चपेट से बाहर नहीं है.

मोदी सरकार 2 को जीडीपी में आयी गिरावट के कारणों से निपटना होगा. साथ ही जॉबलेस ग्रोथ की नीति की चुनौती का भी सामना करना होगा. यह साफ है कि नोटबंदी और जीएसटी राजनीतिक लाभ का कारण बना हो लेकिन आर्थिक क्षेत्र के आंकड़े बता रहे हैं कि इन दोनों कदमों से विकास की गति न केवल प्रभावित हुई है बल्कि अब उसके परिणाम पूरी तरह सच्चाई बयान कर रहे हैं.

जब एनएसएस के रोजगार संबंधी आंकड़ों को बिजनेस स्टेंडर्ड ने प्रकाशित कर बताया था कि यह 45 सालों का सबसे खराब दौर है. तब नीति आयोग कह रहा था कि आंकड़े अभी अधूरे हैं. अब उसी तथ्य को संख्ययीकि विभाग ने जारी कर दिया है. इसी तरह आटोमोबाइल क्षेत्र में भारी संकट के के लक्षण हैं. और सकल घरेलू बचत भी ऐतिहासिक ऐतिहासिक कमी दर्ज कर चुकी है.

इसके साथ ही निर्माण क्षेत्र और कृषि क्षेत्र का संकट भी गहरा रहा है. निर्माण सेक्टर में तो देखा जा रहा है कि उसका ग्रोथ जबरदस्त ठहराव में है.

इन आंकडों को अब सार्वजनिक होने के बाद मोदी सरकार2 के समक्ष बडी चुनौती इस कारण पैदा हो रही है कि अब न केवल इसे रोकने की चुनौती है बल्कि ग्रोथ बढाते हुए पोलिटकली करेक्ट भी होना है.

भारत के सार्वजनिक क्षेत्रों ने जीडीपी ग्रोथ में बड़ी भूमिका निभायी है. वह रोजगार का भारी एक बड़ा क्षेत्र है. लेकिन पिछले पांच साल की नीतियों के कारण उनके अस्त्वि के सामने गंभीर चुनौती है. अब यह चर्चा है कि सार्वजनतिक क्षेत्र के संदर्भ में मोदी सरकार 2 की नीति क्या होगी. भारत की इकोनामी में सार्वजनिक क्षेत्र अहम बने रहेंगे या मोदी सरकार उनके निजीकरण की प्रक्रिया को तेज करेगी.

निजीकरण की प्रक्रिया से आर्थिक क्षेत्र का गतिरोध और बढ़ सकता है. ऐसा अनुमान अनेक अर्थशास्त्रियों का है. मोदी सरकार 2 को  जीडीपी को आठ प्रतिशत या उससे ज्यादा ले जाते हुए आर्थिक क्षेत्र के धुंध को दूर करने का फौरी कदम उठाना होगा.

इसे भी पढ़ेंः संसदीय वामपंथ का गहराता संकट और अस्तित्व बचाने की चुनौती

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like

you're currently offline

%d bloggers like this: