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आखिर कितने बच्चों की मौत के बाद जागेगी समाज और व्यवस्था की संवेदना

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Faisal Aurag

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गोरखपुर के बाद मुजफ्फरपुर बच्चों की कत्लगाह बना है. देश न तो गोरखपुर के बाद ही बच्चों के स्वस्थ्य को ले कर संवेदन दिखी थी और न ही मुज्जफरपुर के मामले में ये दिखायी दे रही है. देश के अनेक हिस्सों में बच्चों की बेवक्त मौत की इन घटनओं  का संबंध किसी प्रकृतिक आपदा से नहीं है. साफ है कि इस तरह की मौतें व्यवस्थाजननित हैं.

बावजूद न तो कोई इसकी जिम्मेदारी लेता है और न ही भविष्य के लिए सबक सिखता है. यूरोप के किसी लोकतंत्र में अगर इस तरह की घटना हो गयी होती तो निश्चित तौर पर सरकार और स्वास्य मंत्री की कुर्सी चली गयी होती और वहां के समाज में उसकी छवि एक जनसंहार के नियामक के तौर पर हो जाती.

लेकिन भारतीय उपमहाद्विप के लिए इन तमाम मौतों को सामान्य मान लेने का ही रिवाज है. वह जुमला जिसे उत्तर प्रदेश के मंत्री सिद्धार्थ सिंह ने कहा था, जब उन्होंने ने गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में मौतों का जिक्र करते हुए कहा था. वह था, अक्तूबर में बच्चों की मौत होती ही है. एक अस्पताल की कुव्यवस्था और सरकार की नाकामी का इससे ज्यादा बेशर्म बचाव और क्या हो सकता है.

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गोरपुर में तो बच्चे ऑक्सिजन के अभाव में मर गये थे. और मुजफ्फरपुर में दवा के अभाव में मर रहे हैं. राज्य और केंद्र सरकार के कदम बेहद नाकाफी हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के मुजफ्फरपुर दौरे के बाद भी न  बच्चों की मौत का सिलसिला कम हुआ है और न ही बच्चों को चमकी बुखार से बचाने के लिए किसी तरह की जागरूकता का अभियान चलाया जा रहा है.

गांव में बच्चों के बुखार पर तातत्कालिक सुरक्षात्मक उपाय के लिए मामूली परासिटामोल, ग्लूकोज और ओआरएस को घर-घर पहुंचाने के लिए किसी तत्वरित कार्रवाई का साफ अभाव दिख रहा है. मुजफ्फरपुर अस्पताल के कुछ डाक्टर शिकायत कर चुके हैं कि आइसीयू में कई जरूरी दवाएं उपलब्ण्ध नहीं हैं. जबकि अस्पताल प्रशासन मंत्री के सामने कह रहा है कि दवाओं का कोई अभाव नहीं है.

अस्पताल में वेंटिलेटर नहीं होने से भी इलाज प्रभावित हो रहा है. जब कोई बीमारी महामारी बन गयी है तो अस्पताल में डॉक्टरों की कमी दूर किये जाने के साथ ज्यादा से ज्यादा अस्थायी आइसीयू की व्यवस्था करने में सरकार नाकामयाब दिखी है. इसी तरह देश ओर राज्य के और बेहतर डॉक्टरों की सेवा लेने में सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. परिणाम में 110 बच्चों की मौत हुई, जिससे इस तरह के हालात बने हैं. ये हालात बेहद चिंताजनक हैं.

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बच्चों के लिए न जाने कितनी तरह की योजनाएं चलती हैं. बच्चों की विशेष देखरेख लिए चाइल्ड प्रोटेक्शन एक्ट भी बना हुआ है. बवजूद यदि बच्चे देशभर के अनेक अस्पतालों में किसी महामारी का शिकार होने के लिए मजबूर किये गये हैं तो यह न केवल पूरे समाज को फिर से सोचने बल्कि आत्म मूल्यांकन करने की भी जरूरत पर जोर देता है. इसके साथ ही स्वास्थ्य नीति के बारे में भी फिर से सोचा जाना चाहिए.

इस मामले में भारत क्यूबा से बहुत कुछ सीख सकता है. जिसने अपने देश में बच्चों के कुपोषण को लगभग खतम कर दिया है. और उनकी जीवन प्रत्याशा को चमत्कारिक रूप से बढ़ा दिया है. क्यूबा एक ऐसा देश है जो न केवल बेहद विपरीत हालात में अपने देश के लोगों के लिए शिक्षा और  स्वास्थ्य के क्षेत्र में माइल स्टोन बना खड़ा है.

विश्व के तमाम तरह के अध्ययन और यहां तक की यूएनडीपी भी मानता है कि क्यूबा नोयडिक और अमरीका जैसे देश से भी इन मामलों में बहुत आगे हैं. प्रजनन के बाद बच्चों की परविरिश और प्रजननपूर्व देखरेख में क्यूबा दुनिया के लिए उदाहरण है. कई तरह के अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद उसकी इस सफलता का अर्थ यह है कि सरकारें चाहें तो अपने देश के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य प्रदान कर सकती हैं.

देश को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि शिक्षा और स्वस्थ्य को प्राथमिकता दी जाए और बजट में दोनों के लिए कम से कम 9- 9 प्रतिशत राशि दी जाए. इसके साथ ही ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य को कारगर बनाया जाए. बिहार यूपी के सीमावर्ती अंचल में दिमागी बुखार और चमकी जेसी कई बीमारियां अक्सर बड़े  पैमाने पर मौत का वाहक बनती हैं. झारखंड में भी दिमागी बुखार का कहर कई बार आदिवासी इलाकों के बच्चों को लील लेता है.

झारखंड में बरसात में तो मलेरिया ओर डायरिया भी कई इलाकों में अब भी मौत का बड़ा कारक बन जाता है. इन बीमारियों को प्राथमिक अवस्था में रोका जा सकता है. बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया जाए.

और जिम्मेदारी तय हो कि किसकी लापरवाही के कारण इस तरह की मौतें आम हो रही हैं. गोरखपुर में तो निर्दोष डॉक्टर कफील को जेल में डाल दिया जाता है और अस्पताल के बड़े मगरमच्छ को सरकारी संरक्षण दे कर बचा लिया जाता है. 21वी सदी में इस तरह की मौत भारत के लिए बेहद शर्मनाक है.

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