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जानिये वो कौन मशहूर शायर थे जिसने ब्रिटिश सेना के कर्नल का पद छोड़ा, विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये

लोकतांत्रिक मूल्यों की बेखौफ आवाज फैज अहमद फैज की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : आधुनिक ऊर्दू शायरी के सबसे संजिदा लेखकों में शुमार फैज अहमद फैज की बेमिसाल शायर से तो बहुत से लोग वाकिफ हैं लेकिन बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि फैज ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना में भी भर्ती हुए थे. ये 1942 से लेकर 1947 तक फौज में रहे. इस क्रम में वे कर्नल के पद तक पहुंचे. 1947 में विभाजन के वक़्त सेना से इस्तीफ़ा देकर पाकिस्तान चले गये और लाहौर में जाकर बस गये.

फैज की एक बेहतरीन नज्म हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वर्ष 2020 में खूब चर्चा में रही थी. फैज की शायरी में हमें कई रंग दिखाई देते हैं.

वे इश्क के रंगों को भी अपनी नज्मों में बखूबी बयां करते थे. कुछ रंग आपके पेशे नजर हैं

उठकर तो आ गये हैं तेरी बज्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं.
तुमने देखी है वो पेशानी* वो रूखसार*, वो होंठ
जिन्दगी जिनके तसव्वर* में लुटा दी मैंने..
तुम्हारी याद के जब जख्म भरने लगते है
किसी बहाने तुमको याद करने लगते हैं..
यह बाजी इश्क की बाजी है जो चाहे लगा दो डर कैसा
गर जीत गये तो कहना क्या, हारे भी तो बाजी मात नही..
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है..
नजर में दल के उभरते हैं, दिल के अफसाने
यह और बात है कि दुनिया नजर न पहचाने..
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले..
क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले..

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सत्ता से निडर आवाज

सत्तानशीनों की फितरत होती है कि वे तानाशाही विकसित करते हैं फ़ैज़ के दौर में भी ऐसा हुआ.उन्हें जेल में डाला गया. जेल में उन्होंने फिर लिखा. उन्हें फिर जेल में डाला गया.

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बंटवारे के बाद दंगों का दंश झेला

पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी तो आई पर बंटवारा लेकर. उससे भी बदतर व खतरनाक दंगे लेकर. हिंदू और मुसलमान भाइयों को आपस में मार-काट रहे थे. सभी को लगा कि यह तो वह है ही नहीं, जिसकी हमने ख़्वाहिश की थी. फ़ैज़ को भी यही लगा था-
ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इसलिए भी खास हैं क्योंकि उनकी कविता पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक सरकारों से जन-हितैषी होने की अपेक्षा करती है. इसी के साथ वे जनता को उद्बोधित भी करते हैं. फ़ैज़ के लिए बोलना ज़िंदा होने की निशानी है. वे इसे यूं बयां करते हैं

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले..

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विश्व नागरिक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ एक व्यापक अर्थ में वे विश्व नागरिक थे लेकिन उनके अंदर अपने देश का बोध सदा बना रहा. वे जो कहना चाह रहे थे, उसे कहने के लिए उन्हें ‘देश की संरचना के भीतर’ वे जगहें या अवसर नहीं उपलब्ध हो पा रहे थे जिसकी उन्हें दरकार थी. वे अपना देश छोड़कर दूसरे देश गए. फ़ैज़ की शायरी उनकी पत्रिका ‘लोटस’ के द्वारा फिलिस्तीन, बेरुत और अफ्रीका के नामालूम लोगों तक पहुंची. वास्तव में फ़ैज़ लोकतंत्र और आज़ादी के कवि थे. वे भला एक देश में बंधकर कैसे रह सकते थे!

जो इश्क़ करते हैं, उन्हें ज़रूरत है फ़ैज़ की. जिन्हें दूसरों के सहारे की जरूरत है या जो दूसरों को सहारा देना चाहते हैं-

तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
जब कोई बात बनाए न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी सुनसान, सियाह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो..

फ़ैज़ की जरूरत उन्हें भी है जो सोचते हैं कि एक दिन दुनिया बदल जाएगी और जनता का राज होगा. तमाम तरह की बेड़ियां टूट जाएंगी-

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन
कि जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे गरां
रुई की तरह उड़ जाएंगे.

कहते हैं कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के इस लेखन से पाकिस्तान के हुक्मरान बड़े नाराज थे.1985 में इक़बाल बानो ने लाहौर के हज़ारों लोगों के सामने इसे गाया था.फैज़ की शायरी भी हिम्मत बंधाने वाली शायरी थी.

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जीवन का सफर

फैज का जन्म 13 फ़रवरी 1911 को ब्रिटिशकालीन भारत मे सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था. इनके पिता बैरिस्टर थे. इनकी आरंभिक शिक्षा ऊर्दू में हुई. इसके बाद इन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल तथा लाहौर विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. फैज ने अंग्रेजी तथा अरबी दो भाषाओं में M.A किया. इसके बाद एमएओ कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन किया. इसी दौरान वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए. 1936 में “प्रगतिवादी लेखक संघ” से जुड़े. इन्होंने उर्दू साहित्यिक मासिक अदब-ए-लतीफ़ का संपादन भी किया.

तख्ता पलट के आरोप में जेल भी गये

1941 में इनका पहला संकलन नक़्श-ए-फ़रियादी नाम से प्रकाशित हुआ. इन्होंने एक अंग्रेज़ समाजवादी विचारधारावाली महिला एलिस जार्ज से शादी की और दिल्ली में आकर बस गये. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गये. वहां जाकर इमरोज़ और पाकिस्तान टाइम्स का संपादन किया. लियाकत अली ख़ां की सरकार के तख़्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में वे 1951-55 तक कैद में रहे. इसके बाद 1962 तक वे लाहौर में पाकिस्तानी कला परिषद् में रहे.

1963 में ये यूरोप, अल्जीरिया तथा मध्यपूर्व की यात्रा पर गये. फैज 1958 में स्थापित एशिया-अफ़्रीका लेखक संघ के स्थापक सदस्यों में से एक थे. भारत के साथ 1965 के पाकिस्तान से युद्ध के समय वे वहां के सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे. 1968 में एशियाई-अफ़्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने. 1982 तक बेरुत (लेबनॉन) में कार्यरत रहे. 1982 में वापस लाहौर लौटे. 1984 में इनका देहांत हुआ. उनका आखिरी संग्रह “ग़ुबार-ए-अय्याम” (दिनों की गर्द) उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ था.

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