Opinion

श्रद्धांजलि – पुण्यतिथि 10 जनवरी :  झारखंड आंदोलन को धार देनेवालों में से एक थे जस्टिस एलपीएन शाहदेव

पिछली सदी का आखिरी दशक झारखंड आंदोलन के लिए बेहद निराशा और आशा का दौर था. ऐसे समय में सपने के साकार होने की उम्मीद एक आंदेालन ने पैदा की थी जिसका नेतृत्व सर्वदलीय अलग राज्य निर्माण समिति और वाम जनवादी संगठनों ने मिल कर किया था. वैसे तो अनेक बुद्धिजीवियों ने अलग राज्य के आंदोलन में शिरकत की थी, उसे दिशा देने का प्रयास किया था. इन्हीं लोगों में जस्टिस एलपीएन शाहदेव भी शामिल थे.

जस्टिस शाहदेव आंदोलन के एकमात्र रिटायर जज थे जिन्होंने आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी. और आंदोलन के क्रम में जेल भी गये. रिटायर होने के बाद उनकी सक्रियता ने झारखंड आंदोलन के कई मिथकों को खंडित करते हुए उसे व्यापक संदर्भ दिया. इसके साथ ही अनेक राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का एक बड़ा तानाबाना बुना गया.

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इसका असर राजनीतिक तौर पर भी हुआ और 2000 में झारखंड का वह सपना पूरा हुआ जिसके लिए लगभग एक सदी तक झारखंडियों ने संघर्ष किया और अनेक कुर्बानियां दीं.

झारखंड का सपना केवल एक राज्य निर्माण भर के लिए नहीं था, उसने एक वैकल्पिक राजनीतिक प्रक्रिया और  झारखंडीबोध को जमीन पर उतारने का सांस्कृतिक आह्वान किया था. राज्य बने दो दशक हो गये हैं बावजूद सांस्कृतिक झारखंड निर्माण की प्रक्रिया अधूरी ही है. झारखंड आंदोलन की यात्रा का अमिट दौर नये तरह के सामाजिक संशय का भी दौर था.

जस्टिस शाहदेव की भूमिका को इस अर्थ में भी देखा जा सकता है कि आंदोलन ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के संदर्भ को गहराई प्रदान की. मोरहाबादी मैदान में इन दोनों संगठनों, सर्वदलीय अलग राज्य निर्माण समिति और वाम जनवादी अलग राज्य निर्माण समिति की घोषणा के दो साल पहले एक बड़ी रैली का आयोजन किया था.

इसे कामयाब बनाने में जिन लोगों की पहल रही उसमें जस्टिस शाहदेव की बडी भूमिका थी. जस्टिस शाहदेव चूंकि किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं थे, इसलिए अनेक दलों के बीच समन्वय बनाने में उनकी बड़ी सक्रियता रही. झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका में आने से पहले भी जस्टिस शाहदेव की झारखंड आंदोलन के प्रति सहानुभूति सर्वविदित रही है.

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गैर राजनीतिक सामाजिक संगठनों के बड़े हिस्से को एक मंच प्रदान करने का उनका योगदान आंदोलन के इतिहास का एक बडा संदर्भ है. पहले माटी और फिर पार्टी का नारा इन तमाम दलों और उसके झारखंडी नेताओं को जोड़ने में कारगर हुआ था. झारखंड आंदोलन के इस दौर में यह एक आकर्षक नारा बना था.

सर्वदलीय अलग राज्य आंदोलन में 16 राजनीतिक दल जुड़े थे. जबकि दर्जनों सामाजिक संगठन और लेखक पत्रकार भी वाम जनवादी संगठनों और दलों के साथ यह एक बडा फ्रंट बन गया था. झारखंड आंदोलन के किसी भी कालखंड में इतने व्यापक राजनीतिक संगठनों और दलों का साझा प्रयास का यह पहला प्रयोग था.

इसका असर यह हुआ कि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने झारखंड आंदोलन के खिलाफ बयान दिया कि अलग राज्य उनकी लाश पर बनेगा. इसकी तीखी प्रक्रिया झारखंड में हुई. दो साल के आंदर ही लालू प्रसाद को ही बिहार विधानसभा में अलग झारखंड राज्य का प्रस्ताव पेश करना पडा और वह पारित भी हुआ.

1985 के बाद से झारखंड आंदोलन का एक ऐसा तेवर उभरा था जिसके दबाव में केंद्र सरकार भी थी. केंद्र को आंदोलन के दबाव के कारण ही कमिटी ऑन झारखंड मैटर्स का गठन करना पडा था और झारखंड सांस्कृतिक क्षेत्र की अवधारणा को स्वीकार करना पड़ा था.

इस पूरी प्रक्रिया में झारखंड समर्थक बुद्धिजीवियों की बडी भूमिका थी. रिटायर होने के बाद जस्टिस शाहदेव ने इस अवधारणा को और तेवर देने के लिए बुद्धिजीवियों को एकमंच पर लाने का प्रयास किया.

1992 में रिटायर होने के बाद से जस्टिस शाहइदेव ने अलग राज्य के सवाल को लेकर अखबारों में लेख लिखे. झारखंड अलग राज्य के एक प्रबल समर्थक के रूप में उनका बड़ा सम्मान था. अपने सेवाकाल में भी अलग राज्य के प्रति उनकी सहानुभूति की चर्चा झारखंडियों में होती थी. उस दौर में जब आंदोलन को लेकर उम्मीदें कमजोर पड रही थीं, उन्होंने खुल कर बड़ी भूमिका का निर्वहन किया.

झारखंडी मूल के वे प्रथम नागरिक थे जिन्हें हाईकोर्ट में जज के रूप में सेवा देने का मौका मिला था. वे एक कुशल न्यायविद थे. अत्यंत विनम्र लेकिन झारखंड अलग राज्य के लिए समर्पित और प्रखर विचारों से वे लैस थे. उनके व्यक्तित्व का एक बड़ा  पहलू यह था कि वे झारखंडी सादगी से भरे हुए थे. और उन्हें दिखावा नापसंद था.

एक बड़े जस्टिस होने के बावजूद वे सर्वसुलभ और सहज व्यक्ति थे. उनका जन्म तीन जनवरी 1930 को हुआ था. तत्कालीन पलामू के लातेहार के निकट कामता गांव में वे पैदा हुए थे. 1986 से 1992 तक उन्होंने पटना हाइकोर्ट के रांची बेंच के न्यायविद् के बतौर सेवा प्रदान किया.

उनकी विचार यात्रा जो महुआमिलान के स्कूल से शुरू हुई थी, झारखंड आंदोलन के एक बडे समर्थक के रूप में परवान चढी. 10 जनवरी उनकी पुण्यतिथि है.

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