
Gyan Ranjan
Ranchi : झारखंड विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है. 17 कार्यदिवस निर्धारित हैं. पांच कार्यदिवस पूरे हो चुके हैं. राज्य की जनता की सबसे बड़ी पंचायत में इन पांच दिनों में ही सतरंगी नज़ारे देखने को मिले. इसी सदन में पांच दिनों में से शुरुआती दो दिनों की कार्यवाही में सिर्फ और सिर्फ जनता की बातें हुई और जनहित में कई पेंचीदा मामलों पर सार्थक चर्चा हुई लेकिन तीसरे दिन से ही जनता की आवाज हंगामे में गुम होने लगी.
सदन में जनता के सवाल आये लेकिन जनप्रतिनिधि ने ही सवालों के समाधान के रास्ते बंद कर दिये.काश सदन में शुरुआती दो दिनों वाला नजारा कायम रहता तो जनता का सही मामले में भला होता.
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स्थानीय नीति पर सरकार ने पेश किया नजरिया
बजट सत्र के दूसरे दिन ही मुख्यमंत्री प्रश्न काल था. विधायकों के लिए सोमवार का आधे घंटे का यह समय काफी महत्वपूर्ण होता है. मुख्यमंत्री प्रश्नकाल के माध्यम से विधायक सीधे मुख्यमंत्री से नीतिगत मुद्दे पर सवाल कर सकते हैं. सवाल आये भी.
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सबसे बड़ा मुद्दा बना है स्थानीय नीति
झारखंड में अभी सबसे बड़ा मुद्दा स्थानीय नीति का बना हुआ है. यह ऐसा मुद्दा है जिसपर सरकार को विपक्ष के साथ साथ सत्ता पक्ष के विधायक भी आँख तरेरने से बाज नहीं आ रहे हैं. सदन में आजसू विधायक लम्बोदर महतो और माले विधायक बिनोद सिंह ने मुख्यमंत्री प्रश्नकाल के दौरान सीधे सीएम से स्थानीय नीति पर सवाल दागा.
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ये जवाब दिया सीएम हेमंत ने
मुख्यमंत्री हेमंत के तरफ से यह जवाब आया कि सरकार अभी हाई कोर्ट के निर्देश का अध्ययन कर रही है. इसके बाद इसपर फैसला होगा. एक तरह से देखा जाय तो जिस तरह से राजनीतिक दलों में स्थानीय नीति को लेकर उहाफोह की स्थिति है और जनता भी दिग्भ्रमित है.
भाषा विवाद और नियोजन नीति का मसला उठा
मुख्यमंत्री ने अपने जवाब से इसपर एक हद तक विराम लगाने का प्रयास किया है. इसके अलावा भाषा विवाद पर भी सरकार का रुख सदन में स्पष्ट हुआ. नियोजन नीति पर भी सदन में सरकार ने अपनी बातें रखी. मौटे तौर पर देखा जाय तो फिलवक्त झारखंड में मुख्य रूप से इसी तीन मुद्दे पर राजनीति भी हो रही है और जनता में भी संशय की स्थिति बनी हुई है.
हालाँकि यह भी सच है कि सरकार के जवाब से कोई स्पष्ट निर्णय अबतक निकलता नहीं दिख रहा है लेकिन भविष्य में इन मुद्दों पर ठोस निर्णय की आशा जरूर की जा सकती है.
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शराब में मुद्दे पर भी सरकार की नीति स्पष्ट हुई
मुख्यमंत्री प्रश्नकाल में ही कांग्रेस विधायक दीपिका पाण्डेय सिंह ने मुख्यमंत्री से पूर्ण शराब बंदी पर नीति स्पष्ट करने की मांग की थी. यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण था कि झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन लगातार पूर्ण शराब बंदी की मांग अपने ही पुत्र के नेतृत्व में चल रही सरकार से कर रहे हैं.
झामुमो विधायक लोबिन हेम्ब्रेम लगातार कई सत्रों से पूर्ण शराब बंदी के पक्ष में मुखर हैं. उन्होंने तो इस मामले को लेकर अपने विधायकों के साथ हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है. इस मामले पर भी सरकार का जवाब आया कि फ़िलहाल पूर्ण शराब बंदी पर सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया है. एक तरह से यह साफ़ हो गया कि इसपर सरकार कोई निर्णय नहीं लेनेवाली है.
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दो दिनों में दर्जनों सवाल सदन में उत्तरित हुए
सोमवार और बुधवार को सदन में सिर्फ जनता की बात हुई. पूरा प्रश्नकाल चला. दो दर्जन से ज्यादा सवालों के उत्तर सरकार की तरफ से सदन में आये. जनता की समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करते हुए हमारे माननीय नजर आये.
सचमुच लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा चल रही है. हंगामे में सदन का समय बर्बाद नहीं किया जाएगा. लेकिन तीसरे ही दिन भाजपा के लोग अपने नेता की बातों को दरकिनार कर सदन में हंगामा करना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि गुरुवार और शुक्रवार को प्रश्नकाल बाधित रहा और जनता ठगी गयी.
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जनहित में सदन में सार्थक चर्चा वक्त की मांग
ऐसा नहीं है कि सदन में चर्चा नहीं हुई. राज्यपाल के अभिभाषण, अनुपूरक बजट और मूल बजट पर सदन में खूब चर्चा हुई. चर्चा के दौरान कई ऐसे मुद्दे आये जो जनहित में जरूरी हैं. सरकार को पक्ष और विपक्ष ने आईना दिखाया. लोकतंत्र में सभी यह बात करते हैं कि सदन में सार्थक चर्चा होने से जनता का काम होता है. यह तभी तक हमारे माननीय को याद रहता है जबतक वे सत्ता पक्ष में रहते हैं. विपक्ष में जाते ही इन्हें लगता है कि हंगामा ही उनका सबसे बड़ा हथियार है.
इसी सदन में अकेले विधायक महेंद्र सिंह ने अपने बूते यह साबित किया था कि यदि जनप्रतिनिधि चाह ले तो अकेले भी जनता की बुलंद आवाज बन सकते हैं. कभी उन्हें मुद्दे से इतर बात करते नहीं देखा गया था. जब भी उठते जनता की आवाज को लेकर और सरकार को बात मानने पर मजबूर कर देते थे.
विपक्ष के नेता के तौर पर झामुमो विधायक स्टीफन मरांडी ने भी स्वच्छ लोकतंत्र की छाप इसी विधानसभा में छोड़ी है. सरयू राय, सरफराज अहमद सरीखे विधायक इसी सदन में हैं जिन्हें बेवजह सदन में कभी हंगामा करते नहीं देखा जाता है.
जब भी बोलते हैं मुद्दों को लेकर बोलते हैं. लेकिन पक्ष और विपक्ष में कुछ ऐसे विधायक हैं जिनका काम ही है सदन को बाधित करना. अभी बजट सत्र के 12 कार्यदिवस बचे हुए हैं.
उम्मीद है कि हमारे माननीय इन 12 दिनों का जनहित में सार्थक उपयोग करेंगे. हंगामे की जगह चर्चा को हथियार बनायेंगे.
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